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Gandhi Talks Movie Review: असर डालती है विजय सेतुपति की बिना डायलॉग वाली फिल्म, कुछ हिस्सों में पड़ती है हल्की

सार

Vijay Sethupathi and Aditi Rao Hydari Film Review: विजय सेतुपति और अदिति राव हैदरी की अदाकारी वाली फिल्म 'गांधी टॉक्स' रिलीज हो चुकी है। फिल्म की कहानी कैसी है और इसमें कलाकारों का अभिनय कैसा है। यह सारे जवाब इस रिव्यू में मिलेंगे।
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गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : एक्स
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Movie Review
गांधी टॉक्स
कलाकार
विजय सेतुपति , अरविंद स्वामी , अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ जाधव
लेखक
किशोर बेलेकर
निर्देशक
किशोर बेलेकर
निर्माता
उमेश कुमार बंसल , राजेश केजरीवाल , गुरुपाल सच्‍चर , मीरा चोपड़ा और किशोर पांडुरंग बेलेकर
रिलीज डेट
30 जनवरी 2026
रेटिंग
3.5/5

विस्तार
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गांधी टॉक्स हाल के वर्षों में भारतीय सिनेमा में किया गया एक हिम्मत भरा और अलग प्रयोग है। यह आज की तेज रफ्तार डायलॉग भरी फिल्मों के बीच बनी एक पूरी तरह साइलेंट फिल्म है। फिल्म में विजय सेतुपति मुख्य भूमिका में हैं और ए आर रहमान का भावनाओं से भरा संगीत कहानी को और गहरा प्रभाव देता है।
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यह फिल्म उस पुरानी लगभग खो चुकी कला को फिर से सामने लाती है जिसमें कहानी बिना डायलॉग के सिर्फ विजुअल्स और एक्सप्रेशन से आगे बढ़ती है। आधुनिक समाज लालच और नैतिकता पर इसका व्यंग्य भी साफ दिखाई देता है। आइडिया बड़ा है, विजुअल्स मजबूत हैं और थीम भी असरदार है, बस कुछ हिस्सों में रफ्तार धीमी महसूस होती है और कुछ सीन उतने प्रभावी नहीं लगते।

गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : यूट्यूब
कहानी
कहानी शुरू होती है महादेव (विजय सेतुपति) से। वह एक पढ़ा-लिखा युवक है जो नौकरी की तलाश में भटक रहा है। जिस समाज में वह रहता है वहां आर्थिक रूप से पीछे रह जाना मतलब लगभग हमेशा पीछे ही रह जाना है। ऊपर से जब वह नौकरी मांगने जाता है तो उसे भ्रष्टाचार और सिफारिश जैसी मुश्किलें भी झेलनी पड़ती हैं। हर नाकामी के साथ उसकी उम्मीद थोड़ी और कम होती जाती है।
इसके समानांतर चलती है बोस्मैन (अरविंद स्वामी) की कहानी। वह एक अमीर बिजनेसमैन है जिसे बाहर से देखने पर लगता है कि उसके पास सब कुछ है, लेकिन अंदर से वह खोखलापन और तनाव से भरा हुआ है। धीरे-धीरे महादेव और बोस्मैन की दुनिया आपस में टकराती है और इस टकराव में लालच परेशानी उम्मीद और इंसानियत एक-साथ सामने आने लगते हैं। पूरी फिल्म बिना डायलॉग के चलती है और कहानी को आगे बढ़ाते हैं सिर्फ चेहरों के भाव, छोटे इशारे, विजुअल संकेत और रहमान का संगीत।

गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : यूट्यूब
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय है। विजय सेतुपति बिना एक शब्द बोले सिर्फ चेहरे और बॉडी लैंग्वेज से मासूमियत डर गुस्सा उम्मीद और टूटन, हर भावना को बारीकी से दिखाते हैं। उनके छोटे-छोटे एक्सप्रेशन्स बेहद असली लगते हैं। अरविंद स्वामी अपने शांत और गंभीर अंदाज से ध्यान खींचते हैं। उनके चेहरे पर दिखता हल्का तनाव उनके किरदार की उलझन को बखूबी दिखाता है। अदिति राव हैदरी महादेव की लव इंटरेस्ट हैं और उनकी मौजूदगी कहानी में नरमी और भावनात्मक मोमेंट्स जोड़ती है।
सिद्धार्थ जाधव एक छोटे चोर के रूप में फिल्म में हलचल डार्क ह्यूमर और समाज पर चुटीला तंज लाते हैं। उनके सीन आते ही स्क्रीन पर एक अलग ऊर्जा आ जाती है। चारों कलाकार मिलकर फिल्म को बिना डायलॉग के भी असरदार बना देते हैं।

गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : यूट्यूब
निर्देशन
निर्देशक किशोर बेलेकर ने फिल्म को बेहद अलग अंदाज में बनाया है। उन्होंने एक्सप्रेशन और माहौल के सहारे कहानी कहने की हिम्मत दिखाई है। कई सीन ऐसे बनाए गए हैं कि दर्शक खुद महसूस करें समझें और कहानी से जुड़ें। हां कुछ प्रतीक जैसे गांधी की तस्वीरें पैसों से जुड़े शॉट्स और बढ़े-चढ़े इशारे कभी-कभी ज्यादा दिखाई देते हैं, जिससे वे थोड़ा ओवर महसूस होते हैं। लेकिन कुल मिलाकर उनकी डायरेक्शन फिल्म को एक खास याद रहने वाली पहचान देती है।

गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : यूट्यूब
नेगेटिव पॉइंट्स
साइलेंट फॉर्मेट सबको पसंद नहीं आएगा। कुछ हिस्सों में कहानी धीमी और थोड़ी लंबी लगती है। डायलॉग न होने से कुछ किरदार उतने गहरे नहीं लगते, खासकर महिला किरदार। कुछ इमोशनल या रोमांटिक पल उतना असर नहीं छोड़ते। तेज मनोरंजन या मसाला चाहने वाले दर्शकों को यह फिल्म भारी लग सकती है।
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गांधी टॉक्स रिव्यू - फोटो : यूट्यूब
देखें या नहीं
अगर आपको अलग तरह की प्रयोगात्मक और विजुअल पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो 'गांधी टॉक्स' आपके लिए एक अच्छा अनुभव हो सकती है। हमारे भारतीय सिनेमा की शुरुआत भी इसी तरह की फिल्मों से हुई थी। दादा साहेब फाल्के की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' भी एक साइलेंट फिल्म थी, जहां पूरी कहानी सिर्फ भाव और विजुअल्स से आगे बढ़ती थी। 'गांधी टॉक्स' उसी पुराने साइलेंट दौर को आज के समय में नए तरीके से पेश करती है।
लेकिन अगर आप तेज हल्की-फुल्की या डायलॉग वाली फिल्में पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपको थोड़ी धीमी और भारी लग सकती है।

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