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Sergeant Review: प्रवाल रमन और रणदीप हुड्डा की एक और जुगलबंदी, सस्पेंस थ्रिलर में न सस्पेंस दिखा न थ्रिल

Sat, 01 Jul 2023 07:47 AM IST
निधि पाल अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सार

फिल्म 'सार्जेंट' की कहानी भी ऐसे ही विषय पर आधरित है, लेकिन मूल कथानक के बजाय फिल्म शुरुआत के बाद कही और पहुंच जाती है।
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सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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Movie Review
सार्जेंट
कलाकार
रणदीप हुड्डा , सपना पब्बी , आदिल हुसैन और अरुण गोविल आदि
लेखक
प्रवाल रमन
निर्देशक
प्रवाल रमन
निर्माता
मोहित छाबड़ा , अजय राय और ज्योति देशपाण्डे
ओटीटी
जियो सिनेमा
रिलीज
30 मई 2023
रेटिंग
2/5

विस्तार
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किसी खास केस की पड़ताल पर आधरित फिल्मों की खसियत यही होनी चाहिए कि जैसे -जैसे मामला आगे बढ़े, फिल्म को देखने का रोमांच गहराता जाए। ऐसी कहानियों से दर्शक उत्सुकतावश इसलिए जुड़े रहते हैं कि उनके मन में एक ही सवाल चलता रहता है, आगे क्या होने वाला है? फिल्म 'सार्जेंट' की कहानी भी ऐसे ही विषय पर आधरित है, लेकिन मूल कथानक के बजाय फिल्म शुरुआत के बाद कही और पहुंच जाती है। 'मैं और चार्ल्स'  के बाद निर्देशक प्रवाल रमन ने अभिनेता रणदीप हुड्डा के साथ यह दूसरी फिल्म बनाई है, और इस फिल्म का नतीजा भी पहली फिल्म से ज्यादा अलग नहीं है। 

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सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म  'सार्जेंट' की कहानी एक समर्पित और नैतिक रूप से ईमानदार पुलिस अधिकारी निखिल शर्मा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बहादुरी से एक ऐसे मामले को सुलझाने का काम करता है, जिससे न केवल वह शारीरिक रूप से घायल हो जाता है, बल्कि उसके करियर पर भी भारी प्रभाव पड़ता है। निखिल शर्मा अपनी मां के मौत का दोषी अपने पिता को मानता है। शारीरिक रूप से घायल होने के बाद इंस्पेकर हैदर अली को निखिल शर्मा के पद पर पदोन्नति मिल जाती है। निखिल शर्मा और हैदर अली दोनों दोस्त भी हैं, निखिल शारीरिक रूप से अयोग्य होने के बाद हैदर अली को अपना पद पाने के लिए दोषी मानता है। इस बात को लेकर निखिल अक्सर हैदर से उलझता रहता है। और, तमाम रहस्य और साजिशों के बीच कहानी अपनी रफ्तार पकड़ती है। 

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सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

न्याय की तलाश में निखिल शर्मा को भारी कीमत चुकानी पड़ती है। नशीली दवाओं और हत्या की असफल जांच न केवल उसके मन की शांति को नष्ट कर देती है, बल्कि पुलिस बल में उच्च पद तक पहुंचने की उसकी आकांक्षाओं को भी पटरी से उतार देती है। ड्यूटी के दौरान निखिल शर्मा इतने गंभीर रूप से घायल हो जाता हैं कि उसे अपना एक पैर खो देना पड़ता है। यहां से निखिल के मन की शांति और गायब हो जाती है और अपने गुस्से पर काबू न कर पाने की वजह से  बात - बात किसी से भी झगड़ना उसकी दिनचर्या में शामिल है, जिसका खमियाजा भी उसे भुगतना पड़ता है। असल मायने में सही दोस्त वही होते हैं तो एक दोस्त के सुख दुख में शामिल रहे है। निखिल शर्मा भले ही हैदर अली  को बार - बार अपमानित करता रहता है, लेकिन हैदर हर मुसीबत के समय निखिल के साथ खड़ा रहा है। 

सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'डरना मना है', 'गायब', 'डरना जरूरी है' और 'मैं और चार्ल्स' जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके है निर्देशक प्रवाल रमन ने इस फिल्म का निर्देशन किया है। 'मैं और चार्ल्स' के बाद के बाद रणदीप हुड्डा ने प्रवाल रमन के साथ इस फिल्म में दूसरी बार काम किया है। फिल्म में रणदीप हुड्डा बिल्कुल अलग नजर आते हैं। सार्जेंट निखिल शर्मा के किरदार को उन्होंने बहुत ही सहजता से निभाया है। एक दुर्घटना में अपनी मां और पैर खोने के बाद निखिल के क्रोध और भावनात्मक पीड़ा को बहुत ही सहजता से व्यक्त करता है। लेकिन जब वह फिल्म विदेशी भाषा  का उपयोग करते हैं तो वह थोड़ा सा बनावटी लगता है। हैदर अली की भूमिका में आदिल हुसैन का व्यक्तित्व काफी प्रभावित करता है। 

सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म में रणदीप हुड्डा और आदिल हुसैन की अच्छी कमेस्ट्री दिखी है तो वहीं वेब सीरीज 'जुबली' के बाद अरुण गोविल का इस फिल्म में दिखना अच्छा लगा। फिल्म में उन्होंने रणदीप हुड्डा के पिता की भूमिका निभाई है। निखिल शर्मा अपनी मां की मौत का दोषी अपने पिता को मनाता है, इसकी वजह से अपने पिता प्रति उसके मन बहुत कड़वाहट है। ऐसी सिचुएशन में पिता के किरदार को जिस तरह से अरुण गोविल ने स्क्रीन पर पेश किया है, वह काबिले तारीफ है। फिल्म की रणदीप हुड्डा की प्रेमिका मोनिका का किरदार सपना पब्बी ने निभाया है, फिल्म में उनको ज्यादा स्क्रीन प्लेस नहीं मिला, इसलिए उनसे बेहतर एक्टिंग की उम्मीद करना बेमानी होगी, लेकिन ऐसे ही मौके पर एक कलाकार की असली परीक्षा होती है कि कम स्क्रीन प्लेस में कुछ ऐसा कमाल दिखा जाए कि दर्शक उसे याद रखे, एक बेहतरीन मौका उन्होंने खो दिया। 

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सार्जेंट फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

बावजूद इसके फिल्म के सभी कलाकारों का परफॉर्मेंस ठीक है, लेकिन फिल्म एक ही जगह आकर मार खा जाती है और वह है फिल्म कहानी और पटकथा। जबकि फिल्म की कहानी अगर दमदार हो तो फिल्म के कलाकारों का परफॉर्मेंस अगर उन्नीस बीस भी रहे तो उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। कहने को तो यह सस्पेंस और थ्रिलर फिल्म है, लेकिन फिल्म में न तो सस्पेंस दिखा और न ही थ्रिल का ही अहसास हुआ। फिल्म की पटकथा बहुत ही धीमी है, फिल्म में सिर्फ तनाव ही नजर आता है। इसके पीछे जो भी वजह रही है उसको थोड़ा और स्पष्ट करने की जरूरत थी। फिल्म में जिस तरह के घटनाक्रम दिखाए गए हैं वह कोई नई बात नहीं, इस तरह के घटनाक्रम और कहानियों से दर्शक अच्छी तरह से वाकिफ हैं। पूरी फिल्म की शूटिंग लंदन में हुई है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है, फिल्म का गीत 'थक गए कदम, थोड़ा ठहर जाए हम'  फिल्म की कहानी की सिचुएशन के हिसाब से पूरी तरह से फिट है।

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