अमर उजाला संवाद उत्तर प्रदेश 2026 का मंच सज चुका है। राजधानी लखनऊ में जारी इस वैचारिक कार्यक्रम में अभिनेता रणदीप हुड्डा ने शिरकत की है। इन दिनों वे अपनी सीरीज 'इंस्पेक्टर अविनाश' सीजन 2 को लेकर चर्चा में हैं। संवाद के मंच पर उन्होंने अपने करियर और सिनेमा को लेकर कई किस्से साझा किए। पढ़िए कुछ अंश...
आप अपने रोल में बहुत गहराई से घुस जाते हैं। ओटीटी पर 'इंस्पेक्टर अविनाश' सीजन 2 आई है। हरियाणा के पुलिस वाले और यूपी के पुलिस वाले में क्या अंतर होता है?
रणदीप हुड्डा: हरियाणा के लोग थोड़े रफ होते हैं। यूपी की भाषा भी मीठी होती है और लोग भी मीठे होते हैं। हरियाणा में जरा मुंह पर ही लठ मार देते हैं। अगर उदाहरण से बताऊं तो हरियाणा वाले बोलेंगे, 'हम झेल्या ना करें, पैला करैं'। वहीं, इंस्पेक्टर अविनाश मिश्रा का जो किरदार मैंने निभाया है, वो यूपी एसटीएफ और एटीएस में काफी काम कर चुके हैं। मैंने उनकी निजी जिंदगी को मीडियम रख हमने 'इंस्पेक्टर अविनाश' बहुत ही एंटरटेनिंग सीरीज बनाई है। जैसे कि हरियाणा के लोग कहेंगे, 'हम झेल्या ना करें, पैला करैं'। वैसे ही, इंस्पेक्टर अविनाश करेंगे, 'हम झेलते नहीं हैं, पेलते हैं'।
'इंस्पेक्टर अविनाश' आपके लिए कितनी चुनौतीपूर्ण थी? उनके किरदार में ढलना?
रणदीप हुड्डा: अपनी हालिया रिलीज सीरीज 'इंस्पेक्टर अविनाश 2' के बारे में बात करते हुए रणदीप ने कहा, 'कोई भी कहानी हो। जीवित या चल बसे शख्स पर बायोपिक हो...यह उनकी पूरी जिंदगी होती है, जो वह बहुत वर्षों तक जीते हैं। उसे जब आप ओटीटी या बड़े पर्दे पर दिखाने की कोशिश करते हैं तो आपको कहानी दो-तीन घंटे में दिखानी होती है।
40 साल की कहानी को आप दो घंटे में कैसे दिखाएंगे? ऐसे में आप उनकी जिंदगी के सबसे बड़े मकसद को लेकर सबसे बड़ा ब्रिज बनाते हैं। आप 30-40 साल की फिल्म तो नहीं बना पाते। हमारी जिंदगी में हम हमेशा तो कुछ जरूरी नहीं करते। अब तो फोन में ज्यादा लगे रहते हैं। पहले झक मारना भी एक हॉबी होती थी, जिसे अब सब भूलते जा रहे हैं।'
इंस्पेक्टर अविनाश का किरदार कितना मुश्किल लगा?
यह किरदार जिस पर गढ़ा गया है वो हमारे दोस्त हैं। उनसे सबने कहा कि भाई रणदीप तो तुम्हें घोलकर पी गया। मैं उनके जैसा ही हूं। मैं शायद हैंडसम थोड़ा ज्यादा हूं उनसे। मेरे साथ यह काफी बार हो चुका है। मैंने जो बायोपिक की हैं, उनके किरादरों को गूगल करिए, मेरा फोटो आएगा।
यूपी में कितना बदलाव हुआ है पिछले कुछ वर्षों में?
