भारत का हृदय गांव में बसता है। मगर, व्यक्ति रोजगार व अन्य जरूरतों के लिए गांव से शहर की तरफ पलायन करता है। दिल में उम्मीद होती है कि एक दिन गांव में वापसी होगी। पीछे छूट गए मां-बाप भी इसी आस में होते हैं कि संतान अपने ठौर लौटेगी। मगर, जिंदगी थोड़ी अलग तरह चलती है। माता-पिता के इंतजार और बच्चों के गांव वापसी की उम्मीद...दोनों चलती रहती हैं। कुछ इसी पर आधारित है फिल्म 'पायर'। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता विनोद कापड़ी की यह फिल्म कई इंटरनेशनल फिल्म समारोह में पहले ही तालियां बटोर चुकी है। अब भारत में भी इसकी दस्तक होने को है। जानिए इस फिल्म के बारे में...
पायर
- फोटो : एक्स: @vinodkapri
भावुक कर रही फिल्म 'पायर'
इस फिल्म की कहानी इतनी मार्मिक है कि इसे देखने वालों की आंखें नम हो रही हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक इसे देख भावुक हो रहे हैं। 'पायर' Pyre का अर्थ होता है चिता। इस फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान लोगों के आंसू छलक आए। सिर्फ भारत ही नहीं, एस्टोनिया से लेकर यूरोप, उत्तरी अमेरिका और एशिया के फिल्म समारोहों तक पहुंची इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों ने भी सराहा है।
पायर
- फोटो : एक्स: @vinodkapri
क्या है 'पायर' की कहानी?
'पायर' सच्ची कहानी से प्रेरित है। यह मुनस्यारी के एक गांव के एक बुजुर्ग जोड़े की कहानी है। उत्तराखंड से लगातार पलायन के कारण वीरान हो चुके भूतहा गांवों की पृष्ठभूमि में यह जोड़ा मौत का इंतजार कर रहा था, लेकिन एक-दूसरे के लिए उनके प्यार ने विनोद के दिल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उन्होंने यह फिल्म बनाने का फैसला किया। फिल्म प्यार, अकेलेपन, यादों और बच्चों के पलायन के बीच माता-पिता के इंतजार की कहानी बयां करती है। गैर-पेशेवर कलाकार पद्म सिंह और हीरा देवी 'पायर' में मुख्य किरदार में हैं। फिल्म में इन दोनों की मासूमियत से भरी प्रेम कहानी दिखाई गई है।
विनोद कापड़ी के साथ 'पायर' के आमा-बुबू
- फोटो : फेसबुक: Vinod Kapri
पहली बार कैमरे के सामने आए आमा बुबू
- विनोद कापड़ी के लिए पदम सिंह और हीरा देवी को ढूंढना एक असाधारण अनुभव था। उनके रिश्ते, उनकी खामोशी और भावनाओं ने पर्दे पर ऐसी सच्चाई ला दी, जिसे कोई पेशेवर कलाकार दोबारा नहीं बना सकता था।
- बता दें कि फिल्म में पदम सिंह का किरदार निभाने वाले पदम सिंह कापड़ी रिटायर्ड आर्मी मैन हैं। वहीं तुलसी का किरदार निभाने वाली हीरा देवी एक गृहिणी और पूर्व डांसर हैं।
- फिल्म की सबसे खास बात भी यही है कि दोनों मुख्य कलाकार पद्म सिंह और हीरा देवी बुजुर्ग और स्थानीय हैं। दोनों ने ही कभी इससे पहले कैमरा या फिल्म नहीं देखी थी।
- पेशेवर कलाकार न होने के बावजूद वे आमा बुबू के किरादरों में जिस खूबी से ढले हैं, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत बन पड़ी है। पद्म सिंह और हीरा देवी को आमा बुबू के रूप में देखना दर्शकों के लिए भी खास पल है।
ऑस्कर विजेता दिग्गजों ने सजाया संगीत
इस फिल्म का संगीत भी कम खास नहीं। आखिर ऑस्कर पुरस्करा विजेताओं ने जो जिम्मा संभाला है। जी हां, दो एकेडमी अवॉर्ड विनर्स ने 'पायर' के लिए साथ मिलकर काम किया। मशहूर गीतकार, कवि, फिल्ममेकर और एकेडमी अवॉर्ड विजेता गुलजार और एकेडमी अवॉर्ड विजेता कैनेडियन कंपोजर माइकल डाना और सार सिंघल 'पायर' के लिए एक साथ आए हैं, ताकि मशहूर क्लासिकल सिंगर श्रुति सडोलिकर का गाया गाना 'झिरझिर बरस रहते हो बदरा' बनाया जा सके। यह गाना दिलों को छूता है और इमोशनल कर देता है।
विनोद कापड़ी के साथ 'पायर' के आमा-बुबू
- फोटो : फेसबुक: Vinod Kapri
सात समंदर पार अपनी फिल्म देखने पहुंचे थे आमा बुबू
यह फिल्म कई इंटरनेशनल फिल्म समारोह में प्रदर्शित हो चुकी है। ऐसे ही नवंबर 2024 में ‘तेलिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल’ में विनोद कापड़ी की यह फिल्म प्रदर्शित हुई। यूरोप के देश एस्टोनिया की राजधानी तेलिन में आयोजित होने वाले ‘तेलिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल’ में भारत से फिल्म 'पायर' को फिल्म गाला कैटेगरी में प्रदर्शित किया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय महोत्सव का हिस्सा बनने के लिए पद्म सिंह और हीरा देवी भी फिल्म के निर्देशक विनोद कापड़ी के साथ एस्टोनिया की राजधानी तेलिन गए थे। उन्होंने विदेश में इसका प्रीमियर देखा था।
भारत में कब आएगी 'पायर'?
