क्रांतिवीर फिल्म के लिए नाना पाटेकर को फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। महान अभिनेता दिलीप कुमार जब उन्हें पु
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सिनेमा ने रंगों के रास्ते बुलाया, अभिनय के रंग जोड़े
जनवरी 2006 में उनसे हुई छोटी-सी मुलाकात अब बहुत दूर की चीज लगती है। फिल्म 'अपहरण' रिलीज हो चुकी थी। नाना सामने थे, लेकिन मैं उन्हें अभिनेता की तरह नहीं देख पा रहा था। मेरे लिए उस समय वह सर जेजे इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट' के पुराने विद्यार्थी थे। ऐसा आदमी, जिसने कभी रंगों के सामने बैठकर दुनिया को देखा होगा। उन्होंने कहा, मैं चित्रकार पहले हूं, एक्टर बाद में। कभी-कभी आदमी अपने बारे में एक वाक्य कहता है और फिर उसके बारे में बहुत कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती। नाना ने बताया था कि मुजफ्फर अली की ‘गमन’ के पोस्टर और पब्लिसिटी डिजाइन उन्होंने किए थे। उसी फिल्म में छोटी भूमिका भी मिली थी। सिनेमा ने उन्हें पहले रंगों के रास्ते बुलाया था, फिर अभिनय के रास्ते।नाना की कठोरता के भीतर एक मुलायम जगह थी, जिसे वह बहुत बचाकर रखते थे। किसी जरूरतमंद की मदद करनी हो तो शायद उन्हें यह बताने की भी जरूरत नहीं थी कि उन्होंने किसी की मदद की है। वे ठीक वैसे ही थे, जैसे गांव में कुछ लोग होते हैं। कई बार वे आपसे सहमत नहीं भी होते, लेकिन संकट में सबसे पहले उन्हीं को आप अपने दरवाजे पर पाते हैं। क्या यह वह कारण नहीं है कि जिस आदमी को पूरा देश जानता था, उसे गांव में रहना अच्छा लगता था। शहर ने उन्हें आभामंडल दिया था। गांव ने आदमी बनाए रखा। उनके भीतर मिट्टी थी। मिट्टी की अपनी गंध होती है। कितनी भी दूर चले जाइए, वह गंध साथ रहती है। नाना के साथ भी रही।
नाना चले गए हैं। कुछ कलाकार फिल्में छोड़ जाते हैं, कुछ संवाद, कुछ अपनी छवियां, नाना इससे कुछ अधिक छोड़ गए हैं और वह है-उनका अपना स्वभाव।
महाराष्ट्र : सूखा ग्रस्त महिला किसानों के बीच नाना।
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असरदार असल जिंदगी...नदी-तालाब बचाए मुसीबत में किसानों के साथ खड़े रहे नाना
पर्दे पर गुस्से व संघर्ष की आवाज बने नाना ने कैमरे से बाहर महाराष्ट्र के किसानों और गांवों के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी। 2015 में अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की।
सम्मान की लड़ाई : नाना ने नाम की मदद से सूखाग्रस्त इलाकों में नदियों और नालों को गहरा और चौड़ा करने, पुराने जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने, नहरों की मरम्मत और खेत तालाब बनाने जैसे काम किए। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए बारिश के पानी का संचय कर जमीन के भीतर पहुंचाया। इससे आसपास के कुओं और सिंचाई व्यवस्था में भी सुधार हुआ।
आत्मनिर्भर बनाने पर जोर : नाना ने किसान को सिर्फ मदद पाने वाला मानने के बजाय उसे फिर आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया। तत्काल आर्थिक मदद से इतर, पानी की समस्या का स्थायी समाधान तलाशा, खेती को फिर खड़ा किया और किसान परिवारों को आत्मनिर्भर बनाया।
पुणे के एग्रीकल्चर कॉलेज में बिना केमिकल वाली खेती पर चर्चा करते नाना पाटेकर।
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10 साल में 178 नदियों को संवारा, कई राज्यों में फैला रहे जागरूकता
नाना का नाम फाउंडेशन 2015 से 2025 के बीच महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में 2,246 जलस्रोतों का पुनरुद्धार किया। 178 नदियों को संवारा। 515 नालों और जलधाराओं को गहरा और चौड़ा किया गया। 769 टैंकों के गाद निकाले गए।
संस्था महाराष्ट्र के अलावा असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर में शहीदों के बच्चों के लिए स्कूल बनाने का काम कर रही है। साथ ही, बाढ़ प्रभावितों की मदद में भी जुटी है। मेघालय और असम को भी बाद में इन राज्यों से जोड़ा गया। संस्थान ने बिहार में बाढ़ से प्रभावित गांवों के पुनर्निर्माण में भी योगदान दिया।