वे कागज के मुखौटे बना कर अपनी पहचान छुपा कर लड़ते हैं। हालांकि इन्हीं में से एक सिकंदर (हर्षवर्द्धन) यह सब छोड़ कर अमेरिका जाना चाहता है। तभी पानी माफिया से लड़ते हुए भावेश जोशी (प्रियांशु पेन्युली) को जान से हाथ धोना पड़ता है। राज्य का मंत्री (निशिकांत कामत) सार्वजनिक पाइप लाइनों को काट कर पानी चुराने वाले गिरोह के शिखर पर बैठा है और मुंबई में इस वजह से बड़ा जल-संकट है। मंत्री से टकराना भावेश जोशी को भारी पड़ता है। दोस्त के मारे जाने के बाद सिकंदर के इरादे बदलते हैं और हालात से टकराने और दोस्त को इंसाफ दिलाने की लड़ाई वह अपने हाथ में ले लेता है।
वास्तव में यहां लड़ रहे युवा उस तरह से सुपरहीरो नहीं हैं, जैसा कॉमिक बुक्स में हुआ करते हैं। फिल्म की समस्या यह है कि इसका कथानक मुंबई केंद्रित है और सुपरहीरो की लड़ाई साधारण है। भावेश जोशी के रूप में प्रियांशु पेन्युली भले ही प्रभाव छोड़ते हैं लेकिन लीड एक्टर के रूप में हर्षवर्द्धन कपूर डेब्यू फिल्म मर्जियां (2016) से थोड़े ही बेहतर नजर आते हैं। उनका अभिनय भी एक स्तर से ऊपर नहीं उठता। उनकी गर्लफ्रेंड (श्रेया सबरवाल) कहानी में आती हैं और अचानक खो जाती हैं। फिल्म में कुछ दृश्य अच्छे बने हैं और कैमरे ने मुंबई को रात के अंधेरों और बरसात में खूबसरती में कैद किया है मगर भावेश जोशी की कहानी देखने के लिए इतना ही काफी नहीं है।