देश से किया वादा
आगे मनोज ने देश की जनता से एक वादा करते हुए कहा, ‘आज मैं अपने आप को ज्यादा मजबूत पाता हूं और ज्यादा सुदृढ़ पाता हूं। देश से किया वादा आज फिर दोहराता हूं कि मैं जीवन में अब ऐसा कुछ नहीं करूंगा कि मेरी मिट्टी का और मेरे अपने लाेगों का सिर झुके।’
1100 रुपये में भजन लेखन की शुरुआत
मनोज मुंतशिर ने आगे कहा, 'फिल्म 'आदिपुरुष' तक सिर्फ मैं फिल्मों में गाने लिख रहा था। बड़ी-बड़ी फिल्मों के गाने ही लिखता था। 'आदिपुरुष' के बाद मैंने 1100 रुपये में भजन लिखे। मेरे सामने हमेशा दो रास्ते थे कि आप अपनी लोकप्रियता को कैसे भुनाएं। आप इसने निजी फायदे के लिए भी भुना सकते हैं और अपने सनातन के लिए भी भुना सकते हैं। मैं अपनी लोकप्रियता को अपने सनातन के लिए भुना रहा हूं। जय श्रीराम'।
'मुश्किल वक्त में राम की शरण में गया'
मनोज मुंतशिर ने संवाद में कहा, 'हर कोई मुश्किल में राम की शरण में जाता है। मैं भी मुश्किल में राम की शरण में गया। उस वक्त मुझे कोई सुख नहीं मिल रहा था। तब मुझे लगा कि राम के चरणों में ही अपने शब्द पुष्प अर्पित कर पाऊं। तो मुझे भगवान श्रीराम ने वाणी की शक्ति दी थी। शब्दों की शक्ति दी तो मैंने उन्हें अर्पित कर दी। मैंने सोचा निरंतर उन्हीं के लिए लिखूंगा।
लेखन की जब बात आती है, कोई लिखता क्यों है? यह प्रेरणा कहां से आती है?
मुंतशिर ने कहा, 'लिखने की एक वजह होनी चाहिए कि आपके अंदर कुछ उबल रहा है, तभी लिखना चाहिए। नहीं तो बेकार है। तुलसीदास ने कहा, 'मुझसे तो राम ने लिखवाया, वह मैंने लिखा'। इसलिए ईश्वर जब लिखवाए तब लिखो। भगवान डिक्टेशन न दे तो कोई नहीं लिख सकता। अगर परमात्मा आपका हाथ पकड़कर न लिखवाए तो कोई शेक्सपीयर नहीं लिख सकता।
आप अपने आपको किस परंपरा के गीतों में सबसे ज्यादा जुड़ा पाते हैं?
18 मार्च 1999 वह तारीख थी, जब मैंने पुष्पक एक्सप्रेस से 362 रुपये का टिकट लेकर ट्रेन पकड़ी थी। तब मेरे लिए फिल्मी गीतों का मतलब इतना था कि साहित्य और लोकप्रियता के बीच क्या कोई स्वीट पॉइंट है, ऐसी जगह जहां लिटरेचर आम आदमी से मिल जाए। मुझे वह फिल्मी गीतों में दिखाई दिया।