यह फिल्म में राज कुंद्रा की पोर्न फिल्म मामले में गिरफ्तारी के बाद आर्थर रोड जेल में बिताए 63 दिनों पर आधरित है। इस फिल्म को देखने से पहले ऐसा लग रहा था कि इस फिल्म को बनाने के पीछे राज कुंद्रा का मकसद शायद खुद की छवि सुधारना रहा होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। इस फिल्म में उन्होंने वहीं कहानी पेश की है, जो उनके साथ मुंबई के आर्थर रोड जेल में 63 दिनों में घटी। राज कुंद्रा को वीआईपी बैरक नंबर 10 में न रखकर आम कैदियों की तरह बैरक नंबर छह में रख दिया जाता है। जिसकी क्षमता 50 कैदियों को रखने की है, उसमे दो सौ कैदी मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह भरे पड़े। राज कुंद्रा के वकील ने आश्वासन दिया था कि उनकी जमानत चार से पांच दिन में हो जाएगी। राज कुंद्रा सोचते हैं कि किसी तरह से चार पांच दिन कट ही जाएंगे।
लेकिन जैसे -जैसे उनकी जमानत याचिका खारिज होती रहती है,वैसे -वैसे उनकी तड़प और बेचैनी बढ़ती जाती है। और, एक समय ऐसा आता है जब वह आम कैदियों की तरह खुद को ढाल लेते हैं। मुंबई के आर्थर रोड जेल में उन कैदियों को रखा जाता है,जिन पर सिर्फ आरोप लगे हैं। उनको दोषी करार नहीं दिया गया है। फिर भी वहां पर बहुत सारे कैदी चार साल- पांच सालों से भरे पड़े हैं, क्योंकि उनकी जमानत कराने वाला कोई सामने से नहीं आया। यह फिल्म जेल प्रशासन की तमाम कमियों को उजागर करती है। इस फिल्म खाने पीने से लेकर वहां के रहन सहन पर बहुत बड़ा सवाल उठाया गया है।
फिल्मों में आम तौर पर जो जेल हम देखते हैं, हकीकत में वैसा जेल बिल्कुल भी नही होता है। जेल की सलाखों से बाहर आने की उम्मीद छोड़ चुके ऐसे तमाम कैदी हैं, जिनकी जमानत हो चुकी है,लेकिन उनके परिवार को पता नहीं है कि कैसे 500 रुपये भरकर उन्हें बाहर निकाला जा सकता है। कुछ लोगों के पास 500 सौ रुपये देने के लिए नहीं है या फिर उनके परिवार का कोई सदस्य नहीं है। जेल में ऐसे 25 प्रतिशत लोग है, जिनको जमानत मिल चुकी है, लेकिन वह बाहर नहीं आ पा रहे हैं। सरकार हर कैदी पर प्रतिदिन तीन रुपये खर्च करती है। इस फिल्म के माध्यम से यह बताने की कोशिश की गई है कि अगर सरकार खुद ही 500 रुपये भरकर उनको जेल से रिहा कर दिया जाए तो महीने के कितने रुपये सरकार के बच सकते हैं। और, वर्षों से जो कैदी जेल में पड़े हैं, वह बहार आ सकते हैं।
फिल्म की खासियत यह है कि इस फिल्म के कलाकार, निर्देशक, कैमरामैन, एडिटर, कॉस्ट्यूम डिजाइनर, कास्टिंग डायरेक्टर, साउंड डिजाइनर और बाकी सभी टेक्नीशियन के करियर की यह पहली फिल्म है। सभी ने अपने हिसाब से फिल्म में अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश की है। फिल्म के निर्देशक शाहनवाज अली ने एक बेहतर फिल्म बनाने की कोशिश की है। लेकिन कमजोर पटकथा और संवाद की वजह से फिल्म निखर कर नहीं आ पाई। इस फिल्म की पटकथा और डायलॉग विक्रम भट्टी ने लिखी। पटकथा लिखते समय उन्हें इस बात का ध्यान देना चाहिए था कि सीन की पुनरावृत्ति ना हो। फिल्म के निर्देशक शाहनवाज अली ने ही फिल्म का संपादन भी किया है और फिल्म के अतिरिक्त डायलॉग भी लिखे हैं। शायद पुनरावृति वाले दृश्यों पर वह कैंची इसलिए नहीं चला पाए क्योंकि फिल्म की लंबाई कम हो सहती थी। अगर इस फिल्म को कोई काबिल एडिटर, एडिट करता तो फिल्म आधे घंटे काट देता।
ऐसे में विक्रम भट्टी को फिल्म की पटकथा पर बहुत ध्यान देने की जरूरत थी। इसी विषय पर कसी हुई पटकथा लिखकर अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी, लेकिन इस मामले में फिल्म के निर्देशक पूरी तरह से विफल रहें। केविन जेसन क्रस्ता ( Kevin Jason Crasta ) की सिनेमेटोग्राफी भी सामान्य है। प्रिंस मुल्ला अगर बैकग्राउंड स्कोर पर थोड़ी सी और मेहनत करते तो फिल्म के दृश्य और भी उभरकर आ सकते थे। प्रोडक्शन डिजाइनर नीरज कुमार सिंह ने आर्थर रोड जेल का सेट अच्छे से तैयार किया है। फिल्म देखने के बाद ऐसा एहसास होता है कि फिल्म की शूटिंग वास्तविक जेल में हुई है। फिल्म के मेकअप और कॉस्ट्यूम डिपार्टमेंट ने अपना काम अच्छा किया है।
फिल्म के कलाकारों के अभिनय की जहां तक एक्टिंग की बात है तो राज कुंद्रा वैसे ही अभिनय करते दिखे जैसे वह अपने वास्तविक जीवन में हैं। जेल में उनके साथ जो हुआ उन्होंने वैसा ही खुद को पर्दे पर पेश किया है जिसे आप मेथड एक्टिंग कह सकते हैं। और, उन्होंने जेल में रहकर मेथड एक्टिंग सीख ली। राज कुंद्रा के अलावा कुमार सौरभ, गणेश देवकर, महेश डी घग्ग, नामांतर राजेंद्र कांबले और फिल्म के बाकी कलाकारों का अभिनय देखकर ऐसा लगता है सब वास्तविक किरदार हैं। सिद्धार्थ संकरा और गौरव मिश्रा ने इस फिल्म की कास्टिंग की है। इस फिल्म में गौरव मिश्रा ने जेल के एक कैदी सुशील की भूमिका निभाई है। सिद्धार्थ संकरा और गौरव मिश्रा भी इस फिल्म से कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में अपने करियर की शुरुआत कर रहे हैं।