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Movie Review: सेकंड हाफ में बहकी 'शुभ मंगल सावधान'

Fri, 01 Sep 2017 12:57 PM IST
रवि बुले
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शुभ मंगल सावधान
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-निर्माताः कृषिका लुल्ला/आनंद एल.राय
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-निर्देशकः आर.एस. प्रसन्ना
-सितारेः आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, सीमा पाहवा, अंशुल चौहान, बृजेंद्र काला
रेटिंग **

नल से टपकता बूंद-बूंद पानी। चाय में डूब कर भीगा-टूटा बिस्कुट। यह है जेंट्स वाली प्रॉब्लम के संकेत। फिल्म का हीरो मुदित (आयुष्मान खुराना) इसी से ग्रस्त है। वह अपनी अरेंज-कम-लव मैरिज से पहले हीरोइन सुगंधा (भूमि पेडनेकर) के साथ कुछ कुछ करने की कोशिश करता है मगर उससे हो नहीं पाता। भागकर शादी करके सपने देखने वाली हीरोइन जल्दी ही माजरा समझ जाती है। परेशान हो जाती है। घर में मां-बाप-भाई पर चिल्लाती है, बर्तन पटकती है और सहेली से समस्या शेयर करती है।

सहेली समझाती है कि शायद सुगंधा ही हॉट नहीं है और उसे अंग्रेजी सीडी की नायिकाओं वाले अंदाज नहीं आते, इससे हीरो का प्यार उसे नहीं मिला। उधर, बेटी की परेशानी समझने के बाद मां उसे अलीबाबा और गुफा की कहानी एडल्ट अंदाज में समझाती है। होते-होते बात खुल जाती है और दोनों परिवारों को मुदित की समस्या का पता चल जाता है। अब क्या हो...? सुखद सिर्फ यही कि नायिका इन हालात में नायक के साथ खड़ी है।
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शुभ मंगल सावधान
वास्तव में शुभ मंगल सावधान जब तक फुसफुसी टोन में, इशारों में बातें करती है तब तक धीमी रफ्तार के बावजूद कुछ बांधे रहती है। मगर जैसे ही बंधन टूटते हैं तो फूहड़ता पर्दे पर बहने लगती है। हास्य क्रमशः हास्यास्पद होता चला जाता है। विश्वास करना मुश्किल होता है कि आयुष्मान-भूमि की यह वही जोड़ी है जिसने दम लगा के हइशा में कमाल किया था। यह वही निर्माता (आनंद एल.राय) हैं जिन्होंने तनु वेड्स मनु, रांझणा, निल बटे सन्नाटा और हैप्पी भाग जाएगी जैसी परिवार के संग देखने लायक फिल्में बनाईं।

शुभ मंगल सावधान देख कर यह भी लगता है कि हिंदी पट्टी के नायक में संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं बची। हर समाज में कुरीतियां और कुछ पिछड़ी सोच होती है। उन पर प्रहार करना सही है लेकिन हिंदी भाषी परिवारों की ही हंसी उड़ाना, कैसी कॉमेडी है? शुभ मंगल सावधान यही करती है।
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शुभ मंगल सावधान
फिल्म में अपने समय के साथ ताल मिलाकर आगे बढ़ने वाला एकमात्र किरदार सुगंधा की मां (सीमा पाहवा) का है। यह प्रभावित करता है। सीमा हाल में बरेली की बर्फी में भी नायिका (कृति सैनन) की मां बनी थीं। आयुष्मान-भूमि की जोड़ी यहां नहीं जमी। सादगी के चक्कर में भूमि का हीरोइन वाला अंदाज खो गया, जबकि आयुष्मान समस्याग्रस्त होकर भी हीरो वाले लटके-झटके दिखाते रहे।

फिल्म कहीं-कहीं जरूर चुटीले संवादों से हंसाती है। निर्देशक प्रसन्ना प्रभाव नहीं छोड़ते। पहले हिस्से में कहानी पर उनका नियंत्रण है लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म बहक जाती है। खास बात यह कि जिस इरेक्टाइल डिसफंक्शन यानी नपुंसकता के मुद्दे पर पूरा कथानक बुना गया, वह क्लाइमेक्स पर पहुंचता ही नहीं। फिल्म अंततः संतुष्ट नहीं करती।
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