चुग्गे में फंसे चाचा भतीजा
वेंकटेश दग्गुबाती और राणा दग्गुबाती रिश्ते में चाचा भतीजे हैं। सीरीज में दोनों बाप बेटे बने हैं। दोनों की साथ में एक सीरीज नेटफ्लिक्स बना रहा है, ये खबर ही कितनी रोमांचक लगी थी। लगा था दोनों मिलकर कुछ अच्छा करेंगे। लेकिन नेटफ्लिक्स ने दोनों को अमेरिकन वेब सीरीज ‘रे डोनोवन’ के भारतीय रीमेक का चुग्गा डाला और दोनों ने अपनी बरसों से बनी इमेज को बस एक सीरीज से खराब कर लिया। ‘सेक्रेड गेम्स’ ने नवाजुद्दीन सिद्दीकी की ब्रांड इमेज के साथ जो किया, उसका नतीजा वह आज तक बड़े परदे पर भुगत रहे हैं। ‘राणा नायडू’ के बाद राणा दग्गुबाती की कोई फिल्म हिंदी भाषी या किसी भी भारतीय भाषा के दर्शक परिवार के साथ देखने जाएंगे, इसमें संदेह है। ‘रे डोनोवन’ जिस लोकसंस्कृति के आधार पर बनी है, वहां लाता होगा कोई पिता अपनी कैंसर से मरती बीवी और अपने बच्चों के सामने दूसरी औरत को! वहां अपने पिता को गाली देकर बुलाने का चलन होगा! वहां, अपने बड़े भाई से भी गाली देकर बात करने की संस्कृति भी होगी, लेकिन भारत में? यहां अभी गंगा, जमुना, कृष्णा और कावेरी में पानी बह रहा है और जब तक ये हैं, ऐसी कहानियों को सामूहिक मनोरंजन की मान्यता मिल पाना मुश्किल है।
तीन भाई, एक पिता और एक नाजायज बेटा
‘राणा नायडू’ की कहानी वही है जो ‘रे डोनोवन’ की है। एक लंबा चौड़ा शख्स है जो मशहूर शख्सियतों के पाप धोता है। बड़ा भाई स्टंट मास्टर है लेकिन हाथ उसका कांपता रहता है। छोटे भाई का बचपन में एक बाबा ने यौन शोषण किया और तब से वह सदमे में जी रहा है। तीनों का पिता जेल में सजा काट रहा है लेकिन उसे पांच साल पहले ही रिहा कर दिया जाता है। आते ही वह अपने बेटे के यौन शोषण का मुआवजा मांगता है। बाबा तैयार भी हो जाता है पांच करोड़ देने को। फिर पिता बम फोड़ता है कि तीनों का एक भाई और है जो उसकी रखैल से पैदा हुआ। क्रिकेट खिलाड़ी को उसके वीर्य के जरिये ब्लैकमेल करने की कोशिशें हैं। दक्षिण के एक हीरो की समलैंगिक रिश्तों की घटिया सी कहानी है। और है, अपराध की दुनिया में सिर तक डूबे मास्टर क्लीनर की पत्नी की जिसके दोनों बच्चे बड़े हो चुके हैं और जिन्होंने कभी ये जानने की कोशिश नहीं कि उनके पिता का अतीत, वर्तमान और भविष्य क्या है?
