सेट पर आपका पहला दिन कैसा था?
पहला दिन हमेशा ही थोड़ी उत्सुकता और थोड़ी घबराहट से भरा होता है। नया सेट, नया माहौल, सब कुछ नया। जब मैं ‘कांतारा चैप्टर 1’ के सेट पर पहुंची तो टीम पहले से एक महीने से शूट कर रही थी। मुझे उनकी गति में अपना स्थान ढूंढना पड़ा। शुक्र है कि शुरू में कुछ आसान सीन थे। इनमें ज्यादा डायलॉग नहीं थे, जिससे मुझे किरदार की बॉडी लैंग्वेज, नजर और अंदाज पर ध्यान देने का समय मिला। जब डायलॉग वाले सीन आए तो आवाज और दूसरे छोटे-छोटे पैमानों पर काम करना शुरू किया।
गुलशन देवैया और ऋषभ शेट्टी ने सेट पर आपका कैसे साथ दिया?
ऋषभ सर शुरू से ही बहुत जुड़े रहे। उन्होंने लेखकों की कार्यशाला में भी भाग लिया, जिससे मुझे समझ आया कि एक युवरानी की शारीरिक भाषा कैसी होती है - वह कैसे चलती है, कैसे अपने आप को पेश करती है, उसके बोलने का अंदाज कैसा होना चाहिए?
गुलशन सर के साथ काम करना भी बहुत प्रेरणादायक था। मैं हमेशा उनके काम को सराहती रही हूं, चाहे वो ‘द हॉन्टिंग’ हो या ‘मर्द को दर्द नहीं होता’। मुझे सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि वह कन्नड़ बेहद खूबसूरती से बोलते हैं। भले ही मैं यह जानती थी कि वह कूर्ग से हैं पर मुझे नहीं पता था कि वह दक्षिण कर्नाटक के इस खास डायलेक्ट में इतने सहज हैं।
‘कांतारा’ का पहला भाग सफल रहा था। क्या आप पर यह फिल्म करते वक्त इस बात का दबाव था?
बिलकुल, जब पहला भाग सफल रहा हो तो दूसरा भाग अपने आप में ही बड़ी जिम्मेदारी लेकर आता है। हालांकि, हमारी टीम शुरू से ही इस बारे में बहुत समझदार रही। जिम्मेदारी और दबाव में फर्क है। दबाव कभी-कभी हमें रोक देता है, लेकिन जिम्मेदारी हमें प्रेरित करती है। टीम ने ये बहुत खूबसूरती से संभाला, ताकि जिम्मेदारी प्रेरित करे और काम भारी महसूस न हो। यही भावना पूरी टीम में थी, जिससे हम सब अपना बेस्ट दे सके।
‘बघीरा’, ‘मद्रासी’, ‘कांतारा चैप्टर 1’ और आगे ‘टॉक्सिक’। पिछला साल आपके लिए एक वरदान जैसा रहा। इस दौर को आप अपने करियर में कैसे देखती हैं?
ये साल मेरे लिए बेहद खास रहा। पिछले अक्तूबर से लेकर अब तक मुझे जो भी फिल्में मिली सभी एक दूसरे से काफी अलग थीं। मेरे लिए यह पूरा दौर प्रयोग और खुद को चुनौती देने वाला रहा है। इस दौरान मैंने दो काम किए, अपनी ताकत और कमजोरियों को जाना और खुद को बेहतर बनाया।