कैसा है अभिनय?
जोशी दंपती का अभिनय इतना सहज और जीवंत है कि वे पर्दे पर पात्र नहीं, बल्कि असल इंसान लगते हैं। सवलीन कौर ने एक बातूनी लड़की के रूप में अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है और क्लाइमेक्स में उनका प्रदर्शन दंग कर देने वाला है। पद्मश्री से सम्मानित लोक गायक भेरु सिंह की आवाज में कबीरदास का भजन 'मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में' इस फिल्म के दर्शन को पूर्णता प्रदान करता है। यह स्पष्ट करता है कि अध्यात्म की खोज बाहर के कर्मकांडों में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर है।
स्तब्ध कर देता है क्लाइमैक्स
फिल्म का मुख्य सशक्त पक्ष इसकी मार्मिक पटकथा है, जो नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन के इर्द-गिर्द रची गई है। यह कहानी जोशी जी के निजी जीवन के अनुभवों का एक कोलाज है। ‘कंजक’ का अंत स्तब्ध करने वाला है। इसका क्लाइमेक्स दर्शक के मस्तिष्क में एक अंतहीन कोलाहल छोड़ जाता है, जो सोचने पर मजबूर करता है।
सराहना के पात्र हैं निर्देशक
निर्देशक राहुल की सराहना करनी होगी कि उनकी फिल्म बिना किसी लंबी भूमिका के पात्रों और दर्शकों के बीच एक गहरा आत्मीय रिश्ता कायम कर लेती है। फिल्म का कैमरावर्क इतना सधा हुआ है कि एक छोटी सी रसोई और इकलौते कमरे के दायरे में भी दर्शक और किरदारों के बीच की दूरी मिट जाती है।
ऐसा महसूस होता है जैसे दर्शक स्वयं उसी स्थान पर मौजूद हो। फिल्म का शुरुआती दृश्य, जहां प्रेशर कुकर समाज की घुटन के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है, बेहद प्रभावशाली है। कुकर के फटने से पहले सचेत हो जाने का यह संकेत प्रतीकात्मक रूप से समाज के लिए एक गहरा संदेश छोड़ता है।