बिखरी बिखरी से बेअसर कहानी
वेब सीरीज ‘पीआई मीना’ एक सेक्योरिटी एजेंट की कहानी है। कहानी मोटे आसामी की बेटी के लिए तलाशे गए दूल्हे की जासूसी से शुरू होती है और फिर एक कहानी से दूसरी कहानी, दूसरे से तीसरी पर कूदती हुई उस जैविक परिस्थिति पर आकर दम लेती है, जिस तक आने के बाद कहानी खुद ही कहानी नहीं रहती। औसतन चालीस मिनट के आठ एपिसोड्स वाली ये सीरीज अपनी संकल्पना की दुर्बलता से ग्रसित सीरीज है। अरिंदम मित्रा ने इसे बनाया भी है और इसे रचा भी। लिखने में उनकी मदद को रौनक कामत और विपिन शर्मा हैं लेकिन तीनों ने मिलकर जो कहानी बनाई है, उसमें नया कुछ नहीं है। हर एपिसोड किसी न किसी पहले से देखी हुई कहानी की याद दिलाता रहता है। कभी ये ‘जेंगाबोरु केस’ की तरफ निकल जाती है तो कभी ‘काला पानी’ की तरफ। बीच बीच में ये ‘विक्टोरिया नंबर 203’ भी बनना चाहती है लेकिन ब्रिज जैसा निर्देशक बनना फिलहाल देवालय भट्टाचार्य के लिए दूर की कौड़ी है।
अधर से शुरू, अधर में खत्म
मीनाक्षी अय्यर यानी कि पीआई मीना के दिमाग में हरदम बरसों पहले हुई एक दुर्घटना के धमाके होते रहते हैं। जहां वह काम कर रही है, वहां उसका काम ऐसा है कि दर्शकों को तो समझ ही नहीं आता कि वह क्या कर रही है, खुद इस किरदार को भी पता नहीं कि उसे करना क्या है। फिर उसके सामने वह खतरा आता है जिसके लिए वह तैयार नहीं है। मेडिकल क्षेत्र में होने वाली साजिशें कहानी में घुलना शुरू होती हैं और जैसे ही ये होता है ऐसा लगता है कि दूध मे किसी नींबू निचोड़ दिया है। उसके बाद सीरीज में क्या होने वाला है, कोई भी दर्शक आसानी से बता सकता है। कहानी रेशा रेशा होती है। उम्मीद बंधती है कि शायद अब भी इसका पनीर बन जाए लेकिन इतनी सारी टुकड़े टुकड़े कहानियां एक बड़े मंच की जो संरचना करती हैं, उसका आधार बहुत कमजोर होता जाता है।
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शीर्षक किरदार ही सबसे कमजोर
वेब सीरीज ‘पीआई मीना’ का प्रचार तान्या मानिकतला को ही केंद्र में रखकर किया गया है, पोस्टर भी सारे उसके ही बने हैं तो जाहिर है कि सीरीज के अंतिम परिणाम का असर भी तान्या पर ही होने वाला है। मीनाक्षी अय्यर के तौर पर वह तमिल में अपने साथी को अपशब्द बोलती हैं। चेहरे पर तान्या के हरदम सुबह पेट साफ न हो पाने जैसा तनाव बना रहता है। जो भी मीनाक्षी करती है, उसमें एक निजी जासूस जैसी सफाई नहीं है। निजी जीवन में उसके जो हो रहा है, वह उसका अंतर्मन डिगाए रहता है और बाहरी दुनिया से उसका तन डिगा रहता है। एक जासूसी वेब सीरीज एक औसत सी ड्रामा सीरीज बनकर अगर रह जाती है तो इसमें इसकी कहानी, पटकथा के अलावा इसकी लीड कलाकार तान्या मानिकतला भी कम दोषी नहीं हैं।
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प्राइम वीडियो की दोयम दर्जे की सीरीज
सीरीज देखने के बाद ऐसा भी लगता है कि शायद ये सीरीज मूल रूप में बांग्ला में बनने के लिए प्राइम वीडियो की तरफ से मंजूर हुई हो और ‘टूथ परी’ की रिलीज के बाद ओटीटी प्रबंधन को लगा कि इसे हिंदी में रिलीज कर देना चाहिए। एक हिंदी जासूसी वेब सीरीज जैसा इसमें कुछ नहीं है। सीरीज में परमब्रत, सौरव, जिशु जैसे कलाकारों का न इसकी कहानी का कोई ग्राफ बनाने में योगदान है और न ही अभिनय के जरिये दर्शकों को अपने साथ जोड़ पाने में। विनय पाठक और जरीना वहाब जैसे बेहतरीन कलाकारों का उपयोग भी उनकी क्षमता के अनुसार निर्देशक देवालय भट्टाचार्य नहीं कर सके हैं। कहानी जहां खत्म हुई है, उससे लगता है कि इसका दूसरा सीजन भी आने वाला है और अगर ऐसा होता है तो प्राइम वीडियो का अपने ग्राहकों के साथ ये एक और मजाक ही होगा। सीरीज की सिनेमैटोग्राफी, पार्श्वसंगीत भी किसी रीजनल फिल्म जैसा ही है। प्राइम वीडियो से त्यौहारी सीजन में ऐसी दोयम दर्जे की सीरीज की उम्मीद नहीं थी।
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