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Prahaar Movie Review: राजकुमार का काम अच्छा, कोर्टरूम ड्रामा में कितना दम? जानें कैसी है उज्ज्वल निकम की कहानी

सार

Prahaar Movie Review In Hindi: राजकुमार राव की फिल्म 'प्रहार' 16 अक्तूबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। फिल्म में मुख्य अभिनेता का अभिनय अच्छा है। इस रिव्यू में जानिए फिल्म की कहानी कैसी है।
 
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प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
प्रहार
कलाकार
राजकुमार राव , जयदीप अहलावत , वामिका गब्बी , ललित प्रभाकर , सिकंदर खेर , आशीष विद्यार्थी और रित्विक साहोरे
लेखक
सुमित रॉय और विशाल तिवारी
निर्देशक
अविनाश अरुण
निर्माता
दिनेश विजान और आमिर खान
रिलीज डेट
16 अक्तूबर 2026
रेटिंग
2.5/5

विस्तार
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26/11 मुंबई आतंकी हमले को हुए करीब 18 साल हो चुके हैं। 2008 में इस हमले की तस्वीरें, अजमल कसाब की गिरफ्तारी और उसके मुकदमे से जुड़ी कई बातें हम खबरों, डॉक्यूमेंट्री और फिल्मों में देख चुके हैं। ऐसे में ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ से उम्मीद थी कि यह इस जानी-पहचानी कहानी में कुछ नया जोड़ेगी। लेकिन फिल्म इस मोर्चे पर निराश करती है।
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फिल्म में एक ऐतिहासिक मुकदमा है और उस सरकारी वकील की निजी जिंदगी भी, जिस पर बड़ी जिम्मेदारी थी। इसके बावजूद कहानी का बड़ा हिस्सा परिचित घटनाओं तक सीमित रहता है। निकम की जिंदगी पर ध्यान देने के चक्कर में मुकदमे की बारीकियां पीछे छूट जाती हैं।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
कहानी: अदालत में मुकदमा, घर में अपनी लड़ाई
फिल्म की शुरुआत निकम की निजी जिंदगी से होती है। बेटी की शादी चल रही हैं। तभी मुंबई पर आतंकी हमला हो जाता है और निकम को कसाब के मुकदमे की जिम्मेदारी मिलती है। इसके बाद कहानी अदालत, गवाहों और सबूतों के बीच आगे बढ़ती है।

घर में पत्नी ज्योति (वामिका गब्बी) की बीमारी और बेटे अनिकेत के साथ उनके रिश्ते की उलझनें हैं। अनिकेत (रित्विक साहोरे) कानून की पढ़ाई करके अमेरिका से लौटा है। पिता और बेटे के बीच भी तनाव है। फिल्म दिखाना चाहती है कि काम में डूबे रहने के कारण निकम अपने परिवार को समय नहीं दे पाते।

विचार अच्छा है, लेकिन इसे बार-बार दोहराने से कहानी धीमी पड़ती है। कुछ सीन्स के बाद दर्शक समझ जाता है कि उनके काम का असर परिवार पर पड़ रहा है। इसके बाद भी फिल्म इसी बात पर लौटती रहती है।

वामिका निकम की पत्नी के किरदार में हैं। उनका लुक अलग है, लेकिन किरदार को ज्यादा विस्तार नहीं मिला। उनकी अपनी भावनाओं और मुश्किलों को ठीक से दिखाया जाता, तो यह हिस्सा ज्यादा असर छोड़ सकता था।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
कोर्टरूम ड्रामा में रोमांच की कमी
फिल्म में कसाब की उम्र, मेडिकल जांच, सबूतों की विश्वसनीयता और गवाहों की पहचान जैसे मुद्दे उठते हैं। कामा अस्पताल की वरिष्ठ नर्स की गवाही और हमले के दौरान मौजूद लोगों के बयान भी दिखाए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद अदालत के कई सीन्स दर्शक को बांधकर नहीं रख पाते।

