'आप नहीं मानेंगे लेकिन ये सब होता है...', फिल्म 'चरक' इसी उधेड़बुन को सुलझाती हुई लगती है। फिल्म में आगे क्या होगा, यह जानने की लालसा आपको लगभग दो घंटे तक सीट से बांधे रखती है। फिल्म किस विषय पर है? इसमें क्या खास है? आइए इन सबके बारे में जानते हैं।
चरक: फियर ऑफ फेथ
- फोटो : यूट्यूब
कहानी
फिल्म में बंगाल के एक गांव की कहनी दिखाई गई है जहां चरक त्योहार मनाया जाता है। यह एक ऐसा त्योहार है जिसमें लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। गांव के लोग यह मानते हैं कि अगर किसी को बच्चा नहीं हो रहा हो, तो वह चरक त्योहार में पूजा करे। इससे उसकी मनोकामना पूरी हो जाएगी। फिल्म की कहानी की शुरुआत भी ऐसे ही होती है।
सुकुमार (शशि भूषण) को बच्चा नहीं होता है। वह हर साल चरक त्योहार में बच्चे की मनोकामना करता है। हालांकि उसकी मनोकामना पूरी नहीं होती है।
दूसरी तरफ पुलिस ऑफिसर सुभाष (साहिदुर रहमान) की पत्नी शेफाली (अंजलि पाटिल) को भी बच्चा नहीं होता। सुभाष चरक त्योहार के बारे में सुनता है, हालांकि वह इस मौके पर कोई मनोकामना नहीं करता।
गांव में दबी आवाज में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि अगर बच्चा चाहिए, तो पहले बच्चे की बलि देनी होगी। सुकुमार को बच्चा तो चाहिए लेकिन वह बच्चे की बलि देने से घबराता है। सुभाष को भी बच्चा चाहिए लेकिन वह अंधविश्वास में यकीन नहीं रखता।
ऐसे में चरक त्योहार से पहले गांव से दो बच्चे गायब हो जाते हैं। गांव वालों को लगता है कि चरक के दिन बच्चों की बलि दी जाएगी।
क्या बलि देने के लिए सुकुमार ने बच्चों को चुराया? क्या सुभाष भी अंदर ही अंदर अंधविश्वास में यकीन करके बच्चों की बलि देने का प्लान बना रहा है? क्या वाकई चरक त्योहार में दो बच्चों की बलि दी जाएगी? क्या बलि देने से संतान की प्राप्ति होती है? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
चरक: फियर ऑफ फेथ
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अभिनय
फिल्म के कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। पुलिस के किरदार में सुभाष ने अच्छा काम किया है। उनको देखकर कोई ये अंदाजा नहीं लगा सकता कि वह हीरो का रोल कर रहे हैं या विलेन का। अंजलि पाटिल कम वक्त के लिए आई हैं। लेकिन उन्होंने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वह मॉडर्न लेडी के किरदार में हैं।
संखदीप बनर्जी ने बिरसा के किरदार में सधी हुई अदाकारी की है। बच्चों वाली उनकी मासूमियत दर्शकों को उनके प्रति दया भाव से भरती है।
संखदीप बनर्जी के पिता बने सुब्रत दत्ता ने एक शराबी और लापरवाह इंसान का किरदार निभाया है। उनके अभिनय को देखकर लगता है कि असल जिंदगी में वह इसी तरह से होंगे।
शशि भूषण ने ऐसे शख्स का किरदार किया है, जिसके बच्चे नहीं हैं। उनके चेहरे के हाव-भाव से लगता है कि वाकई उनकी जिंदगी में अगर किसी चीज की कमी है तो एक बच्चे की।
चरक: फियर ऑफ फेथ
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निर्देशन
फिल्म के निर्देशक शिलादित्य मौलिक हैं। इसमें उन्होंने कई बारीकियों पर ध्यान दिया है। फिल्म के दृश्य अच्छे हैं। लोकेशन भी अच्छी है। कई बार कई सीन देखकर डर भी लगता है कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। 'इस बार लाश से काम नहीं चलेगा, जिंदा बच्चा चाहिए।', 'मैं पहले इन सब चीजों को नहीं मानता था, लेकिन जब देखा तब मानने लगा।' इस तरह के डायलॉग फिल्म को मजबूती देते हैं।
निर्देशक ये दिखाने में कामयाब रहे हैं कि पढ़े-लिखे काबिल लोग जब दवा करके थक जाते हैं, तो वह अंधविश्वास की तरफ चले जाते हैं। अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए अगर उनको दूसरों का नुकसान करना पड़े, तो इससे पीछे नहीं हटते हैं। फिल्म देखते हुए कई बार लगता है कि यह चीजें हमारे आस-पास भी होती हैं।
चरक: फियर ऑफ फेथ
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फिल्म के सीन और म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक बिशाख ज्योति ने दिया है। सही जगह पर सही म्यूजिक का इस्तेमाल किया गया है। कई विजुअल्स इतने असली हैं कि आपको परेशान करते हैं। कलाकारों का मेकअप बिलकुल असली लगता है।
चरक: फियर ऑफ फेथ
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देखें या नहीं?
फिल्म की कहानी एक ऐसे मुद्दे पर है जिस पर अक्सर बहस होती है। आज के नए जमाने में भी ऐसे लोग हैं, जो अंधविश्वास पर यकीन करते हैं। फायदे से ज्यादा लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। फिल्म के जरिए बताने की कोशिश की गई है कि अच्छे त्योहारों को लोगों ने अपने फायदे के लिए इसमें कितने बदलाव कर दिए हैं। फिल्म की कहानी बीच में थोड़ी उबाऊ होती है लेकिन आखिर में संभल जाती है। इस फिल्म को मनोरंजन के लिए ना देखें। जो लोग डॉक्यूमेंट्री के शौकीन हैं उनके लिए ये सही फिल्म है। फिल्म एक बार देखी जा सकती है। हालांकि बच्चों को लेकर ना जाएं।