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Kanjak: सामाजिक सौहार्द का संदेश देती है फिल्म ‘कंजक’, यहां जानें कैसी है यह शार्ट फिल्म?

Sat, 21 Feb 2026 07:20 PM IST
पूनम कंडारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Short Film Kanjak: प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी की कहानी ‘कंजक’ पर निर्देशक राहुल यादव ने एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। कैसी है यह फिल्म, यहां जानिए…

 

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शार्ट फिल्म ‘कंजक’ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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समय चाहे कोई भी हो, सामाजिक सद्भाव और आपसी सौहार्द की कहानियां पाठकों और दर्शकों को सदैव प्रेरित करती रही हैं। विशेषकर वे कहानियां, जिनका अंत झकझोर देने वाला हो। प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी की कहानी ‘कंजक’ इसी श्रेणी की एक मर्मस्पर्शी रचना है। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत इस कहानी को निर्देशक राहुल यादव ने बड़ी कुशलता से कैमरे के लेंस में उतारा है।

मूल कहानी में किए कुछ बदलाव 

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फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से सिनेमा की बारीकियां सीखने वाले राहुल यादव पहली बार किसी साहित्यिक कृति पर लघु फिल्म लेकर आए हैं। निर्देशक राहुल यादव के अनुसार, फिल्मांकन की जरूरतों को देखते हुए सच्चिदानंद जोशी की मूल कहानी में कुछ परिवर्तन किए गए हैं, लेकिन फिल्म की मूल आत्मा को अक्षुण्ण रखा गया है। 
एक प्रख्यात लेखक होने के साथ-साथ श्री जोशी एक मंझे हुए अभिनेता भी हैं। फिल्म 'कंजक' में उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी है, जबकि उनकी पत्नी, अभिनेत्री मालविका जोशी ने इस फिल्म में केंद्रीय भूमिका निभाई है। सद्भाव और सौहार्द का संदेश देती यह फिल्म कला और पारिवारिक सहभागिता का एक सुंदर उदाहरण है।

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शार्ट फिल्म ‘कंजक’ - फोटो : अमर उजाला

कैसा है अभिनय?
जोशी दंपती का अभिनय इतना सहज और जीवंत है कि वे पर्दे पर पात्र नहीं, बल्कि असल इंसान लगते हैं। सवलीन कौर ने एक बातूनी लड़की के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है और क्लाइमेक्स में उनका प्रदर्शन दंग कर देने वाला है। पद्मश्री से सम्मानित लोक गायक भेरु सिंह की आवाज में कबीरदास का भजन 'मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में' इस फिल्म के दर्शन को पूर्णता प्रदान करता है। यह स्पष्ट करता है कि अध्यात्म की खोज बाहर के कर्मकांडों में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है। 

शार्ट फिल्म ‘कंजक’ - फोटो : अमर उजाला

स्तब्ध कर देता है क्लाइमैक्स
फिल्म का मुख्य सशक्त पक्ष इसकी मार्मिक पटकथा है, जो नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन के इर्द-गिर्द रची गई है। यह कहानी जोशी जी के निजी जीवन के अनुभवों का एक कोलाज है। ‘कंजक’ का अंत स्तब्ध करने वाला है। इसका क्लाइमेक्स दर्शक के मस्तिष्क में एक अंतहीन कोलाहल छोड़ जाता है, जो सोचने पर मजबूर करता है।

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शॉर्ट फिल्म 'कंजक' - फोटो : अमर उजाला
सराहना के पात्र हैं निर्देशक
निर्देशक राहुल की सराहना करनी होगी कि उनकी फिल्म बिना किसी लंबी भूमिका के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा आत्मीय रिश्ता कायम कर लेती है। फिल्म का कैमरावर्क इतना सधा हुआ है कि एक छोटी सी रसोई और इकलौते कमरे के दायरे में भी दर्शक और किरदारों के बीच की दूरी मिट जाती है। 
ऐसा महसूस होता है जैसे दर्शक स्वयं उसी स्थान पर मौजूद हो। फिल्म का शुरुआती दृश्य, जहां प्रेशर कुकर समाज की घुटन के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है, बेहद प्रभावशाली है। कुकर के फटने से पहले सचेत हो जाने का यह संकेत प्रतीकात्मक रूप से समाज के लिए एक गहरा संदेश छोड़ता है।

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