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Killer Soup Review: अभिषेक और मनोज के संगम में कोंकणा की ‘काली’ त्रिवेणी, ‘इट इज ए टेल टोल्ड बाय एन इडियट’

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'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला
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Movie Review
किलर सूप (वेब सीरीज)
कलाकार
मनोज बाजपेयी , कोंकणा सेनशर्मा , सयाजी शिंदे , नासर , कनि कुश्रुति और अनुला नावलेकर आदि
लेखक
अभिषेक चौबे , अनंत त्रिपाठी , उनैजा मर्चेंट और हर्षद नलवडे
निर्देशक
अभिषेक चौबे
निर्माता
चेतना कौशिक और हनी त्रेहान
ओटीटी:
नेटफ्लिक्स
रिलीज:
11 जनवरी 2024
रेटिंग
2/5

चौबे, बाजपेयी, शर्मा जैसे दिग्गज मिलकर जब एक साउथ इंडियन व्यंजन पाया सूप बनाएं और उसके लिए इस्तेमाल मुर्गी की टांग हो तो बनता है ‘किलर सूप’। इसका असल मसाला क्या है ये तो दर्शकों को सीरीज के आखिरी एपीसोड में पता चलता है लेकिन आठ एपिसोड की ये सीरीज जिस अंदाज में धीमी आंच पर पकती रहती है, वह अभिषेक चौबे के सिनेमा का खास लक्षण बनता जा रहा है। अभिषेक चौबे ने सिनेमा को लेकर गजब की पढ़ाई की है। उन्हें इसके बिम्ब-प्रतिबिम्ब, मानक और मनौव्वल सब इतने याद हो चुके हैं कि ये अब उनकी कहानियों को कैमरे की नजर से देखने पर हर फ्रेम में नजर आते हैं। वैसे, उत्तर भारत का पाया सूप जिस तरीके से बनता है, उसकी जानकारी रखने वालों को इस ‘किलर सूप’ को लेकर कई सवाल हो सकते। हैं, लेकिन अभिषेक चौबे का सिनेमा भी किसी सवाल से कम रहा है क्या?

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'किलर सूप' - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अयोध्या के चौबे की अतरंगी सीरीज
श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या में जन्मे अभिषेक चौबे ने नेटफ्लिक्स के लिए इसके पहले फिल्मावली ‘रे’ की एक कहानी मनोज बाजपेयी और गजराज राव वाली बनाई थी। इस बार कहानी चार लोगों ने मिलकर लिखी है। एक बड़ी हो चुकी बिटिया है जो अपने पिता को उसके मुंह पर गाली देती है। चचेरे भाई को सिगरेट पिलाती है और उसके होठों पर चुंबन भी धरती है। उसका पिता कौन है, इसका खुलासा तो नहीं होता लेकिन इशारा जरूर होता है। एक पिता है जो बात बात पर गालियां देता है। अनुज वधू से वह खासतौर से नाराज रहता है और ये अनुज जिस मसाज सेंटर मे जाता है वहां का मालिश करने वाला ही एक दिन छोटा भाई बनकर इस घर में रहने आ जाता है। मामला एक कत्ल से शुरू होता है और फिर लोग मरते जाते हैं, कहानी आगे बढ़ती जाती है। दर्शक सीरीज देखते रहते हैं। क्यों देख रहे हैं, वजह सिर्फ मनोज बाजपेयी बने रहते हैं।

'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फुल ऑफ साउंड्स एंड फ्यूरी, सिग्नीफाइंग नथिंग
वेब सीरीज ‘किलर सूप’ ओटीटी नेटफ्लिक्स की इस साल की पहली देसी बानगी है। सीरीज इस मायने में भी कुछ ‘अलग’ है कि इसके शेट्टी नाम वाले किरदार मराठी बोलते हैं। घटनाएं सारी दक्षिण के किसी शहर में होती हैं तो वहां के पुलिस वाले सारे अपनी मातृभाषा में बातें करते हैं। कहानी के दूसरे किरदारों से वे टूटी फूटी हिंदी में बोलते हैं। अच्छा प्रयोग है सिनेमा का कि किरदार जिस पृष्ठभूमि के हैं, वहीं की भाषा बोलें। लेकिन, अभिषेक चौबे की ये सीरीज इसके आखिरी संवाद जैसी है। इस दृश्य में छत पर बैठा एक पुलिसवाले का भूत कहता है, ‘इट इज ए टेल टोल्ड बाय एन इडियट, फुल ऑफ साउंड्स एंड फ्यूरी, सिग्नीफाइंग नथिंग’ (‘ये एक कहानी है जिसे एक बेवकूफ इंसान कह रहा है, शोर और गुस्से से भरपूर, लेकिन जिसका मतलब कुछ नहीं है।’) अभिषेक की निर्देशकीय कला इस सीरीज में किसी खूब सीखे हुए निर्देशक जैसी है। कहानी को रुचिकर बनाने की बजाय सीरीज में अभिषेक अपने निर्देशन का उत्कर्ष दिखाना चाहते हैं और इस चढ़ाई को चढ़ने में उनसे मनोरंजन कहीं पीछे छूटता जाता है।

