लड़ाई छोटे शहर से आए कलाकार की
कानपुर के आकाश प्रताप सिंह ने मुंबई के तमाम फिल्म निर्माता, निर्देशकों के दरवाजे खटखटाने के बाद खुद को बतौर हीरो पेश करने के लिए फिल्म ‘मैं लड़ेगा’ बनाई है। इसे बनाने वाली कंपनी कथाकार फिल्म्स से भी वह जुड़े हैं। फिल्म की कहानी, पटकथा और इसके संवाद उन्होंने खुद लिखे हैं। कहानी कुछ कुछ उनकी अपनी कहानी से प्रेरित दिखती है। मां और नानी का दुलारा और बाप का दुत्कारा 12वीं का छात्र अक्षय प्रताप सिंह बीच सत्र में एक दूसरे स्कूल में दाखिला लेता है। युद्ध में शहीद सैनिकों के बच्चों के लिए बने हॉस्टल में रहता है और पढ़ाई में तेज होने के चलते अमीरजादों के निशाने पर रहता है। साथ पढ़ने वाली गौरी उसकी मेधा पर मोहित है। लेकिन, अक्षय का विचलित बचपन उसे सहज नहीं रहने देता। वह अपनी मां को उस जहरीले माहौल से बाहर निकालना चाहता है और इसीलिए जब स्कूल के प्रिसिंपल राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने वाले को एक लाख रुपये ईनाम देने का एलान करते हैं तो डेढ़ पसली का अक्षय ये रकम जीतने के लिए बॉक्सिंग रिंग में उतर जाता है।
घरेलू हिंसा से उपजे मानसिक अवसाद की कहानी
फिल्म मैं लड़ेगा अवध क्षेत्र के किसी भी बच्चे की कहानी हो सकती है। एक पीढ़ी पहले तक इस क्षेत्र के पिता अपने आतंक को ही अपना रुआब समझते रहे हैं। हाथ में जो आया उससे घरेलू हिंसा करते दिखते रहे हैं। यहां हालांकि हिंसा का निशाना बच्चे नहीं बल्कि उनकी मां है लेकिन बच्चे इस सबसे इतने सहमे दिखते हैं कि ये उनके मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक विकास में बाधक बनने लगता है। मां और नाना अक्षय को इसी माहौल से निकलने के लिए हॉस्टल भेज देते हैं। छोटे भाई वंश को अक्षय सिखाता रहता है कि हिंसक बाप से बचना हो तो क्या करना है और जरूरत पड़ने पर नाना को फोन करना है। स्कूल जाने के रास्ते वह उसे नाना का फोन नंबर भी रटाता रहता है। दूसरे स्कूल पहुंचे अक्षय को साथी छात्र गुरनाम में अपना बॉक्सिंग कोच मिलता है। वह लड़ता भी अच्छा है। लेकिन, उसके अंदर धीरे धीरे अहंकार भी पनपने लगता है और किसी भी विजयपथ पर जब अहंकार आखों पर छाने लगे तो रास्ता भटकने की आशंका सौ फीसदी बनने ही लगती है।
हिंदी सिनेमा में अदाकारी का नया आकाश
अभिनेता आकाश प्रताप सिंह के लिए फिल्म मैं लड़ेगा किसी लॉन्च पैड जैसी है। उनका बहनोई कोई सुपरसितारा नहीं है लिहाजा फिल्म के प्रीमियर पर भी गिने चुने लोग ही ऐसे पहुंचे जिनकी हिंदी सिनेमा में कोई पहचान है। ट्रेलर फिल्म का दमदार दिखा तो लोगों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई। फिल्म अपने ट्रेलर से जगी उम्मीदों पर सौ फीसदी खरी उतरती है। आकाश ने फिल्म की पटकथा चुस्त रखी है और अपना अभिनय बिल्कुल दुरुस्त। मानसिक अवसाद से जूझते छात्र से लेकर रिंग में दो दो