यह फिल्म 30 अक्तूबर को भारत में हिंदी और मलयालम में पूरे रिलीज हो रही है। फिल्म 'पायर' भारत में रिलीज होने से पहले ही दुनियाभर में डंका बजा चुकी है। अब तक 18 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीत चुकी है।
रत्ना पाठक और नसीरुद्दीन शाह
- फोटो : इंस्टाग्राम @nehasargam
पहले नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक निभाने वाले थे मुख्य भूमिका?
आयुष्मान खुराना से लेकर विशाल भारद्वाज और मनोज बाजपेयी तक, इंडस्ट्री के कई सितारों ने फिल्म की तारीफ की है। नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह ने फिल्म की तारीफ में कहा है, 'हम वह नहीं कर सकते थे, जो इन्होंने किया'। यह तारीफ इसलिए भी खास है, क्योंकि नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह कभी इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार हुए थे। बाद में कहानी की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए स्थानीय लोगों को कलाकार बनाने का निर्णय लिया गया। आखिर पदम सिंह और हीरा देवी इस फिल्म का चेहरा बने।
पायर
- फोटो : अमर उजाला
फिल्म से जुड़ी खास बातें और उपलब्धियां
- 'पायर' का वर्ल्ड प्रीमियर 28वें टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में हुआ था, जहां फिल्म ने POFF बेस्ट फिल्म ऑडियंस अवॉर्ड जीता था।
- इसके बाद फिल्म को साओ पाउलो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, कैम्ब्रिज फिल्म फेस्टिवल, बाथ फिल्म फेस्टिवल, फज्र इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और केरल के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल समेत कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया।
- मेकर्स के मुताबिक, फिल्म अब तक 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है, जिनमें 15 बेस्ट फिल्म अवॉर्ड शामिल हैं।
- इसे सर्बिया और बोस्टन में बेस्ट डायरेक्टर के पुरस्कार भी मिले हैं।
- इसके अलावा फिल्म के संगीत, सिनेमैटोग्राफी और साउंड के लिए भी इसे सम्मान मिला है।
- फिल्म को विनोद कापड़ी, सुरेश जोशी और अरिंद्र राय चौधरी ने भागीरथी फिल्म्स और मशकबीन स्टूडियोज के बैनर तले प्रोड्यूस किया है।
- सिनेपोलिस भारत के सिनेमाघरों में फिल्म को रिलीज करेगा।
- फिल्म का संगीत माइकल डैना ने तैयार किया है, जो 'लाइफ ऑफ पाई', 'मॉनसून वेडिंग', 'लिटिल मिस सनशाइन' और 'मनीबॉल' जैसी फिल्में देखने के लिए जाएं।
- फिल्म के गीत गुलजार ने लिखे हैं।
पायर
- फोटो : एक्स: @vinodkapri
दूर-दराज पहाड़ों तक फिल्म पहुंचाने का अनोखा प्रयोग
इस फिल्म की टीम ने इसे उन कस्बों तक पहुंचाने का अनोखा प्रयोग किया, जहां नियमित सिनेमा हॉल उपलब्ध नहीं हैं। उत्तराखंड के बेरीनाग, बागेश्वर और श्रीनगर गढ़वाल में मोबाइल थिएटर के जरिये बड़े पर्दे पर फिल्म दिखाने की व्यवस्था की गई। इस पहल का उद्देश्य था कि लोगों को सिनेमा देखने के लिए शहरों तक आने की मजबूरी न हो। सिनेमा खुद उनके पास पहुंचे। फिल्म की टीम के अनुसार, इस पहल के तहत 50 शो आयोजित किए गए, सभी शो हाउसफुल रहे और लगभग 10,000 दर्शकों तक फिल्म पहुंची।
- रानीखेत में कुमाऊं रेजिमेंट और लैंसडाउन में गढ़वाल राइफल्स के लिए हुई विशेष स्क्रीनिंग ने इस यात्रा में एक और भावनात्मक अध्याय जोड़ा।
- सैकड़ों सैनिकों और अधिकारियों के बीच आमा-बूबू की कहानी का पहुंचना इस बात का उदाहरण था कि एक छोटी और शांत फिल्म भी अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से जुड़ सकती है।
- इस फिल्म में एक बच्चा अपने दादा-दादी को देख सकता है। एक युवा अपने माता-पिता को और एक बुज़ुर्ग अपने जीवन के उन रिश्तों को, जिनका महत्व समय बीतने के साथ और बढ़ जाता है।