जीवनी और प्रशस्ति गान में अंतर होता है। भारतीय सिनेमा में इन दिनों खूब बन रही बायोपिक भी बायोग्राफी कम और हैगीओग्राफी ज्यादा लगती हैं। ये फिल्में एक सधी हुई दिशा में आगे बढ़ती हैं। अपने निर्धारित लक्ष्य की तरफ। एकता कपूर ने क्रिकेटर अजहरुद्दीन के दामन पर लगे दागों को फिल्म ‘अजहर’ के जरिए मिटाने की कोशिश की थी। कंगना रणौत की फिल्म ‘थलाइवी’ में भी दक्षिण भारत की कद्दावर नेता जयललिता के जीवन के तमाम प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। बाहुबली सीरीज की फिल्मों से हिंदी प्रदेशों में चर्चा पाने वाले पटकथा लेखक के वी विजयेंद्र प्रसाद ने फिल्म ‘थलाइवी’ की पटकथा लिखी है। फिल्म ‘मणिकर्णिका’ के बाद कंगना की उनके साथ ये दूसरी फिल्म है। अभिनय के लिहाज से कंगना ने वाकई फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार पाने लायक काम किया है, लेकिन फिल्म देखने के बाद एक दर्शक के मन में थोड़ी कसक रह ही जाती है। और, वह ये कि ये फिल्म जे जयललिता के जीवन के तमाम चर्चित पहलुओं को नजरअंदाज कर जाती है। जी स्टूडियोज ने फिल्म की सिनेमाघरों में रिलीज का प्रचार प्रसार भी हिंदी पट्टी में खास किया नहीं है। शायद इसलिए कि फिल्म को वैसे भी दो हफ्ते बाद ओटीटी पर रिलीज हो जाना है।
फिल्म ‘थलाइवी’ इसके पटकथा लेखक के वी विजयेंद्र प्रसाद के सेट पैटर्न पर ही शुरू होती है। उनकी पटकथाओं की शुरुआत बिल्कुल जेम्स बॉन्ड की फिल्मों की तरह होती है। आरंभ ही वह इतना चौंकाने वाला करते हैं कि दर्शक उनके बिछाए दृष्टिजाल में फंसे बिना रह नहीं पाता। लेकिन, जैसा कि उनकी पटकथा ने ‘बजरंगी भाईजान’ में किया था, वैसा ही लेखन उनका फिल्म ‘थलाइवी’ में इसके बाद है। फिल्म की कहानी धमाकेदार ओपनिंग के बाद एकदम से सुस्त पड़ जाती है। विश्व सिनेमा का इन दिनों यही पैटर्न है लेकिन हिंदी पट्टी के दर्शक इस पैटर्न से थोड़ा अलग फिल्में पसंद करते हैं। उनके लिए ड्रामा लगातार उबलते रहने वाला एहसास है।
‘थलाइवी’ या कहें कि जे जयललिता की कहानी मोटे तौर पर तमाम दर्शकों को पहले से पता है। पहले से जगजाहिर कहानियों को परदे पर देखने का आनंद तभी आता है जब उसमें ऐसी बातें खोजकर लाई गईं हो जो सार्वजनिक रूप से पहले से उपलब्ध नहीं। फिल्म ‘थलाइवी’ इस मामले में थोड़ा कमजोर पड़ती है। कहानी हालांकि फिल्म के दूसरे हिस्से में एकदम से रफ्तार पकड़ती है और क्लाइमेक्स के थोड़ा पहले तक दर्शकों को अपने साथ बहा भी ले जाती है। तारीफ यहां कंगना की इसलिए करनी होगी कि उन्होंने एक दक्षिण भारतीय चरित्र को उसकी पूरी भाषाई पहचान के साथ जिया है। जाहिर है कि फिल्म का अगर तमिल संस्करण हिंदी या अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ देखा जाए तो उसका असर कुछ अलग ही होगा। यहां रजत अरोड़ा के हिंदी संवाद कथानक और अभिनय के साथ बेमेल नजर आते हैं।