-निर्माताः भूषण कुमार/कृषन कुमार
-निर्देशकः मिलन लुथरिया
-सितारेः अजय देवगन, इमरान हाशमी, इलियाना डिक्रूज, विद्युत जामवाल, ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा
रेटिंग **
वो इश्क ही क्या जो बर्बाद न करे। वाकई सिनेमा से इश्क भी बर्बाद करता है। वक्त और पैसा दोनों। खास तौर पर जब फिल्म बादशाहो जैसी हो। जिसमें राइटर-डायरेक्टर को पता न हो कि आखिर क्या कहना है? क्या वह कहना चाहते हैं कि इमरजेंसी के दौर में एक विधवा महारानी का खजाना सरकार ने लूट लिया या लूटने की कोशिश की थी? वह महारानी अपने जगप्रसिद्ध सौंदर्य का इस्तेमाल लोगों को अपना प्यादा बनाने में करती थी?
वह दिखावे के लिए अपनी जनता के प्रति रहम दिल थी मगर असल में उनका खून पीती थी? इतिहास के पन्ने खून और धोखे से सने हैं। चूंकि इस कहानी के प्रेरणा-सूत्र कयासों की धुंध में है तो लेखक-निर्देशक ने अपनी कल्पना से ऐसा रायता फैलाया कि अंत में उन्हीं से समेटते नहीं बना। किसी फिल्म का बादशाहो जैसा खराब क्लाइमेक्स वर्षों में आपने नहीं देखा होगा। इसके लिए आप जरूर यह फिल्म देख सकते हैं।
baadshaho
बादशाहो की कहानी 1975 में देश में लगे आपातकाल के दरमियान घटती है। इसमें संजय गांधी नुमा गेट-अप लगाए नेता संजीव, जो महारानी गीतांजलि (इलियाना डिक्रूज) के हुस्न को पाने में पहले नाकाम रहा था, उनके महल में छुपे खजाने को जब्त करने का हुक्म देता है। हीरे-मोती-सोने का यह खजाना जब्त कर लिया जाता है। उसे दिल्ली पहुंचाने की जिम्मेदारी आर्मी अफसर सहर (विद्युत जामवाल) की है।
परंतु महारानी के विश्वसपात्र/प्रेमी भवानी (अजय देवगन) और उसके दोस्तों (इमरान हाशमी, संजय मिश्रा) के होते हुए यह कैसे संभव है? मगर राजा-रानियों की कहानियों में षड्यंत्रों की खास जगह होती है, इससे कहानी का ऊंट अचानक करवट बदल लेता है। बादशाहो में इक्का-दुक्का मौकों पर ऊंट करवट बदलता है लेकिन चौंकाता नहीं। इस बदलाव से कहानी और लचर हो जाती है।
बादशाहो
- फोटो : SELF
फिल्म न तो अजय देवगन के फैन्स के लिए है और न इसे इमरान हाशमी का प्रभावी रोल कह सकते हैं। हालांकि निर्देशक ने शराफत और इमरान को एक वाक्य में नहीं रखा, तब भी सनी लियोनी और ईशा गुप्ता के साथ उनका ‘किस’ तक नहीं है। अजय अभिनय में कुछ नया नहीं जोड़ते और उनकी पुरानी इमेज का असर यहां नहीं दिखता है। कह सकते हैं कि वह निराश ही करते हैं। थोड़े प्रभावी कोई हैं तो इलियाना और विद्युत।
परंतु उनके किरदारों का विस्तार नहीं है। ईशा गुप्ता क्या कर रही हैं, पूरी फिल्म में इसका उत्तर नहीं मिलता। बादशाहो की कहानी और पटकथा दोनों फिल्म को कमजोर बनाती हैं। मेरे रश्के कमर के अलावा गीत-संगीत ठंडा है। बादशाहो ऊंचे लोगों की ऊंची पसंद टाइप फिल्म नहीं है। अगर अस्सी के दशक में यह आती तो ठीक लगती, मगर तब भी कामयाब होने के लिए अच्छे क्लाइमेक्स की जरूरत पड़ती। फिर यह तो 2017 है।