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Superboys Of Malegaon Review: ‘ढीले स्क्रूवालों’ की इमोशनल कहानी, नासिर शेख के जज्बे को सलाम करती सोशल फिल्म

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'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव
कलाकार
शशांक अरोड़ा , आदर्श गौरव , विनीत सिंह , मुस्कान जाफरी , ऋद्धि कुमार , मंजरी पुपाला , अनुज दुहान , पल्लव सिंह , साकिब अयूब , ज्ञानेंद्र त्रिपाठी , अनमोल खजानी , संजय दधीच और अभिनव ग्रोवर आदि
लेखक
वरुण ग्रोवर
निर्देशक
रीमा कागती
निर्माता
जोया अख्तर , रीमा कागती , रितेश सिधवानी और फरहान अख्तर
रिलीज
28 फरवरी 2025
रेटिंग
3/5

“स्क्रू ढीला है क्या...?”

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“नहीं, नहीं, मैं पिक्चर बना रहा तो..”
“मतलब ढीला ही है...!”

ये तीन संवाद इस बात का सबूत हैं कि फिल्म बनाने वालों की दुनिया वालों की नजर में इज्जत क्या रही है, इस देश में। ये उन दिनों की बात है जब ‘मालेगांव का शोले’ बस रिलीज ही हुई थी। न्यूज चैनलों को हवा लगी कि मालेगांव में एक अलग ही सिनेमा पक रहा है। साइकिल को ट्रॉली, बैलगाड़ी को क्रेन और फट्टे में लगे पहिये की रेल बनाकर कोई नासिर शेख नाम का इंसान वीएचएस टेप पर फिल्में शूट कर रहा है। ऐसा शायद ही कोई न्यूज चैनल रहा होगा, जिसने मालेगांव के इस सिनेमा पर प्राइम टाइम स्पेशल, संडे स्पेशल या वीकली स्पेशल नहीं बनाए होंगे। और, ऐसे हर टीवी कार्यक्रम को झप्पर फाड़ टीआरपी मिली। फायजा अहमद खान ने इस सारे सिनेमा को समेट कर डॉक्यूमेंट्री बनाई ‘मालेगांव का सुपरमैन’ और इस डॉक्यूमेंट्री को अपना आधार मानकर निर्देशक रीमा कागती ने अपनी पिछली थियेटर रिलीज ‘गोल्ड’ के सात साल बाद सिनेमाघरों तक पहुंचाने की कोशिश की है, फिल्म ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’।

'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक पिक्चर के पैसे में दो पिक्चर
अगर आपको सिनेमा के बनने की प्रक्रिया में दिलचस्पी है तो ये फिल्म आपके मतलब की है। अगर आपको फिल्ममेकिंग की बजाय ऐसी कहानियों में दिलचस्पी है जिनमें इंसानियत की, दोस्ती की, जज्बे की बात होती है तो ये फिल्म आपके मतलब की है और अगर आपको शादी में प्यार की नहीं बल्कि प्यार में शादी की तलाश रही हो, तो भी ये फिल्म आपके मतलब की है। रीमा कागती ने अच्छी फिल्म बनाई है। फिल्म के एक संवाद के हिसाब से कहें तो कोशिश उन्होंने एक मुकम्मल फिल्म बनाने की ही की है। कमाल की लिखाई और कुछ अच्छी अदाकारियों के साथ ही उनका काबिले तारीफ निर्देशन फिल्म को एक ऐसे रोलर कोस्टर पर लेकर जाता है, जहां ये देखना सुकून देता है कि हिंदी सिनेमा में डॉयलॉगबाजी अब भी कायम है। कुछ नमूने देखिए: 
“तू कमाल का राइटर है, और याद रख, राइटर बाप होता है!”
“घर जो है वो लौटकर आने वाले की सूरत देखता है, हाथ नहीं...”
“कोई अपनी पहली मोहब्बत भुला दे, ये मैं भी नहीं चाहती...” 
“वाहियात काम का टाइम नहीं मेरे पास.., ओरिजिनल का मतलब भी जानता तू..”

'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
शशांक अरोड़ा की अदाकारी रुला देगी
बतौर निर्देशक फिल्म ‘एआईआर’ बनाकर वरुण ग्रोवर ने जो कुछ गवाया था, वह सब इस फिल्म में दोनों हाथों से समेट लिया है। उनके बदले बदले तेवर इन दिनों उनकी स्टैंडअप कॉमेडी में भी खूब दिख रहे हैं। लेकिन बात यहां हो रही है फिलहाल उनकी लिखी फिल्म ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ की। चूंकि फिल्म के नाम में सुपरबॉयज शामिल है लिहाजा ये समझ लेना बहुत जरूरी है कि ये फिल्म किसी एक एक्टर या किसी एक किरदार की नहीं है। आदर्श गौरव का नाम भले हर जगह चमकता दिख रहा हो लेकिन फिल्म में दर्शकों की आंखें डबडबा देने का काम किया है अभिनेता शशांक अरोड़ा ने। वह यहां ‘आनंद’ का आनंद है और उसका बाबू मोशाय बनने की कोशिश करते दिखते हैं आदर्श गौरव जिन्होंने असल जिंदगी के नासिर शेख का किरदार निभाया है।

