सुदीप शर्मा ने इस बार अभिषेक बनर्जी (हथौड़ा त्यागी वाले नहीं), राहुल कनौजिया और तमल सेन के साथ मिलकर अपनी सोची वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ का दूसरा सीजन बना तो लिया है और आखिर में अनोखा सा अचरज रचकर आगे का एक नया रास्ता भी खोल लिया है, लेकिन ये वह भी जानते हैं कि इस बार मामला ओरिजिनल कम और जबर्दस्ती का ज्यादा है। एक मजदूर के लापता होने और नागालैंड से दिल्ली एक वार्ता के लिए आए दबंग नागा नेता का होटल के भीतर सिर काट दिए जाने की दो अलग अलग तफ्तीशों से शुरू हुई कहानी के सिरों का वहां आकर संगम होता है, जहां हाथीराम चौधरी और इमरान अंसारी की मुलाकात फिर से होती है। हाथीराम अब भी जमनापार का इंस्पेक्टर है। अंसारी अब आईपीएस बन चुका है।
हाथीराम और अंसारी के बीच का जो दोस्ताना, दोनों के पदों में आए बदलाव के बावजूद कायम रहता है, वह ही इस सीरीज का सबसे मजबूत पक्ष है। लेकिन, जूनियर के सीनियर बन जाने के बाद भी अपने ट्रेनिंग कोच को सर कहते रहने की केमिस्ट्री कितनी देर तक देखी जा सकती है भला। लैब के एक्सपेरिमेंट जैसी इस कहानी में फिर अनानास के नाम पर हेरोइन का धंधा आ मिलता है। नॉर्थ ईस्ट के विद्रोहियों को होने वाली फंडिंग का सिरा भी खुलता है और ये भी खुलता है कि उत्तर पूर्व में बरसों से भसड़ मचा रहे ये उग्रवादी आखिर करते क्या हैं, कमाते क्या हैं और खाते-पीते क्या हैं? एक तरह से इस बार हाथीराम चौधरी को उत्तर पूर्व के तथाकथित विद्रोहियों के चेहरे का नकाब नोचना है।
पांच साल बाद परदे पर लौटे हाथीराम चौधरी का वजन बढ़ा हुआ दिखता है। उसका चढ़ा हुआ पेट बताता है कि ये सीरीज हाल फिलहाल तो शूट हुई नहीं है। शायद सही समय के इंतजार में रही होगी। अमेजन प्राइम ने इसे नेटफ्लिक्स के ‘ब्लैक वारंट’ के मुकाबले में उतारा है और दोनों का मुकाबला अगर देखा जाए तो जहान कपूर का सादापन हाथीराम चौधरी के बार बार की एक जैसी झुंझलाहट पर भारी है। कहानी के स्तर पर बेहद कमजोर इस सीजन की पटकथा भी दिल्ली से लेकर नागालैंड तक बिखर जाती है। और, संवाद चूंकि बहुत सारे नागामी (नागालैंड की बोली) में है लिहाजा हिंदी के आम दर्शक को हिंदी से अंग्रेजी, अंग्रेजी से नागामी में कूदते रहने में परेशानी भी होती ही है।
अगर आप जयदीप अहलावत के फैन हैं तो इसे एक एक एपिसोड करके अगले पूरे हफ्ते में देख सकते है लेकिन अगर आप बिंज वॉच के चक्कर में इसे देखने बैठते हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। इश्वाक सिंह और हाथीराम चौधरी के अलावा इस सीरीज में तिलोत्तमा शोम को ही पहचाना जा सकता है। इश्वाक चूंकि अब आईपीएस हैं तो हर बार शायद एक्शन बोले जाते ही अपने कंधे सीधे करके फ्रेम में आगे बढ़ते दिखते हैं। उनका भोलापन अब काफूर हो रहा है। हाथीराम अब पहले से ज्यादा मोटा है। अपराधी को पकड़ने में उसकी सांस अब ज्यादा फूल रही है। जयदीप इस बार इस किरदार को कुछ अलग तेवर देने में भी नाकाम हैं। बीवी के रोल में गुल पनाग को अपना टेम्पलेट पिछली बार ही मिल गया था। इस बार भी वह उसी पर कायम हैं। नागेश कुकुनूर और जहानु बरुआ को एक्टिंग करते देखना जरूर दिलचस्प है। सुदीप शर्मा ने दोनों का कुछ तो अहसान ये काम करके जरूर उतारा है। सीरीज का बैकग्राउंड म्यूजिक पहले सीजन जैसा ही है। उत्तर पूर्व के कलाकारों ने थोक के भाव में सीरीज में काम किया है, लेकिन प्रशांत तमांग के अलावा असरदार काम किसा दूसरे का नहीं है।
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