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रागिनी एमएमएसः सेक्स ज्यादा है या डर?

पोर्न स्टार को लेकर फिल्ममेकर कैसी फिल्म बनाएगा? ‘रागिनी एमएमएस-2’ से बेहतर नमूना फिलहाल नहीं हो सकता। तय मानिए कि अगर सेंसर बोर्ड न हो सनी लियोनी की पोर्न और बॉलीवुड फिल्म में कोई विशेष फर्क न रह जाए। कैमरा थोड़ा और दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे घूम जाए तो तस्वीर बदल जाए।


हालांकि सेंसर बोर्ड का पक्षपात भी कमाल है क्योंकि यह बोर्ड यशराज फिल्म्स, भट्ट कैंप, भंसाली और बालाजी जैसे बैनरों को नग्नता परोसने की पर्याप्त छूट देता है, लेकिन छोटे मेकरों पर नकेल कसता है। पोर्न स्टार के प्रशंसकों की उम्मीद पर ‘रागिनी’ काफी हद तक खरी उतरती है। लेकिन सवाल यह कि सनी ऐसा काम करेंगी तो उनकी इमेज कैसे बदलेगी? वह बार बार कह रही हैं कि मुझे सिर्फ पोर्न स्टार की तरह मत देखिए।

जिनके दिमाग पैंट में हैं

निर्माता-निर्देशक ने सनी के पोर्न स्टार होने को फिल्म में पूरी तरह भुनाया है। उन्हें आप यहां अंग प्रदर्शन करने वाले तरह-तरह के नाइट सूट में देख सकते हैं। सनी यहां बाथरूम में शॉवर लेते हुए और बाथ टब में हैं। बिस्तर में सोते हुए भी अंडरगारमेंट्स का विज्ञापन करती नजर आती हैं।

वह फिल्म में दो नायकों के साथ अलग-अलग उत्तेजक दृश्यों में हैं। सनी का एक सीन साथी अभिनेत्री के ‘किस’ का भी है। इन तमाम बातों के बीच फिल्म में ऐक्टर बनी सनी साथी राइटर से कहती हैं, ‘मैं जानती हूं कि तुम और तुम्हारी यूनिट के लोग सोचते हैं कि मैं जिस्मफरोश हूं।’

तब सनी को दिल दे चुका राइटर कहता है, ‘सब नहीं, जिनके दिमाग पैंट में हैं वही ऐसा सोचते हैं।’ विश्वास कीजिए कि फिल्म जिस तरह से बनाई गई है, उससे साफ है बनाने वालों के दिमाग पैंट में हैं!

कैसे बदली सनी की जिंदगी

यह फिल्म ‘रागिनी एमएमएस’ का सीक्वल है। इस फिल्म की कहानी ‘रीमेकिंग ऑफ रागिनी एमएमएस’ है। यानी यहां एक फिल्ममेकर है रॉक्स (प्रवीण डबास)। जो रागिमी का एमएमएस कैसे बना, इस विषय को लेकर फिल्म बनाना चाहता है। वह बॉलीवुड में नई हीरोइन को रागिनी का रोल देता है, जो है पोर्न स्टार सनी।

रॉक्स कहता है कि वह फिल्मों की एक नई विधा लेकर आ रहा है हॉरेक्स। यानी हॉरर प्लस सेक्स। फिल्म उसी मकान में शूट की जाती है जहां रागिनी का एमएमएस बना था और उसके प्रेमी उदय की एक चुड़ैल ने जान ले ली थी! रागिनी अब पागलखाने हैं। सनी उससे मिलने जाती है ताकि अपने केरेक्टर में रागिनी का ‘फील’ ला सके।

रागिनी से मिलना सनी की जिंदगी को बदल देता है क्योंकि उससे मिलने के बाद रागिनी की मौत हो जाती है। मौत क्यों होती है और सनी की जिंदगी कैसे बदलती है, यह फिल्म देख कर आप जान सकते हैं।

थोड़ा ऊपर उठ कर सोचा होता

बेहतर होता कि निर्माता-निर्देशक फिल्म की मेकिंग में पैंट से ऊपर उठ कर सोचते। फिल्म में डराने वाले तत्व नहीं हैं। पुराने घिसे-पिट फार्मूले यहां हैं। हर दूसरे सीन में आपको दरवाजे-खिड़की अपने आप बंद होते और खुलते दिखते हैं।

बच्चों की हंसी सुनाई देती है। आईने में या ऐक्टर के पीछे भूत नजर आते हैं। यह सब दर्जनों बॉलीवुड फिल्मों में देखा जा चुका है। हॉरर के स्तर पर फिल्म बहुत निराश करती है। महाकार्तिक पूर्णिमा की रात को चुड़ैल सबसे ज्यादा ताकतवर होती है और चुड़ैल लोगों को अपनी अधूरी कहानी सुनाना चाहती है जैसे सी ग्रेड तत्व इस कहानी में हैं।

कहानी के कुछ सिरे छूट गए हैं, जिनकी तरफ डायरेक्टर ने ध्यान ही नहीं दिया। साफ है कि उसका ध्यान कहीं और था!

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और अंत में वोद्का

‘रागिनी एमएमएस-2’ देख कर साफ लगता है कि निर्माताओं के लिए सिनेमा सिर्फ बिजनेस है। कला नहीं। फिल्म में कुछ हिस्से अलग से काट कर चिपकाए गए लगते हैं, जिनमें सनी के शरीर पर वस्त्र संभवतः हैं ही नहीं।

यही वे हिस्से हैं जो कुछ दर्शकों को सिनेमाघरों में लाएंगे। रागिनी के मेकर फिल्म को लेकर कितने अगंभीर हैं, इसका पता ऐसे भी चलता है कि सब कुछ खत्म हो जाने के बाद आखिर में चार बोतल वोद्का गाना बजता है।

जिसका न कहानी से संबंध है और न किरदारों से। संजीदा फिल्मकार हमेशा चाहता है कि दर्शक जब सिनेमाघर से निकलें तो फिल्म का असर उनके दिमाग में रहे। ‘वोद्का गीत’ फिल्म के खत्म होते ही उसके असर को खत्म कर देता है। सच यह है कि इस फिल्म को देखना, न देखना आपकी मर्जी है। इसे देखने से जीवन में न कुछ जुड़ेगा और न देखने से घटेगा।
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