कहानी
फिल्म की शुरुआत 1994 से होती है जहां मंजू देवी (नीना गुप्ता) को डबल मर्डर के इल्जाम में 28 साल की सजा सुनाई जाती है। 28 साल से मंजू जिस जेल में बंद हैं उसी जेल का गार्ड शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) उससे प्यार करता है। शंभु जेल की सब्जियां चुराकर बाहर बेचता है और मंजू को जो भी मदद चाहिए हाेती है वो उसे उपलब्ध कराता है।
इसी बीच प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) को जेल का नया अधीक्षक नियुक्त किया जाता है। दूसरी तरफ जेल के एक बिगड़ैल कैदी केशव (अक्षय डोगरा) की, 23 वर्षीय महिला कैदी नैना (योगिता बिहानी) पर नजरें खराब हो जाती हैं। एक रात कुछ ऐसा होता है कि प्रकाश, केशव की पिटाई कर देता है जिसके बाद केशव जेल से गायब हो जाता है।
जांच बैठती है और पड़ताल करने के लिए इंस्पेक्टर अतीत सिंह (अमित के सिंह) जेल आते हैं। आगे की पूरी कहानी केशव को ढूंढने और उसके साथ क्या हुआ? इस बारे बात करती है।
कैसी है फिल्म ?
फिल्म की शुरुआत में ही संजय और नीना के बीच एक दृश्य है। दोनों तारों से भरे आसमान के नीचे, एक-दूसरे को बिना देखे, जेल की दीवार के आर-पार एक दूसरे से बात कर रहे हैं। इस सीन में एक सुकून, शांति और सच्चे प्यार का आनंद है। इसी सीन से ही आपको अंदाजा लग जाता है कि आगे आप किस तरह के बेहतरीन अभिनय से रूबरू होने वाले हैं।
यह एक मसाला नहीं जिसमें हर पल कुछ न कुछ होता ही रहे। यह आर्ट फिल्म की तरह बढ़ती है इसलिए इसका बिल्ड अप थोड़ा स्लो है पर एक बार जब यह स्पीड पकड़ती है और इंटेंस हो जाती है फिर सस्पेंस बना रहता है। इंटरवल से आधे घंटे पहले यह और मजेदार बन जाती हैं।
वहीं सेकंड हाफ क्लाइमैक्स से पहले थोड़ा स्लो है पर क्लाइमैक्स में पहुंचकर आपको पता चलता है कि आप जो सोच रहे थे वैसा तो कुछ था ही नहीं।
अभिनय
फिल्म के इस डिपार्टमेंट में तो आप निराश हो ही नहीं सकते। नीना गुप्ता हर एक सीन में उम्दा हैं। चुप रहकर भी वो आंखों और एक्सप्रेशन से अभिनय करती हैं। संजय मिश्रा, पूरी फिल्म में आपको अपने से लगते हैं। अपनी मासूमियत से आपका दिल जीतते हैं।
कुमुद मिश्रा जब-जब स्क्रीन पर आते हैं छा जाते हैं। इतने कमाल के कलाकारों के बीच भी अमित सिंह ने अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है। फिल्म में उनका किरदार भी बेहद अहम है। वो कम बोलकर ज्यादा अभिनय करते हैं। योगिता बिहानी, जहां अपनी मासूमियत से आपका दिल जीतती हैं वहीं अक्षय डोगरा से आपको नफरत होती है।
शिल्पा शुक्ला के सीन कम हैं पर अभिनय उनका भी कमाल का है।
निर्देशन
जसपाल सिंह संधू की यह फिल्म काफी इंटेस है। कुछ सीन इतने जानदार हैं कि आप सिहरन महसूस करेंगे। आप फिल्म में इतना डूब चुके होते हैं कि जब एक सीन में प्रकाश सिंह, केशव की पिटाई करता है तो आपको महसूस भी नहीं होता पर आप सीट पर मुट्ठी बांधकर बैठे होते हैं।
किरदारों का दर्द और उनकी तकलीफ आपको भी महसूस होगी। अंत तक यह फिल्म आपको बांधे रखती है। कई बार आपको लगता है कि आपको सब पता है पर अंत में आप बेवकूफ साबित होते हैं।
देखें या नहीं
खूबसूरत फिल्म है। सिनेमाप्रेमियों को जरूर देखना चाहिए। मसाला फिल्में देखने वाले भी देखें कि बिना फालतू किसी ड्रामा के भी अच्छी फिल्में बनाई जा सकती हैं।