कहां की 'माई'?
मराठी में बहन को ताई, मां को आई कहते हैं। लेकिन, उत्तर भारत में मां को माई कहने ढूंढने पड़ते हैं। यहां वह अम्मा है, मम्मी है, मां है, अम्मी भी है, पर माई कम ही है। नेटफ्लिक्स की नई सीरीज ‘माई’ को पहली ठोकर यहीं लगती है। सीरीज 15 अप्रैल की दोपहर रिलीज हुई है। रिव्यू लिखने के लिए इसके स्क्रीनर भी नेटफ्लिक्स वालों ने शायद चुनिंदा लोगों को ही भेजे। इंटरव्यू भी अब नेटफ्लिक्स की टीम अपनी सीरीज व फिल्मों के सितारों के दरबार लगाकर करवाती है। लेकिन, ओटीटी की मार्केटिंग टीम भारत को अब भी नहीं समझ पाई है। सबसे महंगा सब्सक्रिप्शन और सबसे खराब कंटेंट। और, इस बार ये कारनामा किया है कर्णेश शर्मा ने जिनकी पिछली डिजिटल रिलीज ‘पाताललोक’ फिल्म ‘बुलबुल’ की तारीफें खूब हुई थीं।
साक्षी तंवर के प्रशंसक निराश
वेब सीरीज ‘माई’ में कर्णेश शर्मा अपने और सुदीप शर्मा दोनों के नाम पर बट्टा लगा बैठे हैं। छह एपीसोड की इस वेब सीरीज को देखना आसान नहीं है। शायद ही नेटफ्लिक्स का कोई ऐसा ग्राहक हो जो साक्षी तंवर की इस सीरीज को देखना ना चाहता हो। साक्षी तंवर का नाम हिंदी दर्शकों की तरंग से जुड़ा है। ‘कहानी घर घर की’ से लेकर ‘दंगल’ और ‘मोहल्ला अस्सी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी उम्र के हिसाब से दमदार रोल चुने और किए भी। लघु फिल्म ‘घर की मुर्गी’ में उनका दम दर्शकों ने खूब देखा है। लेकिन मनोरंजन के बदलते माध्यम ओटीटी पर उनका काबिलियत को सही तरीके से पेश करने वाले निर्देशक अब तक उन्हें मिले नहीं हैं। साक्षी का काम जानदार है। कहानी कमजोर है। उनके अलावा अनंत विधात और वैभव राज गुप्ता भी इस सीरीज में अपनी अदाकारी का असर छोड़ते हैं। लेकिन, प्रशांत नारायणन, वामिका गब्बी और राइमा सेन की अदाकारी बहुत औसत है।
अभिनय में लगाया दम
‘द फाइनल कॉल’ और ‘मिशन ओवर मार्स’ जैसी सीरीज के बाद वेब सीरीज ‘माई’ की साक्षी तंवर लीड कलाकार हैं। वह बहुत कुछ कर रही है। जेठ जेठानी का घर देखती है। वृद्धाश्रम के बुजुर्गों की सेहत देखती है। दवाई की दुकान चलाने वाले अपने पति के मनोभाव देखती है। बस पता नहीं कैसे अपनी बिटिया से उनका ‘कनेक्ट’ टूट जाता है। हर समय कुछ न कुछ उसके मन, मस्तिष्क में घुमड़ता रहता है और इस हैरान परेशान औरत के किरदार में साक्षी ने मेहनत भी खूब की है। बस उनके जासूस बनने, फिर बिना हिचक के अपराध पर अपराध करते जाने का मामला हजम नहीं होता। कहानी लखनऊ में चल रही है और वहां ये सब इतना ‘मक्खन’ नहीं है।
देखें कि न देखें?
वेब सीरीज ‘माई’ की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी इसकी सुस्त पटकथा, कमजोर कहानी और किरदारों का बहुत ही सतही चरित्र चित्रण है। इतने सारे किरदार लेकर निर्देशकों और लेखकों की टीम ने अपने ऊपर बोझ भी बहुत सारा लाद लिया है। लेकिन, न तो ये सीरीज लिखी ढंग से गई है और न ही निर्देशित ढंग से की गई है। नेटफ्लिक्स को अगर समावेशी मनोरंजन सामग्री बनाने का चस्का लगा ही है तो फिर उसे समलैंगिक किरदारों में समलैंगिक अभिनेता, ना सुन पाने वाले किरदारों में वैसी ही कलाकार और लिंग पहचान से जूझने वाले चरित्रों में इस चुनौती को जीत चुके एक्टर लेकर भी एक उदाहरण पेश करना चाहिए। विकासशील ओटीटी होने का नेटफ्लिक्स का ढिंढोरा अब काम नहीं आ रहा है। इसके इस ढोल ताशे में आवाज बहुत है लेकिन जीवन का संगीत नहीं है। सीरीज को अगर नहीं भी देखेंगे तो पछताएंगे नहीं।