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The Vaccine War Review: एजेंडा फिल्म का दाग बचाने में फंसे विवेक, सब कुछ खरी खरी कहते तो कुछ और बात होती..

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द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
द वैक्सीन वॉर
कलाकार
नाना पाटेकर , पल्लवी जोशी , रायमा सेन , निवेदिता भट्टाचार्य , सप्तमी गौड़ा और गिरिजा ओक
लेखक
विवेक अग्निहोत्री
निर्देशक
विवेक अग्निहोत्री
निर्माता
पल्लवी जोशी और अभिषेक अग्रवाल
रिलीज:
28 सितंबर 2023
रेटिंग
2/5

लेखक-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की पिछली फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की तरह ही उनकी नई फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ भी एजेंडा फिल्म है। भले विवेक इस फिल्म में दिखाते हों कि कोरोना संक्रमण काल में मीडिया ने विदेशी वैक्सीन का प्रचार करने के लिए देसी वैक्सीन बनाने वालों के खिलाफ एक सोची समझी रणनीति के तहत दुष्प्रचार किया और एक एजेंडे की तरह इसकी कवरेज की। लेकिन, उनकी अपनी फिल्म का भी एक एजेंडा है और वह एजेंडा है देसी वैक्सीन की खोज में लगे लोगों की मेहनत और मशक्कत को मकबूलियत तक ले जाने का। सबको पता है कि जब कोरोना आया तब क्या हुआ, जब लॉकडाउन हुआ तब क्या हुआ और जब इस लॉकडाउन के बीच कुंभ जैसे मेले और चुनावों की रैलियां हुई तब क्या हुआ? आप पूछेंगे और तबलीगी जमात? जवाब यहीं दिया जा सकता है लेकिन फिर आपका फिल्म देखने का मजा किरकिरा हो जाएगा।

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द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तटस्थ इतिहास लिखा ही किसने..!
सामाजिक रचनाधर्मिता की पहली शर्त है तटस्थ रहकर अपने समय की बात को इतिहास के पन्नों में दर्ज करना। विवेक अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ के लिए बहुत तारीफें पाईं और उसी हिसाब से गालियां भी। लेकिन, वह अपने जुनून पर कायम हैं। इस बार वह उस सच्चाई को सामने लाने की कोशिश में हैं जिसकी तरफ वाकई कोरोना संक्रमण काल के समय मीडिया का ध्यान कम ही गया। देसी वैक्सीन कोवैक्सीन की कहानी सबको पता है। लेकिन देश के वैज्ञानिक उन दिनों किस जद्दोजहद से गुजर रहे थे, इसी की कहानी है फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के पूर्व महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने इस पूरी कहानी को जिस किताब ‘गोइंग वायरल’ में कलमबंद किया है, उसी पर बनी है विवेक की ये नई फिल्म।

द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दर्शक के सामने कांटे में कुछ नहीं
फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ के सामने सबसे बड़ी समस्या है हुकर की। फिल्म का ऐसा कोई पहलू नहीं है जो इसकी तरफ दर्शकों को तुरंत खींच ले। जैसे पिछली फिल्म में कश्मीर में हुए पंडितों के नरसंहार की कहानी बताई गई थी, वैसा कोई जुमला भी फिल्म के लिए काम नहीं आता। फिल्म एक मिशन की कहानी है जो जनता के सामने आने से दूर हो गई। फिल्म से गैरहाजिर मनोरंजन के इसी आकर्षण बिंदु को देखते हुए ही इसकी वितरक कंपनी पेन मरुधर एंटरटेनमेंट ने कोई 10 करोड़ में बनी इस फिल्म को महज गिनती के सिनेमाघरों में रिलीज किया है।

द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इस बार कहां चूके विवेक?
सिनेमाई दृष्टिकोण से देखें तो फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ एक अच्छी डॉक्यूमेंट्री फिल्म हो सकती थी। असल वैज्ञानिकों के जीवन की उन दिनों की जद्दोजहद, उनके घरवालों की आपबीती और इस सबके बीच जनता से मिलने वाली प्रतिक्रियाओं को इस कहानी में समेटा जा सकता था। लेकिन, सिर्फ एक महिला वैज्ञानिक को छोड़कर ये फिल्म वैक्सीन बनाने में जुटी वैज्ञानिकों और उनके रिंग मास्टर की निजी जिंदगी में ज्यादा झांकती ही नहीं है। वैज्ञानिकों को योद्धाओं के रूप में चित्रित करते समय विवेक ये भूल जाते हैं कि वह उन आम इंसानों की कहानी कह रहे हैं जिनके घर, परिवार, रिश्तेदार सब इस बीमारी के चलते घरों में कैद हैं। इन सबको समेटकर विवेक ये फिल्म बनाते तो ये एजेंडा फिल्म होते हुए भी एक शानदार फिल्म होती है। फिल्मकार का हर फिल्म बनाने का एजेंडा होना ही चाहिए, हवा में तलवार भांजकर पैसा तो कोई भी कमा सकता है।

द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
नाना पाटेकर से नहीं मिली मदद
फिल्म के सबसे अहम आकर्षण बिंदु के रूप में नाना पाटेकर को प्रचारित किया गया है, हालांकि ये फिल्म पल्लवी जोशी की है। नाना पाटेकर जिस तरह का अभिनय इस फिल्म में करते दिखे हैं, उसमें उनके सामाजिक स्तर की बढ़ोत्तरी के अलावा कुछ भी नया नहीं दिखता। उनके अभिनय का पैटर्न इतना सेट है कि दर्शक तीन चार सीन देखने के बाद अगला सीन शुरू होते ही बता सकता है कि नाना पाटेकर की देह अबकी किस ओर लहराएगी। फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ में पल्लवी जोशी ने अवार्ड विनिंग परफॉरमेंस दी है। अपनी मूल भाषा से किसी अन्य भाषा बोलने वाले व्यक्ति का किरदार करना और उसके हिसाब से संवादों का लहजा पकड़ लेना ही अभिनय की असली जीत है।
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द वैक्सीन वॉर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मिशन मंगल बनने से चूक गई वैक्सीन वॉर
फिल्म में सहायक कलाकारों की लंबी फौज है। फिल्म ‘मिशन मंगल’ सी इस कहानी में भी असल हीरो ये महिला वैज्ञानिक ही हैं। लेकिन, यहां जो वैज्ञानिक हैं उनके किरदार कम नामचीन महिला कलाकारों ने निभाए हैं। इन किरदारों का कनेक्ट भी दर्शकों से बनने में बहुत समय लगता है और तब तक फिल्म आधी खत्म हो चुकी है। इंटरवल के बाद फिल्म रफ्तार भी पकड़ती है और विवेक बहुत सावधानी से अपना नैरेटिव बहुत बहुत बचा बचाकर आगे बढ़ाते हैं लेकिन मामला वैसा जम नहीं पाता है जैसा कि इस देसी कहानी का तंबू तानने के लिए जरूरी होता है। इसमें फिल्म का पार्श्वसंगीत भी बहुत मदद नहीं करता। फिर भी विवेक जो कहना चाह रहे हैं, उसे समझने के लिए और उसे याद रखने के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है लेकिन अपनी रिस्क पर।

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