डिजिटल रिव्यू: सुनो (शॉर्ट फिल्म)
कलाकार: सुमित व्यास व अमृता पुरी
निर्देशक: शुभम योगी।
निर्माता- अनुज गोसलिया
यूट्यूब चैनल - टेरिबली टाइनी टेल्स
निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी की फिल्म पिंक के बाद महिलाओं के 'नहीं का मतलब नहीं' पर हिंदी सिनेमा में बनी महिला प्रधान फिल्मों में खास ध्यान दिया जा रहा है। निर्देशक शुभम योगी ने इसी विषय पर आधारित एक शॉर्ट फिल्म 'सुनो' बनाई है। इस शॉर्ट फिल्म की शुरुआत गाड़ी के अंदर बैठे एक विवाहित जोड़े से होती है। लड़की की आंखों पर काला चश्मा लगा होता है जो कि बाद में पता चलता है कि उसने चश्मा किसी मार से पड़े दाग को छुपाने के लिए लगाया है। कार, रसोई और बेडरुम में उन दोनों में आपसी बातचीत पर ही फिल्म खत्म होती है।
पूरी फिल्म सिर्फ पति पत्नी के बीच हो रहे संवाद पर ही फिल्माई गई है फिर भी यह फिल्म दर्शकों के बीच एक मजबूत संदेश छोड़ने में कामयाब रही है। सिनेमाटोग्राफी भी ठीक ठाक है। फिल्म के दोनों कलाकारों सुमित व्यास और अमृता पुरी ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। निर्देशक शुभम योगी फिल्म के लेखक भी हैं। फिल्म का निर्देशन थोड़ा अलग है और यह आम शॉर्ट फिल्मों से अलग भी दिखती है। इसके बावजूद फिल्म अपना संदेश छोड़ने में कामयाब होती दिखती है।
फिल्म अपने कथ्य में कामयाब है। न दिखावे की शोशेबाजी और न ही कोई खास तामझाम। संवाद ऐसे हैं जो सीधे दर्शकों से संबंध स्थापित करते हैं। संदेश यही है कि किसी भी तरह की हिंसा, फिर चाहे वह आपके किसी चाहने वाले ने ही की हो, वह गलत है और किसी भी तरह की हिंसा को सहन नहीं किया जाना चाहिए।