मैं यहां पर एक ऑब्जर्वेशन नहीं दे सकता हूं। मैं तो अपने दोस्तों और परिवार के लोगों से कही सुनी बाते हैं वही बता सकता हूं। यूपी अब बहुत सेफ हो गया है। महिलाएं आसानी से मूव कर सकती हैं। क्राइम खत्म हो गया है। यही सुनने में आया है।
मेरे एक को-स्टार थे। उनको कोई गांव में बड़ा तंग कर रहा था, उनके भाईयों को पीट दिया था। मैंने खाली एक ट्वीट किया था और यूपी पुलिस को टैग किया था। घंटों के अंदर परेशान करने वालों को ऐसा सीधा कर दिया कि वो कभी तंग करने नहीं आए। मेरे हिसाब से यूपी में यह बदलाव महसूस करते हैं सब।
सोशल मीडिया पर लोग अच्छी-अच्छी बातें दिखाते हैं। आप गांव के खेत-खलिहान सब दिखाते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
सक्सेस का फॉर्मूल सबके लिए अलग-अलग होता है। कोई 100 करोड़ कमाकर भी दुखी है। कोई कुछ न होने पर भी ऐसे मुस्कुरा रहा है कि जैसे कहीं का राजा है। खुशी के स्टैंडर्ड को आप किसी से जोड़ नहीं सकते। जड़ों से जुड़े होने का मुझे यह लगता है कि अगर आपको ये नहीं पता कि आप कहां से आए हैं, तो आप कहां जा रहे हैं इसका कोई फायदा नहीं है। मुझे 25 साल मुंबई में हो गए। लेकिन, कोई पूछता है कि कहां से हो तो कहता हूं कि जसिया से हूं, रोहतक से।
जिस जिंदगी से हमारे पूर्वज गुजरे हैं। लोग कहते हैं कि विरासत। यह किसने कहा कि विरासत सिर्फ कोठी और महल ही हैं। क्या खेत-खलिहान विरासत नहीं हैं? पता नहीं किस-किस कब्जे से उसे बचाया गया है। पसीने से उसे सींचा है। मैं ऐसे परिवार से आता हूं, जिसके पास रियासत नहीं हैं, लेकिन जिसकी विरासत बहुत विशाल है। मैं उसे छिपाना पसंद नहीं करता। मैं बोलता हूं कि अपनी क्षेत्रीय भाषा अपने बच्चों को सिखाओ। आपकी यह भाषा मर नहीं जानी चाहिए।
आपने रंग दे बसंती फिल्म ठुकरा दी थी?
नहीं ऐसा नहीं था। मैंने मना कर दिया था फिल्म के लिए, जो हमें गाइडेंस मिली थी। हमें जो सिखाया गया कि कैसे काम करना चाहिए। किन लोगों के साथ जुड़ना चाहिए। इसी तरह कोई सलाह दे देता है तो आप मान लेते हैं। काम मैंने कम इसलिए किया कि मुझे अच्छा काम मिल नहीं रहा था, जो क्रिएटिव हो। उसे छोड़कर मैंने करना भी चाहा तो लगा तरक्की नहीं हुई। ऐसा भी होता है कि मैं एक रोल को थोड़ा अपना बनाने के लिए ज्यादा समय लेता हूं बीच में। क्योंकि आप एक के बाद एक प्रोजेक्ट करते हैं तो आप एक जैसे दिखते हैं। मेरी कोशिश रहती है कि आप मेरे अलग-अलग कैरेक्टर्स को देखें। मैंने यही चाहा था कि आप अलग-अलग पहुलओं को अपनाकर आगे बढ़ें। मुझे इससे जिंदगी जीने का मौका मिलता है। अनुभव मिलता है। मैं ऐसे अनुभव बटोर रहा हूं।बीच में तो ऐसा समय भी था कि मैंने घोड़े खरीद लिए थे। मैंने खूब मेडल जीते। मुझे ऐसा लगा कि में प्रोफेशनल राइडर बन जाऊंगा। लेकिन, बहुत जल्दी पटका पड़ा कि घोड़े रखने के पैसे कहां से लाएगा? चल मेकअप लगा और काम कर।
सरबजीत देखकर बिल्कुल नहीं लगा कि ये रणदीप हुड्डा हैं। आपने कहा कि इस किरदार ने आपको पूरी तरह बदल दिया? ऐसा क्यों?
ऐसा इसलिए कि वह रोल ऐसा था, जिसमें उनके निधन को बहुत समय नहीं हुआ था। उनकी बहन दलवीर कौर जी बहुत जुड़ी हुई थीं। यह रोल करते हुए मेरा भी उनसे बहुत जुड़ाव हो गया। यह रोल मैंने जब किया तो सोचा आप कैसे कल्पना भी करेंगे कि आपको 22 साल काल कोठरी में रखा गया। 22 साल एक रोटी मिलती थी। परिवार से मिलने नहीं दिया जाता था। मैंने ऐसे प्रयोग खुद पर किए थे, जिससे वह अकेलापन और यादें और उम्मीद की छोटी सी किरण से आप कैसे जुड़े होते हो...इस अनुभव से जुड़ा। मैं उनके परिवार से जुड़ा रहा। आखिरकार उन्हें जेल में मार दिया गया। वह मामला सियासी हो गया था। दो देशों के ईगों में...जब हाथी लड़ते हैं तो चीटियां पिसती हैं। वही हुआ। मुझे बहुत दुख हुआ।
बॉलीवुड ने आपकी उतनी सराहना नहीं की, जितनी हो सकती थी? आपने ऐसा कहीं कहा था...
पता नहीं। छोटे-छोटे रोल के लिए भी जो सराहना आती है, शायद वह नहीं आया होगा तो मैंने किसी मौके पर ऐसा कह दिया होगा। लेकिन, ऐसा मुझे नही लगता।
क्या आपकी प्रतिभा से वहां कई लोग असुरक्षित महसूस करते हैं?
