अपनों की भीड़ ट्रेनों की खटखट का शोर फिर से सुनेगा,
चौके लगेंगे छक्के लगेंगे स्टेडियम फिर भरेगा,
जहां साफ होगा समा फिर से दिल का परिंदा उड़ेगा,
तू देखना ये सुनसान सड़कों पे जश्न फिर से मनेगा..
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्....!
इस कोरोना काल में लोगों में जोश भरने के लिए तमाम गीत बने। कविताएं लिखी गईं। दूसरों की लिखीं कविताएं भी सितारों ने पढ़ीं। कभी अपने नाम से तो कभी कविता लिखने वालों के नाम से। ये कविताएं व्हाट्सऐप स्टोरीज बनीं। फेसबुक का स्टेटस बनीं और फिर हफ्ते दस दिन में कहीं खो गईं।
चौथे लॉकडाउन में अब एक कोशिश की है मशहूर संगीतकारों साजिद वाजिद ने। कुणाल वर्मा के इसी गाने की लाइनें आपने इस रिव्यू के शुरू में पढ़ीं। पूरा गाना यूं लगता है जैसे देश की धमनियों में उत्साह बनकर दौड़ रहा है। कोरस है, आलाप है। सुरों का सुख है और जीवन का संताप है। पूरा गाना कब हरिहरन से होता हुआ, उदित नारायण की खुली रंगत के रंग पाता हुआ, शान की आवाज से सुरों का आसमान छूकर दलेर मेहंदी की गायिकी की सोंधी खुशबू से भर जाता है, गाने का बेहतरीन संगीत आपको इसकी सुध लेने की इजाजत नहीं देता।
जावेद अली, मोहम्मद इरफान, दिव्य कुमार, जसराज जोशी, लक्ष्य कपूर, ऋषभ टंडन, आशीष सहगल के साथ गाने में खुद साजिद ने भी गायक के तौर पूरा जोर लगाया है। और, उदित नारायाण का वंदे मातरम का सम्पुट इस सब पर कमाल का है। चौथे लॉकडाउन में सड़कों पर गाड़ियों का कोलाहल सुनाई देने लगा है। सुबह शाम के ट्रैफिक जाम में जीवन का जोश बनाए रखने के लिए और आने वाले कल का जश्न खुलकर मनाने का ये गाना सही पैगाम देता है। इस सीजन का बेस्ट ट्रेवेलिंग सॉन्ग है ये, वंदे मातरम्।