यह कहना ठीक नहीं होगा कि कसाब के दोषी होने का पता पहले से होने के कारण फिल्म में रोमांच की गुंजाइश नहीं थी। किसी मुकदमे का नतीजा मालूम होने के बावजूद यह जानने में दिलचस्पी बनी रह सकती है कि सबूत कैसे जुटाए गए.... गवाहों की गवाही कितनी अहम रही और बचाव पक्ष के सवालों का जवाब कैसे दिया गया। ‘प्रहार’ इन पहलुओं को छूती है, लेकिन उन पर विस्तार से नहीं ठहरती।

निकम की कानूनी रणनीति और मुकदमे को आगे बढ़ाने में आई मुश्किलों को और गहराई से दिखाया जा सकता था। फिल्म जानकारी तो देती है, लेकिन अदालत में वह तनाव नहीं बना पाती, जिसकी इस कहानी से उम्मीद थी।

हमले में अपनी मां को खोने वाली बच्ची का प्रसंग जरूर ध्यान खींचता है। यह दृश्य याद दिलाता है कि इस मुकदमे के पीछे कितने लोगों का दर्द था। लेकिन ऐसे कुछ और पलों को भी कहानी में और मजबूती से जोड़ा जा सकता था।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
उज्ज्वल निकम के किरदार में क्या कमी रह गई?
राजकुमार राव अपने किरदार को गंभीरता से निभाते हैं। उनके हावभाव, आवाज और चेहरे पर थकान के भाव एक जिम्मेदार सरकारी वकील की छवि बनाने में मदद करते हैं। वह इस किरदार में जंचते हैं।

हालांकि, उनका परफॉरमेंस ज्यादातर एक ही सुर में चलता है। इससे बड़ा सवाल पटकथा का है। निकम की भूमिका निभाने के लिए सिर्फ गंभीर दिखना काफी नहीं था। फिल्म को उनकी कानूनी तैयारी...रणनीति, दलीलों और दबाव में फैसले लेने की प्रक्रिया भी प्रभावी ढंग से दिखानी चाहिए थी। दर्शक को यह समझना जरूरी था कि इस मुकदमे में निकम की भूमिका किस वजह से खास थी।

फिल्म उनके निजी संघर्षों को जगह देती है.... लेकिन एक वकील के तौर पर वह कैसे काम करते हैं, यह फिल्म ठीक से नहीं दिखा पाती। इसलिए फिल्म में निकम का किरदार उतना असर नहीं छोड़ पाता, जितना छोड़ना चाहिए था।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
ललित प्रभाकर का काम अच्छा, जयदीप अहलावत का किरदार दिलचस्प
ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब का किरदार कुछ दृश्यों में अच्छे से निभाया है। उनके बोलने का तरीका और हावभाव कसाब जैसे लगते हैं। कुछ सीन्स में उनका अभिनय इतना असली लगता है कि बेचैनी होने लगती है।

जयदीप अहलावत का किरदार भी दिलचस्प है। वह पाकिस्तानी न्यायिक आयोग से जुड़े चौधरी जुल्फिकार अली की भूमिका में हैं। निकम और उनके बीच होने वाली बातचीत फिल्म के अहम हिस्सों में से एक है। यहां कहानी भारत-पाकिस्तान के तनाव से आगे बढ़कर कानून, सबूत और न्याय जैसे सवालों को छूती है।

इन सीन्स में फिल्म कुछ नया दिखा सकती थी। अगर निकम और जुल्फिकार अली के बीच बातचीत को थोड़ा और दिखाया जाता, तो दर्शक मुकदमे और कानून से जुड़ी बातों को बेहतर समझ पाते। लेकिन फिल्म ऐसा करने का मौका चूक जाती है।