हाथ करने के काबिल बने किरदार को आकाश ने बहुत ही करीने से परदे पर निभाया। है। हालांकि, इंटरवल के बाद और क्लाइमेक्स से ठीक पहले फिल्म का रूमानी ट्रैक इसे पटरी से उतारने की पूरी कोशिश करता है लेकिन फिल्म थोड़ा लड़खड़ाने के बाद वापस अपने गंतव्य की तरफ रास्ता बना ही लेती है। उत्तर भारतीय छात्र और महाराष्ट्र की छात्रा के बीच का प्रेम प्रसंग अच्छा बुना गया है। आकाश ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से जीया है और उनकी जोड़ीदार बनी वल्लारी विराज ने उनका अच्छा साथ दिया है। फिल्म कई मौकों पर दिल को छू जाती है।
पहले दिन से होनी चाहिए टैक्स फ्री
घरेलू हिंसा का बच्चों के मन मस्तिष्क पर कितना गहरा असर पड़ता है, ये दिखाने वाली फिल्म मैं लड़ेगा हर उस स्कूली बच्चे को देखनी चाहिए, जो किसी न किसी तरह की मानसिक समस्या से ग्रसित है। सरकार चाहे तो इसे स्कूलों में दिखाने की अपनी तरफ से भी व्यवस्था कर सकती है। पता नहीं आकाश प्रताप सिंह की राजनीतिक पहुंच कितनी है, इस तरह की फिल्में पहले दिन से टैक्स फ्री होनी ही चाहिए। सेंसर बोर्ड जितनी मुस्तैदी इन दिनों जातीय और धार्मिक समीकरणों को लेकर दिखा रहा है, वैसी ही कुछ मुस्तैदी उसे इस तरह की फिल्मों को टैक्स फ्री करने की संस्तुति करने के लिए भी दिखानी चाहिए। निर्देशक गौरव राणा ने भी फिल्म को शुरू से आखिर तक इसकी पटकथा के हिसाब से फिल्माने में सफलता पाई है। सीमित संसाधनों में बनी इस फिल्म के सहायक कलाकार इसे काफी मजबूती देते हैं। पिता के किरदार में अश्वथ भट्ट अपना असर छोड़ते हैं। कोच गुरनाम के किरदार में गंधर्व दीवान का काम बहुत शानदार है। बाकी दोस्त बने सौरभ पचौरी, दिव्य खरनारे, अहान निर्वाण आदि ने भी अपना काम बढ़िया किया है।
अगस्त्य, इब्राहिम और अबराम से लड़ता आकाश
फिल्म मैं लड़ेगा अपने आप में एक संपूर्ण मनोरंजक पारिवारिक फिल्म है। ओटीटी पर इसका भविष्य बहुत अच्छा है। निर्देशक गौरव राणा के साथ साथ फिल्म के सिनेमैटोग्राफर लकी यादव और संकलक सत्य शर्मा ने भी अपना अपना काम बहुत मुस्तैदी से किया है। फिल्म का संगीत पक्ष कमजोर है। हालांकि फिल्म में मां की ममता वाला एक गाना सोनू निगम ने भी गाया है लेकिन इसके लिए अगर बेहतर गीत और बेहतर संगीत मिल पाया होता तो ये गाना फिल्म का एक और आकर्षण बन सकता था। हां, विल्फ्रेड सोज और नीरज विश्वकर्मा की पार्श्वसंगीत बनाने में मेहनत चमकती है। रोहन मापुस्कर ने फिल्म के सहायक कलाकारों के चयन में प्रभावित किया है। किसी बड़े और नामचीन कलाकार के फिल्म में न होने से फिल्म की रिलीज से पहले ज्यादा चर्चा नहीं हुई है, लेकिन ऐसी फिल्मों का चलना बहुत जरूरी है ताकि अबराम, अगस्त्य और इब्राहिम जैसे स्टार परिवारों के पुत्रों के बीच एक आकाश प्रताप भी देश के छोटे शहरों से आकर हिंदी फिल्म जगत में अपना स्थान बनाता रहे।