अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य कलाकार पदम सिंह कापड़ी और हीरा देवी ही हैं। हैरत होती है यह जानकर की दोनों पेशेवर अभिनेता नहीं हैं पर कैमरे पर यह इतने सहज और स्वाभाविक हैं कि कुछ पल के लिए आप भी भूल जाते हैं कि फिल्म देख रहे हैं। दोनों के बीच की केमिस्ट्री भी कमाल ही है।
वे एक-दूसरे से नोंक-झोंक करते हैं, छोटी-छोटी बातों पर नाराज होते हैं और कभी एक-दूसरे का मजाक भी उड़ाते हैं। पर जब बात एक-दूसरे के लिए खड़े रहने की हो तो पीछे नहीं हटते। दोनों की खामोशी भी फिल्म का खास बनाती है। उनका रिश्ता किसी आदर्श प्रेम कहानी जैसा नहीं, बल्कि बरसों साथ बिताने वाले पति-पत्नी जैसा है।
बुबू के किरदार में पदम सिंह कापड़ी अपनी मौजूदगी से यह एहसास दिलाते हैं कि जब तक वो हैं आमा को कुछ नहीं होगा। फिर एक वक्त बाद जब गांव खाली होने लगता है तो उनकी लाचारी देखकर आपका दिल भर आता है। कुछ दृश्यों में वह इतने स्वाभाविक नजर आते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं कि वह अभिनय कर रहे हैं।
वहीं आमा के किरदार में हीरा देवी अपने तानों से आपके चेहरे पर मुस्कान लाते हैं। वह बुबू से जितना प्यार करती हैं, उतना ही उन्हें परेशान भी करती हैं। पूरी फिल्म में दोनों अपने प्रेम का इजहार बड़े संवादों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से करते हैं।
बाकी कलाकारों ने अपना किरदार बेहद संजीदगी से निभाया है। इस क्षेत्र में फिल्म में कोई कमी नहीं हैं।
निर्देशन
अपनी पुरानी फिल्मों की तरह विनोद कापड़ी ने इस फिल्म को भी सरल और स्वाभाविक रखा है। इसमें हर एक छोटे सीन का बड़ा महत्व है।
उन्होंने एक कहानी और करीबन दो घंटे की एक फिल्म में हर तरह का इमोशन पेश किया है। कहानी के जरिए वह जिंदगी के कई पहलुओं को छूने में सफल होते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के भावनात्मक प्रभाव को बढ़ाती है। पहाड़ों और फैली हुई वादियों को बड़े फ्रेम में दिखाया गया है। इन विशाल पहाड़ों के बीच दो बुजुर्ग किरदार बेहद छोटे दिखाई देते हैं।
यह दृश्यात्मक विरोधाभास उनके अकेलेपन को बिना कुछ कहे व्यक्त करता है। बीजीएम कहानी के मुताबिक चलता है। बारिश की आवाज और आसपास के प्राकृतिक वातावरण की ध्वनियां दर्शकों को उस गांव की दुनिया में ले जाती हैं। ठंड, सन्नाटा और लंबे होते दिन सब कुछ महसूस होता है।
'पायर' की सबसे बड़ी दिक्कत इसकी धीमी रफ्तार है। आम दर्शक इस फिल्म में डूबने में वक्त ले सकते हैं। हो सकता है कि उनके सब्र का इम्तिहान लिया जाए। कुछ हिस्सों में संपादन ज्यादा चुस्त होता, तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था।
देखें या नहीं?
'पायर' उन फिल्मों में है, जो मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को अपने जीवन और रिश्तों पर सोचने का मौका देती हैं। यह बुढ़ापे की चुनौतियों, गांवों से पलायन और परिवारों के बीच बढ़ती दूरी को एक बुजुर्ग दंपती की कहानी में पिरोती है।
अगर आप मार्मिक और गहरे अर्थ वाला सिनेमा देखना पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। पर अगर आप सिर्फ एंटरटेनमेंट ढूंढ रहे हैं तो यह ऑप्शन आपके लिए नहीं है।
हां यह जरूर है कि फिल्म देखने के बाद यकीनन आप अपने माता-पिता या दादा-दादी को फोन करने और उनके साथ कुछ वक्त बिताना चाहेंगे।