सिकंदर खेर ने कसाब के बचाव पक्ष के वकील की भूमिका अच्छी तरह निभाई है। वहीं, आशीष विद्यार्थी जज एमएल तहिलियानी के किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। दोनों कलाकारों का अभिनय अच्छा है और वे अदालत के सीन्स को मजबूती देते हैं।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
निर्देशन: कहानी कहने का मौका चूक गए अविनाश अरुण
अविनाश अरुण ‘किल्ला’ और ‘थ्री ऑफ अस’ जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। ‘प्रहार’ में भी उनके पास एक अच्छी कहानी थी। लेकिन वह इसे उतने असरदार तरीके से नहीं दिखा पाए। अदालत में मुकदमे से जुड़ी बातें और विस्तार से दिखाई जा सकती थीं। वहीं, परिवार के साथ निकम के रिश्तों को बेहतर ढंग से दिखाया जाता, तो उनके व्यक्तित्व को समझने में मदद मिलती। फिल्म एक अहम कहानी बताती है, लेकिन दर्शक पर गहरा असर नहीं छोड़ पाती।

प्रहार फिल्म रिव्यू - फोटो : यूट्यूब ग्रैब
‘प्रहार’ और ‘भारत भाग्य विधाता’: एक घटना, दो नजरिये
26/11 पर बनी हर फिल्म से एक ही तरह की कहानी की उम्मीद नहीं की जा सकती। कंगना रनौत की फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ मुंबई के सीएसएमटी और कामा अस्पताल में मौजूद कर्मचारियों और मरीजों के संघर्ष पर केंद्रित है। वहीं ‘प्रहार’ उज्ज्वल निकम और कसाब के मुकदमे के जरिये इस घटना को देखती है।

दोनों फिल्मों का नजरिया अलग है। इसलिए तुलना का सवाल यह नहीं कि किसने बेहतर कहानी दिखाई, बल्कि यह है कि ‘प्रहार’ अपने नजरिये से दर्शक को क्या नया देती है।

निकम की कानूनी रणनीति, गवाहों की भूमिका और मुकदमे के दौरान सामने आई चुनौतियों को विस्तार से दिखाकर फिल्म अपनी अलग पहचान बना सकती थी। लेकिन वह इन पहलुओं को पर्याप्त गहराई नहीं देती। इस वजह से इसका नजरिया उम्मीद के मुताबिक नया नहीं लगता।
‘द अनटोल्ड स्टोरी’ का दावा कितना सही?

फिल्म के शीर्षक में ‘द अनटोल्ड स्टोरी’ शब्द दर्शकों से एक अनकही कहानी का वादा करते हैं। लेकिन किसी चर्चित घटना पर बनी फिल्म के लिए जरूरी नहीं कि वह हर बार नए तथ्य सामने लाए। वह पुराने घटनाक्रम को भी नए नजरिये से दिखाकर असर छोड़ सकती है।

‘प्रहार’ के सामने भी यही मौका था। वह यह बता सकती थी कि इतने बड़े मुकदमे को लड़ने की प्रक्रिया कैसी थी... एक सरकारी वकील किन चुनौतियों से गुजरता है और न्यायिक प्रक्रिया में किन सवालों का सामना करना पड़ता है। फिल्म इन पहलुओं को छूती है, लेकिन उन्हें पर्याप्त गहराई नहीं देती।

निजी जिंदगी की कहानी भी निकम के व्यक्तित्व को पूरी तरह खोल नहीं पाती। इस तरह फिल्म का मुख्य मुकदमा और उसका भावनात्मक पक्ष, दोनों अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंचते।
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फिल्म प्रहार - फोटो : इंस्टाग्राम @rajkummar_rao
देखें या नहीं?
राजकुमार राव और ललित प्रभाकर का काम फिल्म की वजह से देखने लायक है। लेकिन अगर आप एक दमदार कोर्टरूम ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं, तो ‘प्रहार’ निराश कर सकती है। फिल्म के पास एक अहम कहानी है, मगर उसे पर्दे पर उतनी गहराई, कसाव और रोमांच के साथ नहीं उतारा गया है।
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