चुनौती से कम नहीं ‘क्रेवेन द हंटर’
इन दिनों ये अक्सर होता है कि नई फिल्म देखने का भी उत्साह नहीं होता। जमाना हो गए कोई ऐसी धमाकेदार फिल्म देखे जिसे देखते समय रिक्लाइनर को आगे पीछे करने की तरफ ध्यान ही न जाए। सीट के कोने से चिपककर देखी गई आखिरी फिल्में याद करें तो मुझे तो जेम्स बॉन्ड सीरीज की फिल्मों से डैनियल क्रेग की विदाई वाली फिल्म ‘नो टाइम टू डाय’ याद आती है या फिर उसी साल आई स्पाइडर मैन सीरीज की फिल्म ‘स्पाइडरमैन: नो वे होम’। ‘ड्यून’ सीरीज की फिल्में या ‘ओपनहाइमर’ की अपनी अलग जगहें हैं लेकिन विशुद्ध मसाला हॉलीवुड फिल्में देखने का आखिरी मजा जेम्स बॉन्ड और स्पाइडरमैन की इन फिल्मों में ही आया। ‘मिशन इंपॉसिबल: डेड रिकनिंग’ का मजा भी आधा अधूरा ही रहा। ऐसे में ‘क्रेवेन द हंटर’ जैसी फिल्म देखना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है।
Morbius Review: नोबल ठुकराने वाले वैज्ञानिक की डरा देने वाली कहानी, ये है बॉक्स ऑफिस का रौद्रम् रणम् रुधिरम्
सोनी स्पाइडरमैन यूनिवर्स को विदा करो
सोनी पिक्चर्स ने स्पाइडरमैन की अपनी सीरीज भले मार्वल स्टूडियोज की मदद लेकर सुधार ली लेकिन उसका अलग कहानियों व किरदारों के खेत में उगा सोनी स्पाइडरमैन यूनिवर्स किसी सिरे नहीं पहुंच सका। ‘वेनम’ सीरीज बीते साल अपनी आखिरी फिल्म के साथ अंजाम तक पहुंच चुकी है। ‘क्रेवेन द हंटर’ इस यूनिवर्स की आखिरी फिल्म हो, यही इस फ्रेंचाइजी के दर्शक दुआ कर सकते हैं। कहानी यहां बिल्कुल फिल्मी है। खुद पर इतराने वाले बाप निकोलाई के जीवन दर्शन को न मानने वाला बेटा सर्गेई शिकार के दौरान हुए एक हादसे के चलते सबसे अलग हो जाता है। और, इसके बाद कहानी सीधे मौजूदा समय में आती है। सर्गेई अब क्रेवेन के नाम से जाना जाता है। उसे अपने पिता के पागलपन से अपने भाई को बचाना है। फिल्म क्या है, क्यों है और जो है, वैसी ही क्यों है, ये सब जानने के लिए दर्शकों को दो घंटे की उबाऊ फिल्म देखनी होती है क्योंकि इसके लेखकों ने सारा रहस्य क्लाइमेक्स में छुपा रखा है।
पटकथा के स्तर पर मात खा गई फिल्म
‘इक्वलाइजर’ से मशहूर हुए लेखक रिचर्ड वेंक और आर्ट मार्कम व मैट होलोवे की लिखी फिल्म ‘क्रेवेन द हंटर’ अपनी पटकथा से सबसे ज्यादा मात खाती है। फिल्म का पूरा सेटअप ऐसा है जैसे कि ये कुछ अलग ही दिशा में जाने की कोशिश कर रही है। फिल्म का ना तो कोई सिरा मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स से जुड़ता है और सोनी स्पाइडरमैन यूनिवर्स से जबतक ये आकर जुड़ती है, दर्शकों का मजा खराब हो चुका होता है। तकनीकी रूप से भी ये फिल्म एमसीयू की दूसरी फिल्मों के मुकाबले बेहद कमजोर है। फिल्म की डबिंग बहुत खराब है। और, इसके विजुअल स्पेशल इफेक्ट्स ऐसा लगता है जैसे कि किसी ग्राफिक्स स्कूल से आए इंटर्न ने तैयार कर दिए हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और इसकी साउंड डिजाइन फिल्म के वातावरण के हिसाब से होती तो भी फिल्म असरदार हो सकती थी।
ऑरोन के कंधों पर टिकी फिल्म
अभिनय के मामले में फिल्म ‘क्रेवेन द हंटर’ सिर्फ और सिर्फ ऑरोन टेलर-जॉनसन की फिल्म है। उनकी देहयष्टि का प्रदर्शन युवाओं को उनके जैसी देहयष्टि पाने के लिए प्रेरणा देता दिखता है, लेकिन ये काम तो उनका एक आदमकद पोस्टर भी कर सकता है, फिल्म में वह क्या कर रहे हैं, ये देखना फिल्म के निर्देशक जे सी चंडोर के लिए जरूरी था। फिल्म में निर्देशकीय दृष्टि का पूरी तरह अभाव है। रसेल क्रो और अरियाना डि बोस जैसी ऑस्कर विजेता अभिनेत्री को उनके दमखम के अनुसार किरदार नहीं मिले। अरियाना इस फिल्में हैं ही क्यों, उनके प्रशंसक ये सवाल भी पूछते दिखते हैं। राइनो और फॉरेनर के किरदारों में अलेसेंड्रो निवोलो और क्रिस्टोफर एबट का अभिनय भी साधारण है। भारत में हॉलीवुड फिल्मों के शौकीनों के लिए साल का ये आगाज अच्छा नहीं है, हालांकि ये फिल्म बीते साल की है। भारत में अमेरिका के साथ इसलिए नहीं रिलीज हो सकी क्योंकि उस समय यहां पूरे देश में एक ही धुन गूंज रही थी, ‘पुष्पा, पुष्पा, पुष्पा, पुष्पा, पुष्पा पुष्पा पुष्पराज’!
संबंधित वीडियो