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फिल्म समीक्षा/तेरा सुरूर: जेब की सोचिए, जो निकलेगा वापस नहीं आएगा

Fri, 11 Mar 2016 04:07 PM IST
रवि बुले/अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • हिमेश रेशमिया फिर से आजमा रहे अभिनय में हाथ
  • फिल्म में लगा है बोल्डनेस का तड़का
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विस्तार
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निर्माताः एच.आर. मुशिक
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निर्देशकः शॉन अरन्हा
सितारेः हिमेश रेशमिया, फराह करीमी, नसीरूद्दीन शाह, शेखर कपूर, कबीर बेदी
रेटिंग *1/2

आप इस फिल्म को देखें या न देखें, निर्माता की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह रिलीज से पहले ही दंभ भरी घोषणा कर चुके हैं कि हम मुनाफे में है। संगीत से सैटेलाइट अधिकार तक सब बिक चुके हैं। जितना लगा है उससे ज्यादा निकाल चुके हैं। अतः वह आराम से मुंह ढंक कर सो सकते हैं। अब आप अपनी जेब की सोचिए क्योंकि जो निकल जाएगा, वापस नहीं आएगा।

यह उस समय का सिनेमा है जिसमें महत्वपूर्ण यह है कि कितना कमाया। बाकी बातें गौण हैं। मनोरंजन की कसौटी भी बेकार हो गई है। इस पर हिमेश स्टारर यह फिल्म कहीं से कस भी नहीं पाती।
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हिमेश की 2007 में बनी आपका सुरूर ब्रांड को यहां आगे बढ़ाया गया है। उसी अंदाज का प्रेम, थ्रिल, ऐक्शन और संगीत।

हिमेश लोकप्रिय कंपोजर-सिंगर हैं मगर उनकी जिद है कि अभिनय के लिए जाने जाएं। परंतु इसके लिए वह जिम में बनाए सिक्स पैक्स युक्त शरीर को दिखाने से ज्यादा कुछ करते नजर नहीं आते। अपनी पुरानी फिल्मों की तरह वह इस फिल्म में भी अभिनेता के तौर पर निराश करते हैं। उनके मनमा कभी इमोशन जागता नहीं दिखता। उनके संगीत में मौजूद एकमात्र तनाव का सुर अभिनय भी मौजूद है।

फिल्म की सबसे बड़ी मुश्किल यह कि यहां सब बेहद बनावटी और फाइबर ग्लास का सा एहसास देता है। कहानी, अभिनय, संगीत, ऐक्शन लेकर लोकेशन तक। एक-एक सीन बुना हुआ और नकली मालूम पड़ता है। इन बातों के बीच नसीरूद्दीन शाह, शेखर कपूर और कबीर बेदी माहौल को सहज बनाते हैं तो नकलीपन ज्यादा उभर आता है। फराह करीमी इस कृत्रिम कारीगरी में फिट हैं और उन्हें निर्देशक ने अभिनय के साथ शरीर दिखा कर भी दर्शकों को आकर्षित करने का मौका दिया है। अतः वह कुछ लोगों की नजरों को भा सकती हैं।
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कहानी के नाम पर बासी बॉलीवुड मसाले हैं

जहां तक कहानी का सवाल है तो इसमें प्यार की आड़ में चलने वाले थ्रिल के नाम पर बासी बॉलीवुड मसाले हैं। कारों की रेस और हवा-हवाई ऐक्शन नया नहीं है। हीरो की हीरोइन को यहां किसी ने ड्रग्स स्मग्लिंग के मामले में फंसा दिया है। वह विदेशी जेल में है। हीरो उसे हर तरह से बचाने की कोशिश कर रहा है जिसमें वह जेल तोड़ने में माहिर सैंटिनो (नसीरूद्दीन शाह) की मदद ले रहा है।

हीरो के बचपन के फ्लैशबैक उसके किरदार की परतें खोलते हैं। फिल्म को बेहतर ढंग से लिखा जाता तो थ्रिल और इमोशन उभर सकते थे क्योंकि कथा में नयापन नहीं है। साथ ही वह बार-बार पटरी से उतर जाती है। निर्देशक भ्रमित मालूम पड़ता है। ऐसे में अंत भी बहुत आश्वस्त नहीं करता। हिमेश का गीत-संगीत और कैमरे में कैद कुछ लोकेशन जरूर कहीं-कहीं आकर्षित करते हैं मगर ऐसे नहीं हैं कि उनका सुरूर लंबे समय तक बना रहे।
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