‘मजा मा’, गुजराती में इसका मतलब होता है कि मजे में हूं यानी सब ठीक है। आमतौर गुजराती दोस्तों से हालचाल पूछने के लिए मुंबई में गैर गुजराती लोग पूछते हैं कि ‘सू छे?’ यानी कि कैसा है सब कुछ? जवाब है, ‘मजा मा’। विदेशी कंपनियों के ओटीटी देश के सुदूर क्षेत्रों में अपनी पहुंच बनाने के लिए ऐसी कहानियां दिखना चाहते हैं जिसमें बदलते भारत की खुशबू रची बसी हो। कभी वे दक्षिण जाते हैं, कभी पूरब और उत्तर और इस बार उनके फोकस में है पश्चिम यानी गुजरात और दुनिया भर में बसे यहां के गुजराती परिवार। परंपरागत रूप से उत्सवधर्मी इस समुदाय का उल्लास, इनके रीति रिवाजों के रंग और इनकी पारिवारिक सम्बद्धता लोगों को लुभाती है। फिल्म ‘मजा मा’ पहली नजर में गुजराती फिल्म ही लगती है। एक गुजराती फिल्म में माधुरी दीक्षित, क्या ही आकर्षण है किसी फिल्म का! लेकिन, फिल्म हिंदी में है। और, जैसे ही इसे बनाने वालों ने गुजराती पृष्ठभूमि के एक मूल विचार को सार्वभौमिक बनाने की कोशिश की, साथ में ही चली आईं वे तमाम बंदिशें जो इसे बनाने वालों ने ओटीटी पर भी गले लगाए रखीं। मामला यहीं लड़खड़ा गया।
नए दौर की अधोगामी कहानी
कहानी साल 2022 में दिखाई जा रही है। फिल्म ‘मजा मा’ में न्यू मिलेनियल्स जैसा सब कुछ है। अमेरिका में बसे धनाढ्य दंपती को अपनी बेटी के लिए एक संस्कारी, पारंपरिक और कुंवारा लड़का चाहिए। वह उनकी बेटी से धन दौलत के लिए तो शादी नहीं कर रहा, ये जानने के लिए संभावित वर का ‘लाई डिटेक्टर टेस्ट’ होता है। प्रेम अंधा होता है लेकिन बिना रीढ़ का भी होता है, ये फिल्म ‘मजा मा’ इस दृश्य से स्थापित करने की कोशिश करती है। खैर, मामला अमेरिका से गुजरात आता है। ‘ऑथेंटिक’ और ‘रूटेड’ फैमिली तलाश रहे अमेरिकी दंपती को इस बात पर गर्व है कि उनकी बेटी ‘वर्जिन’ है। वह रजस्वला स्त्री के हाथों से चाय तक नहीं पीते। प्रगतिवादी सिनेमा होने की कोशिश करते करते फिल्म ‘मजा मा’ एकदम से सिर के बल खड़ी हो जाती है। और, इसके बाद जमाना वायरल वीडियो देखता है। बेटे की मां खुद को ‘समलैंगिक’ बताती है। शादी के 30 साल बाद वह यह बात अपनी बेटी से कहती है। बेटी समलैंगिक और अन्य लैंगिक पसंद वालों की हिमायती है। कुछ अलग सा बनाने के चक्कर में इसके रचयिता आनंद तिवारी मनोरंजन की धारा से कहीं दूर बह जाते हैं।
अधपके किरदारों का बेमजा पकवान
फिल्म ‘मजा मा’ के किरदार भी सारे अधपके ही हैं। गजराज राव को माधुरी का हीरो बनने का मौका मिला, उनके लिए उनके जीवन की यही सबसे बड़ी उपलब्धि रही। परदे पर वह किस विदूषक का चरित्र कर रहे हैं, उसकी तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया। नकली से लगते अमेरिकी अंदाज वाले उच्चारण की अंग्रेजी बोलते रजित कपूर, शीबा चड्ढा और बरखा सिंह हास्यापद लगते हैं। अमेरिका में बरसों से बसे भारतीयों से बात होने पर ऐसी अंग्रेजी बोलने वाले की तलाश मुझे भी अक्सर रहती है। काश! एक बॉब या एक पैम मेरे परिचितों में भी होता। युवा कलाकारों में ऋत्विक भौमिक और बरखा सिंह बात बात पर उंगली पर उंगली चढ़ाकर सिर्फ अपने कमजोर आत्मविश्वास को ही दिखाते नजर आते हैं। स्मृति श्रीवास्तव का किरदार फिल्म का उत्प्रेरक हो सकता था लेकिन यहां भी आनंद तिवारी गोता लगा गए हैं। नवरात्रि के ठीक बाद रिलीज हुई फिल्म ‘मजा मा’ के संगीत से बहुत उम्मीदें थी लेकिन पूरी फिल्म में एक भी गाना ऐसा नहीं है जो अगले साल गरबा पर बजने की संभावना जगाता हो।