महीनों की बहस, सेंसर बोर्ड की खींचतान और कोर्टरूम ड्रामे के बाद आखिरकार विपुल अमृतलाल शाह की फिल्म 'द केरल स्टोरी 2 गोज बियोंड' रिलीज तो हो गई। लेकिन मजेदार बात ये है कि फिल्म की कहानी से ज्यादा ड्रामा असल में हुआ। थिएटर में पर्दा उठते ही साफ लग जाता है कि ये फिल्म किसी गहरी कहानी या थ्रिलर बनने की कोशिश नहीं कर रही। ये बस अपनी बात (या कहें एजेंडा) दोहराती नजर आती है।
फिल्म में दिखाया गया है कि कुछ किरदार एक कथित गजवा-ए-हिंद मिशन के तहत धर्म विशेष की लड़कियों को प्यार और शादी के नाम पर फंसाते हैं। उनका मकसद लड़कियों का धर्म बदलवाना, उन पर दबाव डालना और उन्हें अपने हिसाब से इस्तेमाल करना है। कहानी ऐसे दिखाती है जैसे यह सब एक बड़ी साजिश का हिस्सा हो।
'द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड' रिव्यू
- फोटो : एक्स (ट्विटर)
कहानी
फिल्म तीन लड़कियों की कहानी दिखाती है - दिव्या, नेहा और सुरेखा... जो भारत के अलग-अलग शहरों से हैं और अपनी-अपनी जिंदगी में सपने देख रही होती हैं। लेकिन इनकी जर्नी जल्द ही एक ही दिशा पकड़ लेती है। हर लड़की को एक ऐसा लड़का मिलता है, जो पहले तो प्यार दिखाता है और बाद में अपनी असली पहचान व मकसद दिखाता है।
दिव्या (अदिति भाटिया) 16 साल की डांसर, जिसे शोहरत के नाम पर फंसाया जाता है। नेहा (ऐश्वर्या ओझा) एथलीट, जिसे प्यार का भ्रम देकर धोखा मिलता है। सुरेखा (उल्का गुप्ता) UPSC की तैयारी कर रही लड़की, जो एक पत्रकार के नाम पर शुरू हुए रिश्ते में गहराई से फंस जाती है।
इसके बाद फिल्म में शुरू होती है जबरदस्ती, हिंसा, डर, धमकी और बार-बार वही घटनाएं। कई सीन असरदार तो हैं, लेकिन कहानी कहीं आगे नहीं बढ़ती। ऐसा लगता है जैसे ऑडियंस इमोशनल रोलर-कोस्टर पर नहीं, बल्कि एक लंबी, थका देने वाली फिल्म देख रहे हैं।
सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि किरदारों को भागने या कुछ बदलने के मौके दिखते हैं, लेकिन वे बस फैसले न लेकर आगे बढ़ते रहते हैं। वही फैसले, जो कहानी को फिल्म की अपनी थीसिस के हिसाब से चलाते हैं।
'द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड'
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एक्टिंग
फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा इसका अभिनय है। उल्का, अदिति और ऐश्वर्या ने अपने किरदारों का डर, दर्द और उलझन बहुत ही सच्चाई से दिखाई है। इनके साथ-साथ सपोर्टिंग कास्ट में सुमित गहलावत, अर्जन सिंह औजला और युक्तम खोसला ने भी अपने रोल ईमानदारी से निभाए हैं। उनकी एक्टिंग कहानी को और भी असली व असरदार बना देती है।
सपोर्टिंग कास्ट की बात करें तो खासकर माता–पिता की भूमिका निभाने वाले कलाकार पुरवा पराग, रामजी बाली, राजीव कुमार, श्वेता मुंशी, अभिषेक शंकर और लक्ष्मी सभी ने बेहद सच्ची और प्रभावशाली परफॉरमेंस दी है। खासकर केरल के माता–पिता वाला क्लाइमैक्स सीन बहुत ही स्वाभाविक और दिल को छू लेने वाला लगता है।
डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
निर्देशक कमाख्या नारायण सिंह ने फिल्म को एक डॉक्यूमेंट्री-स्टाइल टोन दिया है, जिसमें रियल घटनाओं से प्रेरित सीन्स, तीखे संवाद और तेज रफ्तार एडिटिंग लगातार ऑडियंस को असहज लेकिन सचेत बनाए रखते हैं।
हां, कुछ स्थानों पर फिल्म जरूरत से ज्यादा ड्रामेटिक और एकतरफा लगती है। हालांकि, इसका भावनात्मक असर और विषय की गंभीरता इसे पूरी तरह अनदेखा करना मुश्किल बनाते हैं।
द केरल स्टोरी 2 रिव्यू
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नेगेटिव पॉइंट
फिल्म की सबसे बड़ी कमी ये है कि भले ही विपुल अमृतलाल शाह ऐसा कहते हैं कि वो किसी भी समुदाय को टार्गेट नहीं कर रहे, लेकिन फिल्म देखते वक्त साफ महसूस होता है कि कहानी एक विशेष समुदाय को निगेटिव दिखाने की तरफ झुकी हुई है।
इसके अलावा कई किरदार ठीक से विकसित नहीं किए गए, जिससे उनके फैसले अवास्तविक लगते हैं और कहानी में गहराई नहीं आती।
संवेदनशील विषय होने के बावजूद फिल्म कई जगह प्रचार जैसी महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे अलग-अलग नजरियों को दिखाने की बजाय कहानी को बस एक ही दिशा में धकेला गया है। जिसकी वजह से फिल्म का असर कमजोर पड़ जाता है।
द केरल स्टोरी 2 रिव्यू
- फोटो : सोशल मीडिया
देखे या नहीं
अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो तीखे मुद्दों पर बनी हों और भावनात्मक तौर पर झकझोरें, तो 'द केरल स्टोरी 2 गोज बियॉन्ड' आपको कुछ हिस्सों में प्रभावशाली लग सकती है। लेकिन अगर आप एक मजबूत, संतुलित और आगे बढ़ने वाली कहानी की उम्मीद करते हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ी निराश कर सकती है।
कई जगह कहानी दोहराव भरी लगती है और संवेदनशील विषय को भी काफी ड्रामेटिक तरीके से दिखाया गया है। इसलिए कुल मिलाकर, यह फिल्म हर किसी के लिए नहीं है - आप इसे देखें या नहीं, यह पूरी तरह आपकी पसंद और इस विषय में रुचि पर निर्भर करता है।