फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Sanvika: जब रक्षाबंधन के दिन फूट-फूटकर रोई थीं ‘पंचायत’ की रिंकी, बोलीं- 'हम बहनें ही आपस में राखी बांधते थे'

सार

Sanvika On Rakshabandhan: पंचायत की रिंकी तो आपको याद ही होगी। रिंकी का किरदार निभाने वाली सान्विका ने रक्षाबंधन को लेकर अपने बचपन को याद किया। उन्होंने इस खास त्यौहार से जुड़े कई किस्से साझा किए।
विज्ञापन
सान्विका - फोटो : इंस्टाग्राम-@iamsanvikaa
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

रक्षाबंधन सिर्फ एक धागा नहीं, वो रिश्ता है जो बिना कहे जुड़ता है। 'पंचायत' फेम रिंकी उर्फ सान्विका के लिए यह त्योहार केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दिल के बहुत करीब एक गहरा एहसास है। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने अपने बचपन की यादों, बहनों के साथ रिश्ते और उन पलों को साझा किया, जब राखी ने अकेलेपन का गहरा एहसास दिलाया। रक्षाबंधन को लेकर सान्विका की यादों को जानते हैं उनकी ही जुबानी। 

हम बहनें ही एक-दूसरे को राखी बांधते थे

विज्ञापन

रक्षाबंधन से जुड़ी अपनी यादों को बताते हुए सान्विका कहती हैं, “हमारे परिवार में कोई भाई नहीं है, लेकिन बहनों के साथ रक्षाबंधन का जश्न हमेशा खास रहा। हम बहनें आपस में एक-दूसरे को राखी बांधते थे। ये बात इस त्योहार को मेरे लिए और भी खास बना देती थी। बचपन में ये भी तय था कि नए कपड़े साल में सिर्फ तीन बार मिलते थे। जन्मदिन, रक्षाबंधन और दीवाली पर। रक्षाबंधन से पहले मम्मी-पापा के साथ बाजार जाना, मिठाई खरीदना, कपड़े चुनना - सब कुछ मिलकर बहुत खुशियां लाता था। ये सब अब बहुत याद आता है।”

सान्विका - फोटो : इंस्टाग्राम-@iamsanvikaa

मेरी बहनें ही मेरी ताकत हैं
सान्विका आगे कहती हैं, “मेरी बहनें मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं। वो मेरे लिए मां जैसी हैं। उनमें एक खास तरह की फाइटिंग स्पिरिट है। मानसिक और शारीरिक, दोनों रूप में। लोग अक्सर कहते थे कि बेटियां हैं, भाई नहीं है, तो घर कमजोर होगा। लेकिन मेरी बहन ने हर बार डटकर गलत के खिलाफ खड़ा होकर ये साबित किया कि हम कमजोर नहीं हैं।
मेरी बहनें वो भी समझ जाती हैं जो मैं कहती नहीं हूं। वो महसूस कर लेती हैं कि मैं क्या सोच रही हूं, क्या महसूस कर रही हूं। हमारे बीच कभी-कभी बहस होती है, लेकिन प्यार और भरोसा हमेशा बना रहता है। हर बार ये लगता है कि कोई तो है जो बिना कहे भी मुझे पूरी तरह समझता है।”

खुद से बनाती थी राखियां
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए सान्विका आगे कहती हैं, “मैं बगीचे से पत्ते और फूल लाकर ग्रीटिंग कार्ड्स बनाती थी। कभी-कभी राखियां भी खुद से बनाती थी। स्कूल के एसयूपीडब्ल्यू पीरियड में ये सब सिखाया जाता था। मैं वो राखियां मम्मी, पापा और बहनों को देती थी। सबके चेहरे पर मुस्कान देखकर बहुत अच्छा लगता था।”

विज्ञापन

सान्विका - फोटो : इंस्टाग्राम-@iamsanvikaa
कॉल कटते ही फूट-फूटकर रोई थी
सान्विका का कहना है कि रक्षाबंधन सिर्फ राखी बांधने का दिन नहीं है। ये त्योहार हर साल मुझे ये एहसास कराता है कि मेरे पास कोई है जो हमेशा मेरे साथ खड़ा है। ये सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक याद है जो हर बार दिल को छू जाती है। रक्षाबंधन मेरे जीवन के सबसे खूबसूरत एहसासों में से एक है।
जब मैं मुंबई शिफ्ट हुई थी और रक्षाबंधन पर घर नहीं जा पाई, तो कॉल कटते ही मैं फूट-फूटकर रोई थी। उस दिन बहुत अकेलापन महसूस हुआ। रक्षाबंधन और दीवाली जैसे त्योहार तब बहुत खाली लगते थे। बचपन से हम ये त्योहार सब साथ मिलकर मनाते थे, इसलिए जब सब कुछ दूर हो गया, तो उस दूरी का एहसास बहुत भारी लगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें