फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Nazar Andaaz Movie Review: कुमुद मिश्रा की अदाकारी का सबसे ऊंचा आसमान, जीवन सरगम सी सुरीली फिल्म ‘नजर अंदाज’

पंकज शुक्ल
Updated Fri, 07 Oct 2022 11:26 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
नजर अंदाज
कलाकार
कुमुद मिश्रा , दिव्या दत्ता , अभिषेक बनर्जी और राजेश्वरी सचदेव आदि
लेखक
लक्ष्मण उतेकर , विक्रांत देशमुख और ऋषि विरमानी
निर्देशक
विक्रांत देशमुख
निर्माता
टी सीरीज और कठपुतली पिक्चर्स
रिलीज
07 अक्तूबर 2022
रेटिंग
4/5

‘जिंदगी खूबसूरत है, फर्क सिर्फ नजरिया है’ और जिंदगी के सबसे खूबसूरत नजरिये को समझाती है फिल्म ‘नजर अंदाज’। लेकिन, फिल्म ‘नजर अंदाज’ का पोस्टर ऐसा है कि फिल्म की ये लॉग लाइन अलग ही नजरिये से समझ आती है। पोस्टर देखकर ये भी मुंबइया फिल्मी चक्की से निकली कोई चलताऊ कॉमेडी फिल्म नजर आती है। लेकिन, इसे संयोग कहें या कुछ और, स्मार्ट टीवी पर यूट्यूब खंगालते खंगालते इस फिल्म के ट्रेलर पर रिमोट क्लिक हो गया। ट्रेलर देखकर कुछ अलग सा महसूस हुआ। पता किया कि फिल्म का कोई एडवांस शो है क्या? और, शोर में तब्दील हो चुके बैकग्राउंड म्यूजिक, नौटंकी में तब्दील हो चुके अभिनय और स्पेशल इफेक्ट्स से लबालब होती जा रही फिल्मों के दौर में देखने को मिला एक सच्चा सिनेमा! जी हां, अरसे बाद देखने को मिली एक ऐसी फिल्म जिसमें जिंदगी है, आशा है, उम्मीद है और है अभिनेता कुमुद मिश्रा का दिल को छू जाने वाला ऐसा अभिनय जिसे लोग बरसों बरस याद करेंगे।

विज्ञापन

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला

‘जिंदगी खूबसूरत है, फर्क सिर्फ नजरिया है’ और जिंदगी के सबसे खूबसूरत नजरिये को समझाती है फिल्म ‘नजर अंदाज’। लेकिन, फिल्म ‘नजर अंदाज’ का पोस्टर ऐसा है कि फिल्म की ये लॉग लाइन अलग ही नजरिये से समझ आती है। पोस्टर देखकर ये भी मुंबइया फिल्मी चक्की से निकली कोई चलताऊ कॉमेडी फिल्म नजर आती है। लेकिन, इसे संयोग कहें या कुछ और, स्मार्ट टीवी पर यूट्यूब खंगालते खंगालते इस फिल्म के ट्रेलर पर रिमोट क्लिक हो गया। ट्रेलर देखकर कुछ अलग सा महसूस हुआ। पता किया कि फिल्म का कोई एडवांस शो है क्या? और, शोर में तब्दील हो चुके बैकग्राउंड म्यूजिक, नौटंकी में तब्दील हो चुके अभिनय और स्पेशल इफेक्ट्स से लबालब होती जा रही फिल्मों के दौर में देखने को मिला एक सच्चा सिनेमा! जी हां, अरसे बाद देखने को मिली एक ऐसी फिल्म जिसमें जिंदगी है, आशा है, उम्मीद है और है अभिनेता कुमुद मिश्रा का दिल को छू जाने वाला ऐसा अभिनय जिसे लोग बरसों बरस याद करेंगे।

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कुमुद मिश्रा की बेलौस कलाकारी
कुमुद मिश्रा देखा जाए तो हिंदी सिनेमा के हाशिये पर अटके ऐसे सुपरस्टार हैं जिनको उनकी पिछली लीड किरदार वाली फिल्म ‘राम सिंह चार्ली’ के लिए ही सिर आंखों पर बिठा लिया जाना चाहिए था। लेकिन उनको मिली सीरीज ‘डॉ. अरोड़ा गुप्त रोग विशेषज्ञ’। अली अब्बास जफर ने जरूर उनकी अदाकारी की काबिलियत के हिसाब से अपनी फिल्म ‘जोगी’ में उन्हें मुख्य विलेन का किरदार थमाया। लेकिन, अपनों अपनों को रेवड़ी बांटने वाले पुरस्कार आयोजकों के लिए भी ‘नजर अंदाज’ के बाद उनकी अदाकारी को अब नजर अंदाज करना मुश्किल है। ये फिल्म एक ऐसा एहसास है जिसे सिर्फ देखकर ही महसूस किया जा सकता है। ऊपर ऊपर ये एक ऐसे दृष्टिहीन व्यक्ति का जीवन के साथ अपनापा है जिसके दिल में मोहब्बत की कसक बचपन से दबी हुई है। वह संगीत में निपुण है। वायलिन बजाता है तो ‘ब्रह्मास्त्र’ के गाने ‘केसरिया तेरा’ की धुन सी बजती मालूम होती है, लेकिन ये धुन फिल्म में बार बार दोहराई जाती है तो ये भी समझ आता है कि संगीतकार विशाल मिश्रा और प्रीतम दोनों की इस सरगम का स्रोत हो सकता है, एक ही हो। और, ये सरगम ही कहानी के नायक सुधीर भाई के जीवन की उम्मीद है। और राजशेखर के लिखे गाने जो उनके साथ या आसपास बजते हैं, वे उनकी उमंगों का आईना बनते रहते हैं।

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फर्क सिर्फ नजरिया है!
फिल्म ‘नजर अंदाज’ में नायक सुधीर भाई परदे पर पहली बार आते हैं तो सड़क के एक छोर पर खड़े दिखते हैं। एक दूसरा दृष्टिहीन उनसे सड़क पार करने की फरियाद करता है और वह उसका हाथ थाम कर वाहनों के बीच ही सड़क पर उतर चलते हैं। सड़क के दूसरी छोर पर दोनों सकुशल पहुंच जाते हैं। सुधीर भाई कहते हैं, ‘मदद के इंतजार की आदत नहीं डालनी चाहिए। नहीं तो सड़क के उस तरफ ही खड़े रह जाओगे।’ सुधीर भाई का यही जीवन परिचय है और यही जीवन दर्शन। बिना अनिष्ट की आशंका किए जीवन जीते जाना। खांडवी उनका परम प्रिय भोजन है जिसका रिश्ता उनके अपने कस्बे मांडवी से जुड़ता है। सुधीर भाई की अपनी तमन्नाएं हैं जिन्हें वह कभी खुली छत वाली कार में खड़े होकर मुंबई से बाहर लंबी सैर पर जाकर पूरी करते हैं तो कभी घास पर नंगे पैर चलकर। लेकिन, उनको एक ही दुख रहा है कि वह चार कदम भी जीवन में अपने बूते भाग नहीं सके। कहानी को इस छोर तक लाने के लिए सुधीर भाई का हाथ थामते हैं अली और भवानी।

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

सुधीर, अली और भवानी
अली का नाम ‘गली बॉय’ का जिक्र करते ही सुधीर भाई के जेहन से उपजता है। वह चाहते हैं कि जब भी वह ‘या अली मदद’ पुकारें तो अली भागता हुआ आ जाए। अली को खुद नहीं पता कि उसका नाम क्या है। दो करोड़ से ज्यादा लोगों के शहर मुंबई की गलियों में पला बढ़ा अली पेशेवर चोर है। लेकिन, सुधीर भाई उसको अपने घर में ठिकाना देते हैं। वह पूछता भी है कि एक अनजान पर भरोसा करके उन्हें डर नहीं लगता। सुधीर भाई का जवाब जिंदगी का एक और फलसफा है। वह कहते हैं, ‘जिस इंसान पर कोई भरोसा नहीं करता, उस पर जिसने भरोसा किया, वह उसी को धोखा दे जाए, ऐसा होना तो नहीं चाहिए।’ उधर, भवानी हरियाणा की दुत्कारी बिटिया है। उसे सुधीर भाई से मिलकर ही पता चला कि सच्चा प्रेम क्या होता है। वह ‘चंट’ है। सुधीर भाई की विरासत पर उसकी नजर है। खाना वह सारा मोबाइल पर ऑर्डर करके मंगाती है। सुधीर भाई को लगता है वह पाक कला में निपुण है। तीनों का ये संगम ही फिल्म ‘नजर अंदाज’ की सांसें हैं। ये कभी उखड़ती हैं तो कभी संयत होती हैं। और, बात जब हांफ जाने की हद तक सुधीर भाई के बाहें पसार कर बेधड़क भागने तक पहुंचती है तो कहानी को दूसरा छोर मिल जाता है।

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नसीरुद्दीन शाह को देखनी चाहिए फिल्म
फिल्म ‘नजर अंदाज’ के बारे में पूरी एक किताब लिखी जा सकती है। लेकिन सिनेमा देखना जरूरी है, पढ़ना उतना जरूरी नहीं है। सच्चा लेखन किसी फिल्म को जिंदगी के करीब रखने के लिए कितना जरूरी होता है, ये इस फिल्म से समझा जा सकता है। लक्ष्मण उतेकर और विक्रांत की कहानी पर ऋषि विरमानी ने जिंदगी लिखी है। नसीरुद्दीन शाह से बरसों पहले जब दृष्टिहीन किरदारों को लेकर बात चली थी तो उन्होंने अमिताभ बच्चन के फिल्म ‘ब्लैक’ के अभिनय को नकली बताया था। वह अपनी फिल्म ‘स्पर्श’ में अपने अभिनय से उसकी तुलना कर रहे थे। मैं उम्मीद करता हूं कि नसीर पहला मौका मिलते ही फिल्म ‘नजर अंदाज’ जरूर देखेंगे और फिर एक बार अपने अभिनय की तुलना कुमुद मिश्रा के अभिनय से करेंगे। निर्देशक विक्रांत देशमुख की संभवत: ये पहली फिल्म है और पहली ही फिल्म में अपने पांव वह पालने से बाहर ले आए हैं। फिल्म ‘नजर अंदाज’ जैसी फिल्म बनाने के लिए उनको साधुवाद! साधुवाद उनको एक बेहतरीन टीम चुनने के लिए भी। राकेश रंजन की सिनेमैटोग्राफी ने फिल्म की कथावस्तु को कायदे से निखारा है तो निहार रंजन की साउंड डिजाइन फिल्म को कर्णप्रिय बनाए रखती है।

नजर अंदाज’ - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जीवन की सरगम की सुरीली तान
सिनेमा एक सामूहिक प्रयास ही रहा है। एक सुपरस्टार अभिनेता या एक सुपरस्टार निर्देशक इसे अकेले खींच नहीं सकता। विक्रांत ने फिल्म ‘नजर अंदाज’ में इस भावना को भी दोहराया है। ऋषिकेश मुखर्जी के सिनेमा की तरह इसमें परिस्थितियों को कोसने की बजाय उन्हें जिंदगी का हिस्सा बनाया गया है। इसी जीवन रस को कुमुद मिश्रा ने इस फिल्म में जी भरकर पिया है। अब तक पुरस्कारों के मामले में अभागे रहे कुमुद को इस फिल्म के लिए सीधे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ही मिलना चाहिए। दिव्या दत्ता हरियाणवी भवानी के किरदार से फिल्म की सुस्ती दूर रखती हैं तो अभिषेक बनर्जी का मुंबइया टपोरी अंदाज फिल्म को रेत में ताजे ताजे भुने मक्के के दाने (पॉपकॉर्न नहीं) जैसी खुशबू देता है। छोटे से रोल में राजेश्वरी का कहानी की सरगम पूरी करना भी अलग ही एहसास है। ऐसी फिल्में बिरले ही बनती हैं, सिनेमाघर में मिस मत करिएगा...!!

विज्ञापन
विज्ञापन
Next