वह तो उनसे ही पूछना पड़ेगा। जब इतना समय गुजर जाता है तो इंसान अपनी पीठ खुद थपथपाना सीख लेता है। फिर लोगों के वेलिडेशन की जरूरत नहीं पड़ती। न ही उसका इंतजार होता है।
क्या आउटसाइडर और इनसाउडर की बात सही है?
सही है, लेकिन ऐसी भी बात नहीं है कि उससे ओवरकम नहीं कर सकते। आपको ज्यादा मौके मिलते हैं। ज्यादा श्रेय मिलता है। मगर, जनता जनार्दन भी है। मुझे तो समझ नहीं आता कि नेपोटिज्म की बहस का मतलब क्या है....क्या उससे इंसान की जर्नी रुक जाएगी। कोई डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहेगा। कोई आर्मी में जॉइन करना चाहेगा। पेरेंट्स के प्रोफेशन में बच्चे उतरते हैं। ऐसा ही इंडस्ट्री में है। उन्होंने अपने माता-पिता को इंडस्ट्री में देखा है और वहां उनका दबदबा है तो स्टार के बच्चे यह फील्ड न चुनें क्या?
आपके पिता डॉक्टर हैं? उन्होंने कोशिश नहीं की अपने प्रोफेशन में आपको लाने की?
मैं पढ़ाई में कमजोर था। मेरे पिता ने डॉक्टर बनने की उम्मीद छोड़ दी थी। सिर्फ एक प्रोफेशन है, जिसमें कोई अपने बेटे को नहीं लाना चाहता। किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाता चाहता।
'वीर सावरकर' में आप बिल्कुल अलग अंदाज में दिखे थे। इसका ख्याल कैसे आया था? इसे आपने लिखा और डायरेक्ट किया था।
वीर सावरकर जी पर मेरी कोई रुचि नहीं थी। मुझे अप्रोच किया गया। मैंने उनमें से एक बंदे के साथ सरबजीत की थी। वह आए मेरे पास तो मैंने वीर सावरकर जी की फोटो निकाली और मैंने कहा कि मैं तो इनके जैसा दिखता ही नहीं हूं। इसलिए मैंने मना कर दिया। मैंने रास्ते में अपने दोस्त विक्रम संपत कि वीर सावरकर पर लिखी किताब पढ़ी। फिर मैंने और किताबें खरीदीं और उनके बारे में पढ़ने लगा रुचि के तौर पर। तब मुझे लगा कि यार इनके बारे में तो लोग जानते ही नहीं हैं। इन्होंने क्या झेला है। शिकारी हिस्ट्री लिखता है, लेकिन शेर हिस्ट्री लिखने लगे तो...? नहीं, शेर नहीं लिखता। कहानी शिकारी लिखता है। इसी जगह मुझे लगा कि हमारी हिस्ट्री सिर्फ अहिंसक मूवमेंट को ग्लोरीफाइ करती है। मगर, एक सशक्त क्रांति भी चल रही थी, जिसका बहुत लोगों ने साथ ही नहीं दिया, उसका क्या? उसकी एक प्रेरणा थे वीर सावरकर। लोग उनका महत्व भूल गए। यह देखकर मेरे अंदर से जाट निकल आया कि भाई सब अगर इनके खिलाफ हैं तो मैं इनके पक्ष में हूं। उस गुस्से से मैंने वह फिल्म बनाई। और सरप्राइज से मैं उन जैसा दिख भी पाया। मैंने 30-32 किलो वजन कम किया था।
आपने बहुत से अलग-अलग किरदार निभाए हैं। कभी ऐसा लगा कि लीड रोल वाली फिल्म मिले? 100 या हजार करोड़ वाली फिल्म करूं?
मेनस्ट्रीम सिनेमा भी बदल रहा है। वहां भेड़चाल है। जो एक करता है, सब करते हैं। मेरी अपनी एक स्वतंत्र सोच रही है। मैं अब मेन स्ट्रीम सिनेमा की तरफ भी बढ़ रहा हूं। आप सिर्फ एक फिगर नहीं हो। आप बहुत कुछ बन सकते हो। आप ऐसे चैलेंज भी ले सकते हो जो कोई और नहीं कर सकता, ऐसे लोग भी चाहिए। उनमें हम हैं। हम हैं तो क्या गम हैं।
आपकी बहन न्यूट्रिशनिस्ट हैं। आपको उन्होंने हेल्प की वजन कम करने में?
मेरी बहन अंजलि हुड्डा मेरी बैकबोन है। उसके बिना मैं कुछ नहीं हूं। यह अलग बात है कि वो जो बोलती है, मैं उससे थोड़ा ज्यादा कर देता हूं फिर फोन करके बोलता हूं कि हाय मर गया, हाय मर गया। अगर मेरी बहन अंजलि हुड्डा नहीं होती मेरी हेल्प करने के लिए तो शायद मैं 20-30 पर्सेंट भी शेप शिफ्टिंग भी नहीं कर पाता। उन्होंने मेरी फिल्म 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' में मैडम कामा का किरदार भी निभाया है।