-निर्देशकः अभिराज मीनावाला
-सितारेः आयुष शर्मा, वरीना हुसैन, रोनित रॉय, राम कपूर
रेटिंग *1/2
आयुष शर्मा की पहचान सलमान खान के बहनोई के रूप में है। लवयात्री देख कर नहीं लगता कि वह नई पहचान बना पाएंगे। लवयात्री और इससे करिअर की यात्रा शुरू कर रहे आयुष दोनों निराश करते हैं। हैरानी होती है कि जब हिंदी सिनेमा रचनाधर्मिता में नई ऊंचाइयां छूने की कोशिश कर रहा है, सलमान ने आयुष को बासी और घिसी-पिटा कहानी से लॉन्च किया। सलमान इतने बड़े स्टार है कि हर बात को हंसी में उड़ा देते हैं। शायद इसी हंसी-हंसी में उन्होंने फिल्म में आयुष के किरदार का नाम सुश्रुत उर्फ ‘सुसु’ रखे जाने दिया! लवयात्रा में सलमान के बड़े नाम और ग्लैमर की चमक में खोकर आप कुछ ढूंढने निकलेंगे तो कुछ हाथ नहीं लगने वाला।
लवयात्री रईस प्रेमिका और गरीब या मिडिलक्लास प्रेमी वाली फार्मूलाबद्ध कहानी है, जिसमें लड़की के पिता को रिश्ता मंजूर नहीं। लेखक-निर्देशक ने बगैर कुछ नया सोचे इसे फिल्मा दिया। उनका एकमात्र उद्देश्य यही लगता है कि कमजोर कथानक तथा हीरो-हीरोइन को गरबा नाच की रंग-बिरंगी नवरात्री से ढंक दिया जाए। बेहतर होता इन छह गानों के म्यूजिक वीडियो बना दिए गए होते। कहानी में सुसु (आयुष) बड़ोदरा में रहने वाला ऐसा लड़का है जिसे पिता नालायक-निकम्मा समझते हैं। उसे नौकरी ढूंढने को कहते रहते हैं। परंतु लोगों को गरबा सिखाने वाला सुसु बड़ी डांस अकादमी खोलने का सपना पाले है। दूसरी तरफ लंदन में पावरफुल एनआरआई (रोनित रॉय) की पढ़ाई-लिखाई में तेज बेटी मनीषा (वारीना हुसैन) की पिता से एकमात्र मांग है कि उसे भारत घूमने के लिए जाने दें। पिता उसे नवरात्रि के दिनों में जाने की इजाजत देते हैं।
बड़ोदरा में हीरो-हीरोइन के मिलने के बाद उनमें धीरे-धीरे प्यार पनपता है। हीरोइन के पिता को यह पसंद नहीं आता और उसकी कोशिशों से थोड़े ही समय में दोनों में गफलत पैदा हो जाती है। हीरोइन लंदन लौट जाती है। हीरो उसके पीछे जाता है। यहां अमीर बाप-गरीब हीरो की डायलॉगबाजी के बीच थोड़े से ड्रामे के बाद लवली-सा द एंड हो जाता है। कहानी में हीरो का मददगार मामा (राम कपूर) और उसके दो दोस्त (प्रतीक गांधी-सजील पारख) यही नजर रखे रहते हैं कि सुसु-मनीषा में प्यार बढ़े। लंदन में दो गुजराती पुलिसवालों के रूप में अरबाज और सोहेल खान भी हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लेखक-निर्देशक किस तरह लकीर के फकीर हैं।
राम कपूर तथा प्रतीक गांधी के अच्छे परफॉर्मेंसे का साथ मिलने पर भी आयुष अपना स्तर नहीं बढ़ा पाए। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी आयुष हैं। इस लिहाज से सलमान ने जिस उद्देश्य से फिल्म बनाई, वही बेकार सिद्ध हो गया। डांस में तो आयुष ठीक हैं परंतु ऐक्टिंग में वह न रोमांटिक क्षणों में और न कॉमिक दृश्यों में खुद को साबित कर पाते हैं। उनका लुक भी पारंपरिक प्रेमी हीरो की तरह नहीं लगता। वारीना की भी यह पहली फिल्म है और कमजोरियों के बावजूद आयुष से बेहतर हैं। उन्हें आगे मौके मिलेंगे। फिल्म का पहला हिस्सा रोमांस वगैरह की गुंजायश के साथ आप सह सकते हैं परंतु दूसरे हिस्से में जैसे सब भगवान भरोसे है।