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20 साल से हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए काम कर रहीं सोमी अली बोलीं- 'सिर्फ बातें करने से बराबरी नहीं आएगी'

सार

Women's Equality Day: आज यानी 26 अगस्त को महिला समानता दिवस मनाया जाता है। लेकिन क्या सिर्फ बराबरी की बात करने से महिलाओं की जिंदगी बदल रही है? इसी सवाल पर अमर उजाला ने अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता सोमी अली से बात की।
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सोमी अली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पिछले 20 साल से महिलाओं के साथ काम कर रहीं सोमी ने हिंसा और असुरक्षा से गुजरती महिलाओं को करीब से देखा है। उनका मानना है कि असली बराबरी सिर्फ बातों में नहीं, बल्कि सिस्टम और सोच में बदलाव से आएगी।

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सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम
'बात करना और बदलाव आना एक चीज नहीं है'
सोमी कहती हैं, 'हम ज्यादा बात कर रहे हैं और यह जरूरी भी है। पहले चुप रहना सामान्य बात थी और चुप्पी अत्याचार करने वालों को बचाती थी। लेकिन बात करना और बदलाव आना एक चीज नहीं है।
असली बदलाव अदालतों, पुलिस की प्रतिक्रिया, परिवारों की सोच और इस बात में दिखाई देगा कि क्या कोई महिला किसी रिश्ते से बाहर निकल सकती है, बिना अपनी पूरी जिंदगी गंवाए।'

सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम
'खतरे में महिला के लिए सिस्टम को तेज होना चाहिए'
सोमी के मुताबिक, मुश्किल में फंसी महिला को समय पर मदद मिलना सबसे जरूरी है। वह कहती हैं, 'जब कोई महिला खतरे में होती है, तब सिस्टम बहुत धीरे चलता है। सुरक्षा आदेश मिलने में समय लगता है। शेल्टर में जगह नहीं होती। कानूनी प्रक्रिया चलती रहती है, जबकि महिला अभी भी डर के बीच रह रही होती है।

अगर मैं सिर्फ एक चीज बदल सकती, तो यह सुनिश्चित करती कि जो महिला सच में खतरे में है, उसे जल्द से जल्द सुरक्षित जगह पहुंचाया जा सके। जब कोई आज रात भी सुरक्षित नहीं है, तब बाकी सारी चीजें पीछे हो जाती हैं।'

सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम
'सबसे पहले अपनी आवाज पर भरोसा करना होगा'
सोमी मानती हैं कि पैसा, शिक्षा और कानूनी मदद जरूरी हैं, लेकिन इनके साथ महिला का खुद पर भरोसा भी उतना ही जरूरी है।
'एक महिला को सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि वह दोबारा अपनी आवाज पर भरोसा करना सीखे। पैसा मदद करता है। शिक्षा रास्ते खोलती है। कानूनी मदद किसी की जिंदगी बचा सकती है। लेकिन मैंने ऐसी महिलाओं को भी देखा है जिनके पास ये तीनों चीजें थीं और फिर भी वे डर, शर्म या दूसरों की मंजूरी की जरूरत के कारण खुद को कैद महसूस करती थीं।

मैंने ऐसी महिलाओं को भी देखा है जिनके पास लगभग कुछ नहीं था, लेकिन उन्होंने आजादी हासिल की, क्योंकि उन्हें आखिरकार यह भरोसा हुआ कि वे सुरक्षा और सम्मान की हकदार हैं। सबसे गहरा काम हमारे भीतर होता है।'

सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम
'महिलाएं हमेशा पीड़ित और पुरुष हमेशा समस्या नहीं हैं'
बराबरी को लेकर सोमी एक और जरूरी बात कहती हैं। उनके मुताबिक, महिला समानता का मतलब हर मामले में महिला को सही और पुरुष को गलत मान लेना नहीं है।
'महिलाओं की मदद करते हुए मैंने हजारों महिलाओं के साथ काम किया है। मुझे सबसे ज्यादा यह बात परेशान करती है कि कई बार बराबरी का मतलब यह समझ लिया जाता है कि महिलाएं हमेशा पीड़ित हैं और पुरुष हमेशा समस्या हैं। हम इंसान हैं और हमारे भीतर कई परतें होती हैं। कोई पूरी तरह अच्छा नहीं होता और कोई पूरी तरह बुरा नहीं होता।

सच्ची बराबरी आसान नहीं है। अगर हम महिलाओं को सिर्फ पीड़ित और पुरुषों को सिर्फ अत्याचारी मानेंगे तो हम सच्चाई को देखना बंद कर देंगे। मैं इतनी टूटी हुई महिलाओं के साथ बैठ चुकी हूं कि उनके साथ हुए अत्याचार की सच्चाई से कभी इनकार नहीं कर सकती। लेकिन मैंने इतना कुछ देखा भी है कि मैं समझती हूं कि इंसान सिर्फ एक चीज नहीं होता।'

सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम
'सच्ची बराबरी का मतलब है कि हम सच के लिए खड़े हों'
सोमी के मुताबिक, बराबरी का मतलब किसी एक पक्ष को हर हाल में सही मान लेना भी नहीं है। 'अगर हम सच में बराबरी में विश्वास करते हैं और मैं करती हूं, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि महिलाएं भी चालाक, जोड़-तोड़ करने वाली और नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती हैं। हमने भारत में झूठे आरोपों के मामले बढ़ते देखे हैं। ऐसे मामले सभी को नुकसान पहुंचाते हैं। वे निर्दोष लोगों की जिंदगी बर्बाद करते हैं। और वे उन महिलाओं के लिए भी मुश्किल बढ़ाते हैं, जो सच में हिंसा का सामना कर रही हैं।
सच्ची बराबरी का मतलब है कि हम किसी एक पक्ष के लिए नहीं, बल्कि सच के लिए खड़े हों। कमजोर और जरूरतमंद की रक्षा हो, लेकिन झूठ की रक्षा न हो।'
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सोमी अली - फोटो : इंस्टाग्राम @realsomyali
'मेरी कीमत किसी की मंजूरी पर निर्भर नहीं थी'
बात अपनी जिंदगी की आती है तो सोमी कहती हैं कि उन्हें खुद अपनी कीमत समझने में भी वक्त लगा। उन्होंने कहा, 'मैं चाहती हूं कि 20 साल की उम्र में ही समझ गई होती कि मेरी कीमत इस बात पर कभी निर्भर नहीं थी कि कोई मुझे चुनता है, चाहता है या किसी ताकतवर इंसान से मुझे मंजूरी मिलती है।
20 साल की उम्र में मैंने ध्यान को प्यार समझ लिया था और चुप रहने को सुरक्षा। काश, मैं तब समझ पाती कि जो चीज धीरे-धीरे मुझे मिटा रही है, उससे दूर चले जाना असफल होना नहीं है। वही आत्मसम्मान की शुरुआत है।
मेरी जिंदगी में जो भी मायने रखने वाली चीजें आईं, वे तब शुरू हुईं जब मैंने गलत लोगों से यह पूछना बंद कर दिया कि क्या मैं मायने रखती हूं।'
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