'शास्त्री विरुद्ध शास्त्री' रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म की कहानी सात साल के बच्चे यमन की है जो अपने दादा और दादी के साथ पंचगनी में रहता है। यमन के माता- पिता मल्लिका और मल्हार मुंबई में रहते हैं और हफ्ते में एक दिन पंचगनी अपने बेटे से मिलने जाते हैं। जब मल्हार को अमेरिका में नौकरी की पेशकश मिलती है और वह अपनी पत्नी और बेटे के साथ अमेरिका जाने की योजना बनाता है,लेकिन यमन के दादा मनोहर शास्त्री अपने बेटे मल्हार के इस विचार का विरोध करते हैं। और, कहते है कि पहले बाप बनने के काबिल बनो। बेटे की कस्टडी को लेकर मामला अदालत में पहुंचता है और यमन को कानूनी संरक्षकता किसे प्राप्त होती है, फिल्म की कहानी इसी के इर्द गिर्द घूमती है।
'शास्त्री विरुद्ध शास्त्री' रिव्यू
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यमन के दादा मनोहर शास्त्री को लगता है कि मलहार अपने बेटे का ख्याल नहीं रख पाएगा। वह अपने बेटे की शराब पीने की लत और नौकरी की अस्थिरता के कारण उस पर संदेह करते हैं। मल्हार अपने पिता मनोहर को आश्वासन देता है कि वह और मल्लिका, यमन को शहर के सबसे अच्छे स्कूल में भेजेंगे और उसे एक अच्छा जीवन देंगे। लेकिन मल्हार जो अपनी पत्नी के पैसे पर निर्भर है वह बच्चे की अच्छी परवरिश कैसे कर सकता है। मल्हार अपने पिता को आश्वासन देता है कि अमेरिका में उसकी नौकरी लगने वाली है और सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन मनोहर शास्त्री अपने पोते यमन की परवरिश में किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहते हैं। वह अपने पोते के बहुत ही करीब हैं।
'शास्त्री विरुद्ध शास्त्री' रिव्यू
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निर्देशक जोड़ी नंदिता रॉय और शिबोप्रसाद मुखर्जी ने माता-पिता बनने और पालन-पोषण जैसे संवेदनशील और भावनात्मक विषय को बहुत ही गहराई के साथ पेश किया है। फिल्म में ऐसे कई भावनात्क दृश्य को निर्देशक जोड़ी ने फिल्माया है, जिसे देखकर आंखो में आंसू आ जाते हैं। अपने पति और बेटे के अहंकार के बीच फंसी यमन की दादी उर्मिला और अपने बेटे के लिए तड़फती मल्लिका के दृश्य भावुक कर देते हैं। फिल्म के संवाद शिबोप्रसाद मुखर्जी और अनु सिंह चौधरी ने लिखे हैं, जो काफी प्रभावशाली और दिल को छूं लेने वाले हैं। नंदिता रॉय की पटकथा में कसावट है। सानू जॉन वर्गीज की सिनेमाटोग्राफी बहुत खूबसूरत है, फिल्म के हर फ्रेम को उन्होंने बहुत ही खूबसूरती से सजाया है। फिल्म का संपादन, बैकग्राउंड स्कोर ठीक है तो वहीं फिल्म का संगीत अपना कुछ खास प्रभाव नहीं छोड़ता है।
'शास्त्री विरुद्ध शास्त्री' रिव्यू
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बंगला फिल्म में दादा जी की भूमिका सौमित्र चटर्जी ने निभाई थी। हिंदी रीमेक में दादा मनोहर शास्त्री की भूमिका परेश रावल ने निभाई है। उनके व्यवहार में कठोरता तो है, लेकिन पोते यमन के प्रति अप्रत्याशित कोमलता भी है। कोर्ट में जब अपने ही बेटे मल्हार के सामने खड़े होते हैं तो उनके चेहरे के हाव भाव देखने लायक बनता है। मल्हार की भूमिका शिव पंडित ने निभाई है और अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की है। मिमी चक्रवर्ती ने इस फिल्म में यमन की मां मल्लिका की भूमिका निभाई है। एक मां और नौकरी पेशा की भूमिका में उनका सामजस्य देखने को मिलता है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं को किस तरह से अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। और, इससे क्या पीड़ा होती है वह उर्मिला के किरदार में नीना कुलकर्णी में दिखता है। वकील की भूमिका में अमृता सुभाष और मनोज जोशी के कोर्ट रूम का दृश्य काफी प्रभावशाली है। यमन की भूमिका में बाल कलाकार कबीर पाहवा ने बेहद क्यूटनेस और मासूमियत से सिल्वर स्क्रीन पर जादू बिखेरा है।