हरिश्चंद्र ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर जब अपने ही पुत्र रोहिताश्व को जलाने के लिए अपनी पत्नी से कर मांगा और उनकी पत्नी ने अपनी पहनी हुई साड़ी का हिस्सा कर के रूप में देने के लिए उसे जब फाड़ा, तो ईश्वर प्रसन्न हुए। दो साल हो गए दुनिया में कोरोना का संक्रमण फैले हुए। श्मशान घाट की एक दीवार पर बनी शिव की एक आदमकद आकृति के सामने अस्थि भस्म का ढेर बढ़ते बढ़ते उनकी कमर तक पहुंच गया। और, इन सारी चिताओं को अग्नि देने वाला सिर्फ एक इंसान। इतनी लाशें जलीं कि उनकी राख से पूरी ट्रैक्टर ट्रॉली भर गई। पिता कोविड वार्ड में भर्ती। मकान मालिक घर खाली कराने पर आमादा। और, पुलिस भी मौका मिलने पर एक डंडा धर ही देती है। लेकिन, कलयुग में भी ‘वैकुंठ’ मिलता है। इसी धरती पर। इंसान के अपने कर्मों से। कहने को अभी तो साल के पहले महीने का आखिरी शुक्रवार बाकी है लेकिन अगले सप्ताहांत पर कोई भी ऐसी हिंदी फिल्म सूची में शामिल नहीं है जो ‘वैकुंठ’ का मुकाबला कर सके। निर्देशक, अभिनेता नागराज मंजुले की प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई शॉर्ट फिल्म ‘वैकुंठ’ साल की पहली फोर स्टार फिल्म है, देखिएगा जरूर। और, ये फिल्म ही इस फिल्मावली की ओवरऑल रेटिंग तीन तक लाने में बड़ी भूमिका भी निभाती है।
‘वैकुंठ’ के अलावा कोरोना संक्रमण काल में मानवीय रिश्तों की कहानी कहतीं चार और फिल्मों को प्राइम वीडियो ने एक फिल्मावली के रूप में अपने प्लेटफॉर्म पर ‘अनपॉज्ड: नया सफर’ नाम से रिलीज किया है। पहले तो फिल्मावली का ये शीर्षक बहुत ही अनाकर्षक है और ‘वैकुंठ’ जैसी एक कमाल फिल्म को इस फिल्मावली में दबाकर रिलीज करना इस फिल्म की कहानी, इसके कलाकारों के अभिनय और इसके निर्देशन के साथ बहुत ही बड़ा अन्याय है। फिल्मावली में एक फिल्म और है जिसे देखने से आपका कलेजा मुंह को आता लग सकता है और वह फिल्म है अयप्पा के एम निर्देशित ‘वॉर रूम’। कोरोना संक्रमण के नाम पर करोड़ों रुपये बटोरने, लुटाने वाले समय में इस वॉर रूम के कर्मचारी एक पेन के लिए परेशान दिखते हैं। टूटी फूटी इमारत में चलते इस वॉर रूप में गीतांजलि कुलकर्णी कोरोना वॉरियर हैं। उसके सामने जिंदगी सवाल बनकर आती है कि जिसकी वजह से उसके बेटे ने जान दी, उसे आईसीयू में बेड चाहिए। क्या करेगी एक मां ऐसे में? फिल्म में रसिका अगाशे, पूर्णानंद वांदेकर और शरवरी देशपांडे ने भी अच्छा काम किया है।
फिल्मावली में तीन फिल्में और हैं, रुचिर अरुण निर्देशित ‘तीन तिगाड़ा’, तीन ऐसे लोगों की कहानी है जो चोरी का सामान लेकर एक सुनसान और बंद पड़ी फैक्ट्री में पड़े हैं। हवा, पानी और भोजन के जुगाड़ के बीच तीनों का अपना निजी संघर्ष भी सामने आता रहता है। चंदन की बीवी को बच्चा होने वाला है। चेट्टा जिसे बाकी दोनों बार बार चड्ढा कहकर बुलाते हैं, उसका गम भी कम नहीं है और डिंपल भी है जिसे लगता है कि वह एक टीम का हिस्सा है।
‘अनपॉज्ड: नया सफर’ की कहानियो में वैसे तो ‘द कपल’ कहानी पहले नंबर पर दिखाई जाती है लेकिन कहानियों की गुणवत्ता, उनके कथानक, मानवीय संघर्ष की अनुभूतियो और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले कोरोना के असर के हिसाब से ये कहानी आखिरी नंबर पर है। फिल्मावली की सबसे कमजोर कहानी यही है। श्रेया धनवंतरी और प्रियांशु पेन्युली स्टारर इस फिल्म का निर्देशन नूपुर अस्थाना ने किया है। फिल्म खराब नहीं है लेकिन इससे एक आम दर्शक का जुड़ाव उतना हो नहीं पाता जितना होना चाहिए। कहानी बहुत कमजोर धागे पर टिकी है और उसके संतुलन को साधने के लिए हालांकि इसमें एक घरेलू परिचारिका का किरदार भी डाला गया है पर इसे देखने का हासिल दर्शक के पास कुछ नहीं आता।
‘द कपल’ से बेहतर कहानी ‘अनपॉज्ड: नया सफर’ में शिखा माकन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘गोंद के लड्डू’ है। दर्शना राजेंद्रन, अक्षवीर सिंह सरन और नीना कुलकर्णी इसमें मुख्य भूमिकाओँ में है। कहानी के दो सिरे हैं। एक सिरे पर कोरोना संक्रमण काल में डिलीवरी ब्वॉयज की नुमाइंदगी करता एक युवा है जिसकी मेहनत की उसकी अपनी कंपनी को कद्र ही नहीं है। दूसरा सिरे पर एक नानी है जो अपनी नातिन और अपनी बिटिया से मिलने को बेताब है। उसके गोंद के लड्डू दोनों कहानियों को बीच में जोड़ते हैं। ये लड्डू कैसे, कब और कहां पहुंचने हैं, इसी में कहानी का गोंद चिपका हुआ है।