ये सौदा खरा खरा बिल्कुल नहीं
नेटफ्लिक्स अपने भारतीय ग्राहकों से हर महीने मोटी रकम लेता है। 6 जुलाई 2018 से नेटफ्लिक्स ने भारतीय वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ के साथ जो भारतीय प्रसारण शुरू किया, उस सिलसिले की ‘राणा नायडू’ 33वीं सीरीज है। इन 33 सीरीज में से दर्शकों को पसंद आने वाली श्रृंखलाओं की संख्या दहाई तक में भी नहीं पहुंचती है। तमाम उठापटक इस बीच नेटफ्लिक्स के मुंबई दफ्तर में होती रही लेकिन घूम फिर कर सामग्री उनकी ‘सेक्रेड गेम्स’ शैली पर ही अटकी है। फ्लोरा सैनी की नंगी पीठ दिखाकर उनका राजेश जैस के साथ कथित संभोग दृश्य सीरीज में घृणा रस पैदा करने का चरम है। इसके बाद के संवाद ऐसे कि खाना खाते खाते आप सीरीज देख रहे हों तो उल्टी आ जाए। पूरी सीरीज एक तयशुदा खाके पर चलती है। दो एक्शन दृश्य, एक चेज सीक्वेंस, एक सेक्स सीन, फिर दो भावुक दृश्य और फिर दो तीन दृश्यों में मुख्य कलाकारों के बीच मुक्तकंठ से होने वाली गालीबाजी।
‘रे डोनोवन’ की घटिया रीमेक
तीसरे एपीसोड तक आते आते जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा बहुत याद आती हैं। टीवीएफ पर हुए मुकदमे के दौरान की गई उनकी टिप्पणी इस सीरीज पर भी एकदम सटीक बैठती है। कोई कैसे इतना गिर सकता है? अपराधियों के भी देश में ईमान रहे हैं। ये ठीक है कि दैहिक संबंधों की दीवारें मेट्रो शहरों में अब खिड़की पर लगे परदों की तरह पारदर्शी हो चुकी हैं लेकिन देसी दर्शकों के लिए भारतीय कहानियों की कमी है क्या? अभी दिल्ली में लगे पुस्तक मेले में बताते हैं लाखों लोगों का मेला लगा रहा। क्या वहां सौ किताबें भी नहीं रही होंगी, जिन पर वेब सीरीज या फिल्में बन सकें। लेकिन, नेटफ्लिक्स के दफ्तर में हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं पढ़ने वाले लोग ही कितने हैं, मुंबई में सबको पता है। जब जब नेटफ्लिक्स पर ‘दिल्ली क्राइम’, ‘डिकपल्ड’, ‘द फेम गेम’, ‘खाकी’ या ‘कैट’ जैसी सीरीज आती हैं तो भ्रम होने लगता है कि देसी दर्शकों को ये ओटीटी स्वदेशी कहानियां दिखाने में रुचि ले रहा है लेकिन ऐसे हर किए कराए पर एक ‘रे डोनोवन’ का ऐसा एक रीमेक पानी फेर देता है।
वेंकटेश ने सबसे ज्यादा निराश किया
लोकोमोटिव ग्लोबल नाम की कंपनी के बनाई इस सीरीज में कहानी, किरदार, उनकी पृष्ठभूमि, उनका चरित्र चित्रण, उनके संवाद, सब सीधी नकल उतार दी गई है। ओरिजिनल नाम की चिड़िया भी नजर नहीं आती। राणा दग्गुबाती का किरदार तो फिर भी अपनी इज्जत बचाने में लगा रहता है लेकिन हिंदी दर्शकों को कभी ‘फूलों सा चेहरा तेरा कलियों सी मुस्कान’ गाने पर अभिनय कर रिझाने वाले वेंकटेश ऐसे किरदार भी बुढ़ापे में करेंगे, यकीन नहीं होता। सुरवीन चावला दो बड़े बच्चों की मां बनी हैं और पूरी कोशिश करती हैं कि फिल्मों में न सही कम से कम सीरीज में नए दौर की मां का ठिकाना वह पूरी तरह कब्जा लें। अभिषेक बनर्जी को जफा जैसे किरदार उनके चेहरे पर बने रहने वाले स्थायी भावों की वजह से मिलते हैं, ये भी इस सीरीज से तय हो जाता है। हां, सुशांत सिंह ने फिर एक बार साबित किया कि उनको सही किरदार मिलेंगे तो वह अब भी कमाल दिखाने का माद्दा पूरा रखते हैं।