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Titu Ambani Review: दिन में सपने देखने वालों की हकीकत दिखाती फिल्म, कमजोर पटकथा और सुस्त निर्देशन ने किया कबाड़ा

Thu, 07 Jul 2022 01:09 PM IST
वर्तिका तोलानी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Titu Ambani - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
टीटू अंबानी
कलाकार
तुषार पांडे , दीपिका सिंह , वीरेंद्र सक्सेना , रघुवीर यादव और बिजेंद्र काला व अन्य
लेखक
रोहित राज गोयल , अभिषेक मनोहर चंदा और गौरव श्रीवास्तव
निर्देशक
रोहित राज गोयल
निर्माता
महेंद्र विजयदान देठा और दिनेश कुमार
रिलीज डेट
8 जुलाई 2022
रेटिंग
1.5/5

मिडिल क्लास फैमिली की सोच होती है कि कोई नौकरी मिल जाए और बस जीवन सेट हो जाए। इसके अलावा उनकी ऐसी सोच नहीं होती है कि पैसे और भी तरीके से कमाए जा सकते हैं। अगर कुछ लोग कुछ अलग करने की सोचते हैं तो उनके आस पास के लोग खूब हंसते है। लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे, यह सोच कर हम जीवन में कोई बड़ा रिस्क नहीं लेना चाहते है और जीवन भर मिडिल क्लास ही बनकर रह जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बिना मेहनत किए ही अंबानी बनने का सपना देखते है। लेकिन सिर्फ सपने देखने भर से सपने पूरे नहीं होते है। उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। अमीर बनने का कोई भी शॉर्टकट रास्ता नहीं होता है। फिल्म ‘टीटू अंबानी’ इसी लीक पर चलती फिल्म है।

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टीटू अंबानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कहानी शुक्ला परिवार की
फिल्म ‘टीटू अंबानी’ कहानी है शुक्ला परिवार की। शुक्लाजी चाहते है कि उनका छोटा बेटा टीटू कोई नौकरी कर ले। टीटू के सपने बड़े है। वह नौकरी नहीं करना चाहता। वह बिजनेस करना चाहता है। शुक्ला जी बेटे को समझाते भी हैं। लेकिन संतोष आनंद कब का लिख चुके हैं कि वह जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी ना हो। सो टीटू को अपनी कहानी खुद बनानी है। बिजली विभाग में काम करने वाली मौसमी से वह प्यार करता है। मौसमी चाहती है कि टीटू उससे जल्दी से शादी कर ले। टीटू का सपना है शादी से पहले बड़ा आदमी बनना। लेकिन सपनों और हकीकत के बीच में सात फेरे आते हैं। वह शादी कर भी लेता है लेकिन क्या उसके अच्छे दिन अब आ पाएंगे?

टीटू अंबानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

लेखन और निर्देशन कमजोर कड़ियां
लेखन और निर्देशन की कसौटी पर फिल्म ‘टीटू अंबानी’ एक औसत से भी कमजोर फिल्म है। जिस दौर में रणवीर सिंह, अक्षय कुमार और शाहिद कपूर जैसे दिग्गजों की चलती फिरती कहानियों वाली फिल्में पानी नहीं मांग रही हैं, उसमें एक टीवी सीरियल जैसी कहानी लेकर नए सितारों के साथ फिल्म बनाना अक्लमंदी नहीं है। ओटीटी के लिए भी फिल्म मुश्किल से ही ठीक लगती है। फिल्म का लेखन सुस्त है और पटकथा ढीली। दर्शकों को पहले से ही अंदाजा हो जाते है कि अब क्या होने वाला है और कहानी इतनी कमजोर है तो फिल्म कैसी होगी, कोई भी बता सकता है। फिल्म का विषय अच्छा है। फिल्म सवाल भी सही उठाती है। लेकिन, सामाजिक सवाल उठाने वाली फिल्में अब सिनेमाघरों में तब तक नहीं चलने वाली जब तक इनका प्रस्तुतीकरण भव्य और मनोरंजक तरीके से नहीं होगा। फिल्म ‘जनहित में जारी’ इसका नवीनतम उदाहरण है।

टीटू अंबानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
औसत अभिनय पर टिकी फिल्म
फिल्म ‘टीटू अंबानी’ में टीटू की भूमिका निभा रहे अभिनेता तुषार पांडे इस फिल्म से पहले 'छिछोरे' और 'वेबसेरिज' आश्रम में काम कर चुके है। फिल्म में उन्होंने अपने किरदार के साथ काफी हद तक न्याय करने की कोशिश भी की है। लेकिन, उनका किरदार कागज पर ही कमजोर है। धारावाहिक 'दिया और बाती हम' फेम दीपिका सिंह की यह पहली फिल्म है। इस फिल्म में उन्होंने मौसमी का किरदार निभाया है। उन्होंने भी अपने किरदार में असर डाला है। लेकिन तुषार और दीपिका के बीच जिस तरह की केमिस्ट्री की जरूरत फिल्म में थी, वह इसमें नदारद है। सहायक कलाकारों में रघुबीर यादव और वीरेंद्र सक्सेना तो ऐसे कलाकार है कि उन्हें कोई भी भूमिका दे दी जाए उसमें वह पूरी तरह रम जाते हैं। बिजेंद्र काला की कास्टिंग इन दिनों यूं लगता है कि मजबूरी में होती है। फिल्म कोई भी हो, सीरीज कैसी भी हो, उनका अपना एक्टिंग का सेट पैटर्न बन चुका है।
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टीटू अंबानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
देखें कि ना देखें 
लेखन, निर्देशन और अभिनय में औसत से कमतर रही फिल्म ‘टीटू अंबानी’ तकनीकी तौर पर भी कमजोर फिल्म है। भारत और हितार्थ की जोड़ी मिलकर पूरी फिल्म में एक भी गाना ऐसा नहीं दे पाई जिसे फिल्म देखने के बाद कोई गुनगुनाने भर को याद रख सके। सुनील विश्वकर्मा ने राजस्थान को दर्शाने की कोशिश अच्छी की है, लेकिन सिनेमैटोग्राफी कितनी भी अच्छी हो फिल्म की पहली जरूरत एक दमदार कहानी है। संजय शर्मा का संपादन इस फिल्म को और सुस्त बना देता है। मेहनत की कमाई से फिल्म देखनी ही हो तो थोड़ा ठहरिए, इसके ओटीटी पर आने का इंतजार कीजिए।
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