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फिल्म समीक्षा: मस्तानी की मोहब्बत और बाजीराव का 'करंट'

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निर्माताः सुनील लुल्ला-संजय लीला भंसाली
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निर्देशकः संजय लीला भंसाली
सितारेः रणवीर सिंह, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा, तन्वी आजमी
रेटिंग ****

बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं। जो लोग इश्क को दुनियावी चश्मे में लगे धर्म, जाति, समाज के लैंस में से देखते हैं उन्हें भी पेशवा बाजीराव और उन्हें टूट कर चाहने वाली मस्तानी की प्रेम कहानी में रूहानी एहसास मिलेंगे।

यूं तो हमारी सिनेमाई कहानियां प्रेम के दृश्यों, संवादों, गीतों से पटी पड़ी हैं लेकिन यह संजय लीला भंसाली का कमाल है कि वह इसे नए, अनूठे और अनदेखे संसार में रचते हैं। उन्होंने इतिहास में मिलने वाली बाजीराव-मस्तानी की कहानी को सिनेमाई लचीलेपन के साथ भव्य और मनोरंजक बनाया है।
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हालांकि इससे कई लोग असहमत हैं। परंतु इसमें संदेह नहीं कि भंसाली ने अतीत की एक प्रेम कहानी को पर्दे पर लाकर पुनर्जीवन दिया है, जिसके बारे में लोग मराठा इतिहास से बाहर कम ही जानते थे। फिल्म कुछ हिस्सों में आपको क्लासिक मुगल-ए-आजम जैसा एहसास भी देती है।

मस्तानी के हाथों अपना दिल हार बैठा बाजीराव

हिंदुस्तान के मुगलकालीन वर्चस्व वाले इतिहास में मराठों का उदय महत्वपूर्ण अध्याय है। इसी अध्याय में पेशवा श्रीमंत बाजीराव बल्लाल भट (1700 से 1740) हुए। उन्होंने अपने जीवनकाल में 40 से अधिक युद्ध लड़े और एक भी नहीं हारा। लेकिन तलवार की ताकत से सबको झुका लेने वाला यह वीर, बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल की बेटी मस्तानी के हाथों अपना दिल हार बैठा।

मस्तानी, जिसकी रगों में राजपूत पिता और मुस्लिम मां का रक्त दौड़ रहा था। भंसाली की कहानी शुरुआती मिनटों में हर हर महादेव के नारों और लहराते भगवा ध्वजों के साथ बाजीराव की वीरता से परिचय करने के बाद उनके और मस्तानी के उन्मुक्त प्रेम तथा दांपत्य के साथ परिवार के अन्य सदस्यों के विरोध, तत्कालीन समाज की धर्म-जाति को लेकर संकीर्ण सोच को सामने लाने की तरफ बढ़ जाती है।

इन बातों के बीच बाजीराव और मस्तानी ऐसे किरदारों के रूप में उभरते हैं जो प्रेम और मानवता का परचम बुलंद करते हैं। इनके साथ एक करुण कहानी बाजीराव की प्रथम पत्नी काशीबाई की है। पेशवाई में सबसे ज्यादा अन्याय सहन करना पड़ता है ‘पेशविन बाई’ (पेशवा की पत्नी) को। इस किरदार की असहाय स्थिति को प्रियंका चोपड़ा ने खूबसूरती से निभाया है।
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रणवीर सिंह की एनर्जी काबिल-ए-तारीफ है

भंसाली अपनी कहानी में लगातार संदेश देते हैं कि प्रेम धर्म-जाति-समाज के दायरों से ऊपर है। प्रेम के लिए आप जी भी सकते हैं और मर भी सकते हैं। फिल्म अपनी कहानी के साथ बेहतरीन दृश्यों के लिए यादगार है। भंसाली ने महाराष्ट्रीन संस्कृति को पर्दे पर आकर्षक रंगों में रंगोली-सा उकेरा है। भव्यता के बीच यहां एक सादगी भी है और सब कुछ बहुत तड़कता-भड़कता नहीं है। यह आंखों को सुख देता है।

फिल्म में संवाद अच्छे हैं और कुछ शेरो-शायरी भी है। गीत-संगीत-नृत्य सुनने-देखने में अच्छा है। बाजीराव के रूप में रणवीर सिंह की एनर्जी काबिल-ए-तारीफ है। किसी किरदार में इतना करंट आपने आखिरी बार कब देखा था, यह सोचने के लिए आपको दिमाग पर अच्छा खासा जोर देना पड़ेगा। मात्र 40 साल की उम्र में गुजर जाने वाला यह पेशवा युद्ध और प्रेम दोनों की अवस्थाओं में इतना ही उर्जावान रहा होगा, रणवीर को देख कर यह विश्वास होता है।

मस्तानी के रूप में दीपिका सुंदर लगी हैं मगर योद्धा के रूप में वह और निखर कर आती हैं। हालांकि बाजीराव के घर आने के बाद उनके किरदार की खूबियां कुछ सिमट गई सी मालूम पड़ती हैं। निर्देशक उन्हें उभार सकता था। परंतु ऐसे में वह प्रियंका पर भारी पड़ जातीं। प्रियंका को कहानी में और पर्दे पर पर्याप्त जगह मिली है, जिससे उन्होंने दर्शकों को प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह उनके करिअर की एक बेहतरीन भूमिकाओं में से है।

बाजीराव की मां, आई साहेब के रूप में तन्वी आजमी एक उम्दा और याद रखने योग्य भूमिका में है। ऐसा लगता है कि निर्देशक पर कहीं फिल्म को एक तय अवधि में समेटने का आंतरिक दबाव था। इस कारण मस्तानी समेत कुछ किरदार थोड़े दबे रह गए। इसी तरह कहानी तथा पटकथा में कल्पनाशीलता के साथ थोड़ी और मेहनत की गई होती यह फिल्म क्लासिक की श्रेणी में शामिल होती। यह नहीं भूलना चाहिए कि लेखन ही सिनेमा की रीढ़ है।
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