'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी वाकई पूरी फिल्मी है
फिल्म ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ की कहानी यूं है कि महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे मालेगांव में दो थियेटर चलते हैं। पायरेसी की फिल्में दिखाने के चक्कर में एक दिन यहां पुलिस का लट्ठ बजता है। नासिर को पायरेसी बाजार में हराम और हलाल की फिल्मों का गणित एक दुकानदार समझाता है तो उसे एडिटिंग का भूगोल समझ आ जाता है। उसे ये भी समझ आता है कि जुगाड़ के उपकरण जुटाकर वह अपने दोस्तों संग फिल्म बना सकता है। बस कोई जय बनता है तो कोई वीरू और कोई ठाकुर और गब्बर भी बन जाता है। राधा जो है उसने अपना चेहरा न दिखाने का फैसला किया है और बात अटकती है बसंती पर। ‘तेजाब’ के एक, दो, तीन गाने पर डांस करने वाली अमृता को इसके लिए तैयार किया जाता है। सब मिलकर ‘शोले’ का स्पूफ बनाते हैं और मामला सुपरहिट हो जाता है। फिर फिल्म के बाद एक और फिल्म। हिट के बाद एक और हिट। हर फिल्म किसी न किसी फिल्म की नकल है और बात जैसे ही ओरिजिनल तक आती है, मामला ‘कागज के फूल’ हो लेता है। 

'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दो घंटे 11 मिनट की सुकून भरी फिल्म
कोई दो घंटे 11 मिनट की फिल्म ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ का सिनेमाघरों में हश्र जो भी हो, घर पर बैठकर इत्मीनान के साथ देखने लायक फिल्म ये पक्का बनी है। फिल्मों की लागत निकालने के लिए इन दिनों जैसे तमाम निर्माता हीरो को सिगरेट पीते दिखा रहे हैं, सोचिए तब के दौर में ऐसा पैसा लोग माचिस दिखाकर कमा लिया करते थे। फिल्म अपने समय के समाज को भी साथ में समेटते चलती है। रील के डिब्बों में जाती पिक्चर दिखती है। मिथुन चक्रवर्ती जैसी हेयर स्टाइल दिखती है और दिखती है एक ऐसे राइटर की जद्दोजहद जो जावेद अख्तर के साथ फोटो खिंचा लेने को भी अपनी बड़ी उपलब्धि मान लेता है। दोस्तों की दोस्ती के बीच पैसा कैसे आड़े आता है, ये भी फिल्म दिखाती है और ये सवाल भी पूछती है कि किसी फिल्म के धड़ाधड़ नोट छापने लगने पर ये नोट आगे फिल्म की पूरी टीम में बंटते क्यों नहीं हैं?

'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सिनेमा और समाज की लंगोटिया यारी
‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ इसके बॉयज की वजह से ही देखनी बनती है। विनीत सिंह बतौर राइटर दिल को छू जाने वाला काम कर ले गए हैं। उनके चेहरे की बेबसी के बावजूद उनकी आंखों की चमक में जो एक ताव दिखता है, वह गौर करने लायक है। असल राइटर का रुआब यही होता है। वह खाली जेब होकर भी किसी भी धन्नासेठ प्रोड्यूसर को उसके पैसे की अहमियत दो कौड़ी की बता सकता है। शशांक के किरदार की हालत बताने के लिए जिस तरह डॉक्टर ‘आनंद’ का संदर्भ लेता है, वह सिनेमा और समाज की लंगोटिया यारी की तस्दीक करता है। फिल्म में ऐसा तमाम और प्रतिमान और बिम्ब हैं। जैसे नाम पूछने पर डांसर कहती है, ‘फिलहाल के लिए अमृता ही ठीक है।’ शबीना को वकील बनना है। नासिर का दिल मल्लिका पर फिदा रहता है। वह ये जानती है। लेकिन, नासिर का दिल भी नही दुखाना चाहती है। समझौता होता है, ‘पहले दोस्ती गांठें अपुन?’ मालेगांव के लोग भी मुंबई के भिंडी बाजार जैसी बोलते ही होंगे नहीं, तो बार बार ये ‘गली बॉयज’ जैसी धुन क्यों बजती इसके संवादों में।
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'सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव' मूवी रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बस कमी रह गई अन्नू मलिक के म्यूजिक की!
धुन से ख्याल आया कि ‘एक दो तीन’ पर नाचने वाली मंजरी पुपाला इस फिल्म की सबसे शानदार खोज हैं। जल्द ही वह धर्मा की फिल्म ‘धड़क 2’ में भी दिखने वाली हैं। स्टार प्लस का धारावाहिक ‘इश्कबाज’ याद हो तो उनकी झलक तुरंत पहचान में आ जाएगी। वैसे तो तकरीबन हर कलाकार ने इस फिल्म में अपने किरदार को पूरी सच्चाई के साथ निभाया है, बस कमी जो इस फिल्म में रही, वह है ‘जुड़वा’ के दौर के किसी ऐसे गाने की जिसमें ‘ऊंची है बिल्डिंग, लिफ्ट तेरी बंद है’ जैसा खाका, प्रेमी और प्रेमिका के जज्बात और हालात दोनों का खींचा गया हो। फिल्म की प्रोडक्शन डिजाइन, कलर टैम्पलेट और स्टाइलिंग भी इक्कीस होती तो मामला खूब जमता। इन दो चार कमियों के बावजूद फिल्म ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ फिल्म शुरू होने से पहले गरजने वाले एमजीएम के शेर जैसी जोरदार है। कितना अच्छा लगता है जब ये शेर किसी हिंदी फिल्म से पहले गरजता है, दशकों हो गए इसे जेम्स बॉन्ड की फिल्मों से पहले गरजते देखते हुए..! हिंदी सिनेमा गदर काट रहा है, इसकी गर्जना ऐसे ही बरकरार रखने के लिए रीमा कागती जैसे निर्देशकों को हर साल कम से कम एक फिल्म तो बनानी ही चाहिए। 
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