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Tadap Review: साजिद और मिलन बने अहान शेट्टी के गुनहगार, फॉक्स स्टार स्टूडियोज की सबसे खराब फिल्म

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तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
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Movie Review
तड़प
कलाकार
अहान शेट्टी , तारा सुतारिया , सौरभ शुक्ला , कुमुद मिश्रा और सुमित गुलाटी
लेखक
अजय भूपति (मूल लेखक) और रजत अरोड़ा (रीमेक लेखक)
निर्देशक
फॉक्स स्टार स्टूडियोज और साजिद नाडियाडवाला
निर्माता
मिलन लूथरिया
थिएटर
रेटिंग
1.5/5

तीन साल पहले तेलुगू फिल्म जगत में एक फिल्म ने धमाकेदार कारोबार किया। नाम था ‘आरएक्स 100’। फिल्म ने इसके हीरो कार्तिकेय और हीरोइन पायल राजपूत को रातोंरात स्टार बना दिया। इसकी रीमेक निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने बनाई है फिल्म ‘तड़प’ के नाम से। ये उन दिनों की बात है जब फॉक्स स्टार स्टूडियोज में साजिद नाडियाडवाला की तूती बोलती थी। डिज्नी ने इसका अधिग्रहण तब तक किया नहीं था। तीन साल बाद हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। दर्शकों का फिल्म को देखने का नजरिया बदल चुका है। लेकिन, कुछ नहीं बदला है तो वह है साजिद नाडियाडवाला का हिंदी सिनेमा को लेकर दृष्टिकोण और उनकी पीआर एजेंसी का फिल्म के प्रचार को लेकर नजरिया। दोनों को अब भी स्टारडम में इफरात का भरोसा है। और, इस अति आत्मविश्वास ने ही एक नए सितारे को उदय होने से पहले ही अस्ताचल में पहुंचा दिया है।

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तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सुनील शेट्टी को मुंबई का मीडिया जगत अब भी प्यार करता है। उनके बेटे की पहली फिल्म को लेकर सब आशावान भी बहुत रहे। समीक्षकों ने फिल्म देखने का न्यौता न मिलने के बाद भी फिल्म देखी लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ है ही नहीं जिसे लेकर किसी तरह की मुरव्वत बरतने की बात भी किसी के दिमाग में आए। जाहिर है कि साजिद आखिर तक ‘सच का सामना’ करने से डरते रहे। और, सच यही है कि उन्होंने अपने खास दोस्त सुनील शेट्टी के बेटे अहान के लिए एक बहुत ही खराब फिल्म बनाई है। निर्देशक मिलन लूथरिया ने अपने करियर में ‘कच्चे धागे’, ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ और ‘डर्टी पिक्चर’ जैसी कमाल की फिल्में बनाई हैं। उनके खास जोड़ीदार रजत अरोड़ा ने ही तेलुगू फिल्म की रीमेक लिखी है लेकिन दोनों ने मिलकर अहान शेट्टी का करियर खतरे में डाल दिया है।

तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हिंदी सिनेमा के जाग्रत दर्शकों के सामने मिलन और रजत ने एक ऐसी कहानी परोसी है जो मिथुन चक्रवर्ती की थोक में बनने वाली फिल्मों के दौर से भी गई बीती है। तेलुगू फिल्मों का दर्शकवर्ग अलग है। इन फिल्मों के डब संस्करण देखने वाले टीवी दर्शकों का भी अलग दर्शक वर्ग है। फिल्म ‘तड़प’ सिनेमाघर के लिए बनी फिल्म है और इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखने के लिए साल 2021 का हिंदी फिल्म दर्शक सिनेमाघर तक जाने की सोचे भी। परदेस से आई लड़की को देखते ही पगला जाने वाले एक सिरफिरे की कहानी कहती फिल्म ‘तड़प’ में प्रेम कहानी जैसा कुछ नहीं है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और टेलीग्राम के जरिये प्रेम करने वाली पीढ़ी में ऐसे सिरफिरे अब गांव देहात में भी नहीं होते। और, होते भी होंगे तो लोगों को अब उनके इस पागलपन में दिलचस्पी नहीं रही। अपने कथ्य के हिसाब से फिल्म ‘तड़प’ कम से कम 25 साल बासी फिल्म है।

तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

हीरो के डैडी को सब डैडी कहते हैं। डैडी एक लोकल नेता के लिए काम करते हैं। नेता की बेटी पर हीरो फिदा है। और नेता हीरो को हीरोइन से अलग करने पर आमादा है। बस यही कहानी है फिल्म ‘तड़प’ की। ऐसा इसमें कुछ नहीं है जो पहले परदे पर देखा न गया हो। चौंकाने वाले नाम इस फिल्म में इरशाद कामिल और प्रीतम के हैं। फिल्म के गाने सुनकर लगता है कि दोनों ने अपने स्टॉक में बरसों से बेकार पड़े गाने उठाकर साजिद को थमा दिए हैं। इतना स्तरहीन संगीत इसके पहले इन दोनों ने कभी किसी फिल्म में नहीं बनाया। मिलन लूथरिया का तो नाम ही रहा है एक्शन फिल्मों में कर्णप्रिय संगीत परोसने को लेकर। लेकिन, फिल्म ‘तड़प’ में मिलन लूथरिया की फिल्ममेकिंग हर विभाग में फेल है।

तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कलाकारों में अहान शेट्टी को तो ये फिल्म करनी ही नहीं चाहिए थी। फिल्म ‘तड़प’ किसी भी तरह से उनकी डेब्यू फिल्म नहीं होनी चाहिए थी। इतना चीखने चिल्लाने वाला हीरो आज के जमाने का प्रेमी तो नहीं ही हो सकता। उससे किसी को सहानुभूति भी नहीं होती। उसके अतीत से किसी को लेना देना बचता नहीं और कहानियों के ये फ्लैशबैक इतने उबाऊ हैं कि दर्शक का नाता रत्ती भर भी फिल्म से कहीं नहीं जुड़ पाता। करण जौहर की खोज कही जाने वाली तारा सुतारिया की ये फ्लॉप की हैट्रिक है। एक्टिंग उनसे हो नहीं पाती। कोशिश वह खूब करती हैं लेकिन एक सीमा के बाद परदे पर उनके किरदार को देखते ही दर्शकों को चिढ़ होने लगती है।

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तड़प - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

बाकी कलाकारों में सौरभ शुक्ला पके हुए कलाकार हैं। उनको कहीं भी किसी भी जगह रख दो, वह अपने हिस्से की कलाकारी ईमानदारी से कर ही जाते हैं। कुमुद मिश्रा को जो रोल मिला, उसके लिए वह अनफिट निकले। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी के लिए रागुल धारुमन को पासिंग मार्क्स मिल सकते हैं और फिल्म के वीडियो एडीटर राजेश पांडे की भी तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने इतनी उबाऊ फिल्म का संपादन पूरा करने की हिम्मत आखिर तक बनाए रखी।

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