‘जिम में लोग कहते थे... मॉडलिंग कर लो... तभी सोचा, क्यों नहीं?’
‘मैं जिम में ट्रेनिंग देता था, लोग अक्सर कहते थे - तुम मॉडलिंग क्यों नहीं करते? पहले मैं हंसकर टाल देता था, लेकिन धीरे-धीरे वो बात मेरे अंदर उतर गई। मैंने सोचा, एक बार कोशिश जरूर करनी चाहिए।’
एक दिन मिला मिस्टर इंडिया का कॉल... और जिंदगी बदल गई
पिछले साल शुभम ने एक्टिंग और मॉडलिंग की शुरुआत की। इसी साल एक चमत्कार हुआ जब मिस्टर इंडिया की टीम ने कॉल किया और पूछा कि क्या मैं कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेना चाहता हूं। शुभम कहते हैं, ‘मुझे खुद यकीन नहीं हुआ, लेकिन मैंने तुरंत हां कर दी। और फिर पहली ही कोशिश में मैं मिस्टर इंडिया 2025 बन गया।’
शुभम बताते हैं, ‘इस बदलाव से मैंने दो बड़ी बातें सीखी हैं। पहली, हमेशा पॉजिटिव सोच रखो, चाहे हालात कैसे भी हों। यही सोच आपकी दिशा तय करती है। दूसरी, डिसिप्लिन से बड़ा कोई टूल नहीं है। अगर आप मेहनती और समर्पित हो, तो कोई भी सपना दूर नहीं।’
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फुटबॉल से मिली जिंदगी की ट्रेनिंग
शुभम नेशनल लेवल फुटबॉलर रहे हैं। वे बताते हैं, ‘फुटबॉल ने मुझे सिखाया कि हर मैच में जीत नहीं मिलती, लेकिन हर हार से कुछ सीखने को मिलता है। यही माइंडसेट मैं रैंप वॉक में भी लाता हूं। हर वॉक, हर शूट मेरे लिए प्रैक्टिस का हिस्सा है।’
‘किक्सटार्टिंग ड्रीम्स’- जहां बच्चे सिर्फ बॉल नहीं, उम्मीदें पकड़ते हैं
बच्चों को फुटबॉल के जरिए जिंदगी से जोड़ने वाला शुभम का ‘किक्सटार्टिंग ड्रीम्स’ एक बेहद भावुक मिशन है। वे कहते हैं, ‘मैंने देखा है कि स्लम एरिया और अनाथ बच्चों के पास खेलने के लिए न तो सुरक्षित जगह होती है, न गाइडेंस। मैंने सोचा कि फुटबॉल के जरिए उनमें फोकस, कॉन्फिडेंस और टीमवर्क डाल सकता हूं।’
शुभम को एक घटना आज भी याद है, ‘एक बच्चा कैंप में मेरे पास आया और बोला, भैया, मुझे कभी नहीं लगा था कि मैं फुटबॉल खेल सकता हूं। उसकी आंखों में उम्मीद और यकीन था। उसी वक्त मुझे महसूस हुआ कि मैं सही रास्ते पर हूं।’
‘अब मैं 1.4 अरब सपनों का चेहरा बनने जा रहा हूं’
‘मिस्टर सुपरानेशनल’ जैसे बड़े मंच पर भारत को रिप्रेजेंट करना मेरे लिए सम्मान से बढ़कर जिम्मेदारी है, शुभम कहते हैं। ‘अब मैं हर कदम सोच-समझकर उठाता हूं। मानसिक रूप से खुद को ग्राउंडेड रखता हूं। मैं प्रार्थना करता हूं, मेडिटेशन करता हूं। फिजिकली रैंप वॉक, वॉइस ट्रेनिंग, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट - हर पहलू पर काम कर रहा हूं।’
‘पहले इंग्लिश से डरता था, अब मेरी आवाज मेरी ताकत है’
शुभम बताते हैं, ‘मैं पहले इंट्रोवर्ट था। इंग्लिश मेरी पहली भाषा नहीं थी, इसलिए डर लगता था कि लोग क्या सोचेंगे। लेकिन मेरी कोचिंग में सबसे बड़ा फर्क वॉइस मोड्युलेशन और कम्युनिकेशन ट्रेनिंग ने डाला। अब मुझे लगता है कि जो मैं सोचता हूं, वो बोल भी पाता हूं। यही मेरी सबसे बड़ी ताकत बन गई है।’