130 करोड़ से भी ज्यादा की आबादी वाले देश भारत में हर रोज 174 बच्चे गायब हो जाते हैं। यानी कि हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जा रहा है। उसका क्या हुआ, क्यों वह लापता हुआ, अधिकतर मामलों में पता ही नहीं चलता। सरकारी आंकड़े ये भी बताते हैं कि अकेले मुंबई में हर रोज 30 से 40 लोग यूं लापता हो जाते हैं। और, बात पूरब की मायानगरी कोलकाता की करें तो वहां भी हर महीने पांच- छह सौ लोग गायब हो ही जाते हैं। किसी के लापता हो जाने के पीछे की कहानी में पुलिस को सबसे कम दिलचस्पी होती है, लेकिन अगर लापता हुए शख्स के करीबी उसकी तलाश में पुलिस के पास पहुंच जाएं तो मामला कभी संगीन तो कभी रंगीन भी हो जाता है। बशर्ते लापता होने वाले शख्स की गर्लफ्रेंड में किसी पहुंचे हुए नेता की दिलचस्पी हो। और, इस लापता शख्स की तलाश में कोई खोजी पत्रकार लग जाए।
लॉस्ट वेब सीरीज
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘पिंक’ के निर्देशक की नई कोशिश
कोई दो घंटे 10 मिनट की फिल्म ‘लॉस्ट’ उन निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी की फिल्म है जिन्होंने साल 2016 में फिल्म ‘पिंक’ के जरिये हिंदी सिनेमा में खूब वाहवाही लूटी थी। इसके पहले वह चार पांच चर्चित फिल्में बांग्ला में बना चुके थे। फिल्म ‘लॉस्ट’ अनिरुद्ध की अपनी सी कहानी लगती है। बंगाली सिनेमा से हिंदी सिनेमा में आने वाले निर्देशकों में एक किस्म की धूनी सी रमाए रहने की प्रवृत्ति दिखती है। इनमें से ज्यादातर को ‘भद्रलोक’ का सिनेमा हिंदी में बनाना होता है। सत्यजीत रे सा आभामंडल वह अपने चेहरे के पीछे शायद खुद ही महसूस करने लगते हैं या फिर दादा, दादा बोलकर फिल्म के बाकी तकनीशियन और कलाकार बना देते हैं। बस, इसी आभामंडल में खोई फिल्म है ‘लॉस्ट’। फिल्म इसलिए भी खोई खोई रहती है क्योंकि इसके संवाद लेखक रितेश शाह ने इसकी पटकथा के भावों और इसके किरदारों की भावनाओं को बस किसी भी दूसरी फिल्म के एहसास और चरित्र समझ लिया है। वह इन किरदारों से दो पंक्तियां हिंदी में बुलवाते हैं और फिर एकाएक उन्हें याद आता है कि अरे, फिल्म तो कोलकाता की पृष्ठभूमि में है तो वह वह एक लाइन हर संवाद में बांग्ला की भी चिपका देते हैं। ऐसे कौन बात करता होगा भला कोलकाता में? कभी देखा है कि भारतीय भाषाओं में बातचीत करते किसी इंसान को जो पहले दो लाइन हिंदी में बोले, फिर एक लाइन अपनी मातृभाषा में। और, ऐसा कोई एक किरदार नहीं करता, ये सारे किरदारों का पैटर्न सा बना दिया रितेश शाह ने और फिल्म का पहला रंग यहीं से उड़ जाता है।
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खोई खोई सी कहानी ‘लॉस्ट’
खोए खोए संवादों के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करती फिल्म ‘लॉस्ट’ की कहानी भी खोई खोई दिखती है। श्यामल सेनगुप्ता की पटकथा खोई खोई है। पता नहीं चलता कि ये एक गुमशुदा इंसान की कहानी पर काम करने वाली खोजी पत्रकार के रास्ते में आने वाली बाधाओं के बारे में बात कहना चाहती है, एक न्यूज चैनल की एंकर के एक नेता की ‘अनुकंपाओं’ के सहारे ‘सफल’ होने की तरफ इशारा करना चाहती है या फिर ये बताना चाहती है पुलिस की उस ‘कूट’ रचनाओं के बारे में जिसमें शिकायतकर्ता या उसके करीबी ही अब अपराधी मान लिए जाते हैं। ये सच है कि हमारे आसपास की दुनिया कहां खोई है, हमें पता ही नहीं होता। पता ही नहीं होता कि पुलिस तक मामला जाएगा तो उसके ऊंट किस करवट बैठेंगे। और, ये मसला किसी एक राज्य का नहीं है। इस फिल्म को देखने के दौरान ऐसा एक निजी अनुभव मेरा भी हुआ जिसमें अवैध निर्माण पर आपत्ति करने वाले एक सुरक्षा कर्मचारी को ही उत्तर प्रदेश पुलिस उठा ले गई और अवैध निर्माण करने वाले की थाने में आवभगत चलती रही। सब कुछ खोया खोया सा है जमाने में भी और इस फिल्म में भी।
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फिल्म की अधपकी अंतर्धारा
निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी भी फिल्म ‘लॉस्ट’ के अधिकतर दृश्यों में खोए खोए ही रहते हैं। घर से कुछ और पहनकर निकली महिला रिपोर्टर रास्ते तक आते ही कुछ और पहने दिखती है। एक रिटायर्ड प्रोफेसर की नातिन अपने मां बाप की बजाय अपने नाना के पास रहती है। मां-बाप से वह कुछ लेती नहीं है और कपड़े वह इतनी रफ्तार से बदलती है कि कोलकाता की सड़कों पर छोटी मोटी फैशन परेड इस फिल्म के जरिये दर्शक देख सकते हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी भी खोई खोई है। अविक मुखोपाध्याय ने प्रकाश और छाया के संयोजन से फिल्म में कौतूहल रचने की कोशिश तो की है लेकिन ये फिल्म के लिए जरूरी अंतर्धारा के अदहन से बुदबुदाते रहने जैसा ताप बना नहीं पाती। लाइटिंग फिल्म की अगर बड़ी कमजोरी है तो कैमरे का किरदारों के भावों को सही से पकड़ने से चूक जाना भी ‘लॉस्ट’ की कमजोर कड़ी है। कलाकारों का मेकअप साफ पकड़ में आता है खासतौर से सारे महिला किरदारों का। गीत संगीत से भी फिल्म को कोई मदद नहीं मिलती है।
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सिनेमाघरों तक इसलिए नहीं पहुंची
फिल्म ‘लॉस्ट’ का बनाने का उद्देश्य अच्छा है। इक्कीसवीं सदी के 23वें साल में कोलकाता जैसे शहर में महिलाओं के सशक्तीकरण की वास्तविक स्थिति दर्शाती ये फिल्म समसामयिक विषयों को भी साथ समेटती चलती है। राजनीति में टिकट बंटवारे से लेकर एक न्यूज पोर्टल की आर्थिक, सामाजिक और व्यावसायिक ‘मजबूरियों’ की भी ये बात करती है। बात बड़ी है लेकिन फिल्म का संपादक इसे एक लाइन में निपटाकर आगे बढ़ जाता है। किसी रिपोर्टर का दिन रात लगकर किसी खबर पर काम करना और फिर उसे दफ्तर में ये सुनने को मिलना कि उसे प्रकाशित करने की दिक्कतें क्या क्या हो सकती हैं, ये एक कारोबार को भीतर तक समझने की अलग अंतर्धारा है और सिर्फ यही एक धागा इस पूरे तानेबाने को मजबूती दे सकता था। अनिरुद्ध रॉय चौधरी की इस फिल्म को बीते साल अक्टूबर में सेंसर सर्टिफिकेट मिल गया था, रिलीज ये अब जाकर हो पाई है और वह भी ओटीटी पर, इस एक तथ्य से समझ आता है कि हिंदी सिनेमा के कारोबारियों में अब भी मजबूत होने की चाह रखने वाली एक महिला की कहानी सिनेमाघरों तक पहुंचा पाने की इच्छाशक्ति पनपी नहीं है।
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यामी गौतम ने गंवा दिया बेहतरीन मौका
यामी गौतम ने अपनी समकालीन दूसरी कई अभिनेत्रियों की तरह ही फिल्म ‘लॉस्ट’ में पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाने की कोशिश की है। किरदार भी उन्होंने ठीक ही चुना लेकिन एक खोजी क्राइम रिपोर्टर की रंगत वह परदे पर पेश कर पाने में पूरी तरह विफल रहीं। उनके चेहरे के भाव परिस्थिति के हिसाब से बदलते नहीं हैं। तेजाब के संभावित हमले की आशंका का डर उनके चेहरे पर उभरता नहीं है तो वह उसे काले चश्मे और दुपट्टे से जताने की कोशिश करती हैं। नाना के साथ उनके संवाद बहुत ‘नकली’ लगते हैं और खोजबीन के दौरान जो एक संवेग क्राइम रिपोर्टर की दैहिक भाषा में होता है, उसे पाने में भी वह विफल रहीं। बहुत बाद में जाकर उनके इस किरदार की दूसरी परतें खुलती हैं। उनका अपने माता पिता से संवाद और लापता लड़के की बहन के साथ उनकी बातचीत उन्हें इस किरदार की एकरसता तोड़ने का मौका भी देती है, लेकिन वह यहां भी कुछ खास कर नहीं पाती हैं।
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पंकज कपूर रहे अव्वल नंबर
फिल्म ‘लॉस्ट’ के दूसरे कलाकारों में पंकज कपूर ने इस फिल्म को देखने का बहाना आखिर तक बनाए रखा। सिर्फ उनके किरदार को देखने के लिए भी ये फिल्म एक बार देखी जा सकती है। सुनसान पार्क में धमकाने आए दो युवाओं से जिस तरह उनका किरदार निपटता है, उस एक दृश्य में पंकज कपूर के अभिनय का सारा रस दर्शकों को मिल जाता है। पंकज कपूर हिंदी सिनेमा के वह नगीने हैं जिनके लिए सही नाप की अंगूठियां ही नहीं बन रही हैं। फिल्म में पिया बाजपेयी ने भी काबिले तारीफ काम किया है। फिल्म की मुख्य किरदार से अधिक मौका पिया बाजपेयी को अभिनय में अपना दमखम दिखाने का दिया है और पिया इसे पूरी तरह से भुनाती भी हैं। कुछ दृश्यों को देखकर तो ये भी लगता है कि अगर फिल्म का लीड किरदार पिया को मिलता तो शायद फिल्म देखने का आनंद बेहतर होता। राहुल खन्ना ने एक तिकड़मी राजनीतिज्ञ का किरदार अच्छे से निभाया है। वह अच्छे कलाकार हैं और उन्हें दर्शक लगातार देखना चाहते भी हैं। बस, कहानी खोई खोई सी नहीं होनी चाहिए।