इम्तियाज अली की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' आपको याद दिलाती है उस पुराने प्यार की जिसकी तड़प उम्र भर रहती है। जमीनें बंट जाती हैं मगर दिल कभी नहीं बंटा करते। फिल्म में एहसास है, इश्क है, बिछड़ने का गम है और अभिनय के रंग हैं। मगर कहीं-कहीं कहानी ने कैमरे के आगे दम भी तोड़ा। जानिए इस रिव्यू में कैसी है फिल्म 'मैं वापस आऊंगा...'
मैं वापस आऊंगा
- फोटो : सोशल मीडिया
पहली मोहब्बत की अधूरी कहानी
इम्तियाज अली की कहानी हो तो दर्शकों की उम्मीदें फिल्म से कई गुना बढ़ जाती हैं। यह एक लव स्टोरी है जो 78 साल से एक 94 साल के बुजुर्ग कीनू (नसीरुद्दीन शाह) के दिमाग में चल रही है। मगर बंटवारे की त्रासदी के चलते उनकी मोहब्बत अधूरी रह गई। वह अपनी अंतिम यात्रा पर जाने से पहले चाहते हैं कि एक बार उनकी लेडी लव उन्हें अलविदा कहने की इजाजत दे दे।
वो जिससे प्यार करते हैं वह पाकिस्तान में है, जहां जाना उनके लिए लगभग नामुमकिन सा है। अब उनका पोता निरवैर ग्रेवाल (दिलजीत दोसांझ) उनकी उस अधूरी इच्छा को अपना उद्देश्य बना लेता है। इसी वजह से वो पाकिस्तान पहुंच जाता है। अब क्या उसे जिया उर्फ अफसाना (शरवरी) वहां मिलेगी? क्या होगा इस लव स्टोरी का अंत? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा में' शरवरी और वेदांग रैना
- फोटो : X
अभिनय ने बिखेरे कैसे रंग?
युवा कीनू ग्रेवाल के किरदार में वेदांग रैना ने उम्मीद से ज्यादा अच्छा परफॉर्म किया है। वहीं अफसाना के किरदार में शरवरी बहुत खूबसूरत दिखाई दीं। नसीरुद्दीन शाह जो बुजुर्ग कीनू बने हैं उन्हें फिल्म में डायलॉग कम मिले, मगर उनका अभिनय हमेशा की तरह कमाल का था।
दिलजीत दोसांझ को देखकर आपको सुकून महसूस होता है। उनके संवाद भी दिल छू जाते हैं। बाकी किरदारों का भी काम अच्छा है। फिल्म में 'धुरंधर' फेम दानिश पंडोर भी थे जिनका स्क्रीन टाइम कम था। इसके बाद भी वह अपने किरदार से इंसाफ करते नजर आए। मनीष चौधरी और रजत कपूर का अभिनय भी बेहतरीन था।
मैं वापस आऊंगा
- फोटो : यूट्यूब ग्रैब
कहां फीका पड़ा निर्देशन?
यकीनन हर बार बतौर निर्देशक इम्तियाज अली के लिए दर्शकों की उम्मीदों का बोझ उठा पाना आसान नहीं होता होगा। फिल्म के फर्स्ट हाफ में कहानी आपको कम समझ आती है। किरदारों को पनपने में समय लगता है और आपको लगता है कि फिल्म बिखर रही है। शुरुआत के कई सीन आपको किसी उपन्यास से लिए हुए महसूस होते हैं।
लेकिन जैसे ही फिल्म का सेकंड हाफ शुरू होता है। आपको महसूस होता है कि इम्तियाज अली वापस आ गए हैं। दूसरे हाफ में बंटवारे का दर्द, परिवारों का बिखरना, मोहब्बत का बिछड़ना आपको सब कुछ देखने मिलता है। जो आपको रुलाएगा भी और बहुत कुछ महसूस भी कराएगा। इम्तियाज ने सेकंड हाफ में इमोशंस का जो खेल रचा है, वो इस फिल्म की जान है।
क्या रहीं कमियां?
नसीरुद्दीन शाह बीमारी में जिस हिसाब से बोलते हैं वह कहीं-कहीं खीझने पर मजबूर करता है। इसे अगर थोड़ा आसान कर देते तो शायद फर्स्ट हाफ भी बचाया जा सकता था। जिस तरह कहानी को क्रिकेट मैच के जरिए बताया गया है उसकी जरुरत नहीं थी। इसे आराम से बयां करते तो अच्छा रहता।
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' का टीजर रिलीज
- फोटो : यूट्यूब ग्रैब
देखें या नहीं?
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' पुराने दौर और नए दौर को मिलाकर बनाई गई है। अगर पुरानी कहानियां सुनने और देखने के शौकीन हैं तो यह फिल्म आपके लिए है। अगर आपको धीमी कहानियां नहीं पसंद जिनकी परतें सब्र मांगती हैं तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है। फिल्म वन टाइम वॉच से ज्यादा है। किसी तरह की कोई अश्लीलता नहीं है। परिवार के साथ आराम से देख सकते हैं मगर बच्चों को डरा सकती है।