'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मनोज बाजपेयी ने किया निराश
मनोज बाजपेयी की ये साल की पहली प्रस्तुति है। सीरीज में वह डबल रोल में हैं, प्रभाकर शेट्टी और उमेश महतो के किरदार में। असल प्रभाकर शेट्टी कहानी में कुछ देर के लिए है। फिर कहानी की ‘मनीषा कोइराला’ उसकी जगह अपने प्रेमी उमेश महतो को ले आती है। पुलिस को आखिरी एपीसोड तक जाकर ये गुत्थी समझ आ जाती है, लेकिन इस दरम्यान जो कुछ होता रहता है, उससे खुद को जोड़े रखना एक सामान्य दर्शक के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। मनोज बाजपेयी का किरदार यहां किसी नायक का होने की बजाय एक ऐसे पीड़ित का है जिसके दोनों किरदार हालात के हाथों पिट रहे हैं। ‘सोनचिड़िया’ की गलती यहां मनोज ने फिर दोहराई है, उन्होंने एक ऐसा किरदार करने को हामी भरी है जो कहानी में कुछ खास कर नहीं रहा। नतीजा अच्छा नहीं है क्योंकि दर्शक सीरीज देखता है मनोज बाजपेयी के लिए और सीरीज उनकी अभिनय क्षमता को पूरी तरह दिखाने में नाकाम रहती है। जिस किरदार का नाम सरनेम महतो है वह स्वाति के लिए प्रेम पत्रों में जो भाषा प्रयोग करता है, उससे तो लगता यही है कि वह कभी गोपाल दास नीरज या हरिवंश राय बच्चन जैसे कवियों की मालिश करता रहा होगा!
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'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी की केंद्रबिंदु कोंकणा सेन शर्मा
‘किलर सूप’ में कोंकणा सेन शर्मा का किरदार कहानी का केंद्र बिंदु है। अस्पताल में नर्स का काम करते करते कैसे स्वाति शेट्टी एक कारोबारी घराने में पहले खुद पैठ बनाती है और फिर अपने पुराने प्रेमी को भी ले आती है, ये तथ्य सीरीज में दिखाया जाता तो उनका किरदार थोड़ा और रोचक बनता। वह अपनी भतीजी से मिलकर साजिशें रचती है। बेटे को सारे घटनाक्रम से दूर धकेलती रही है। कहानी में होने वाली मौतों का वह कारक है, लेकिन उपसंहार में आकर वह अपना सब कुछ खोने के करीब होती है। स्वाति और उमेश के प्रेम प्रकटन का जरिया है फिल्म ‘बॉम्बे’ का गाना ‘तू ही रे’। वही कहानी की ‘मनीषा कोइराला’ भी हैं। स्वाति और ‘मनीषा कोइराला’ एक ही हैं, ये साबित करना ही वेब सीरीज ‘किलर सूप’ के सस्पेंस का आधार है। लेकिन, जिन कहानियों में किरदारों की असलियत पहले से पता होती है और इस असलियत को उजागर करने में कहानी के दूसरे किरदार कैसे सफल होते हैं, इसे देखना तब बहुत उबाऊ होता जाता है, जब पटकथा बहुत ही बिखरी बिखरी सी हो। कोंकणा सेन शर्मा ने अपनी तरफ से इस किरदार को जमाने में बहुत मेहनत की है लेकिन उनका ये अभिनय भी सीरीज को सहारा दे नहीं पाता।

'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बेकार गई कनुश्रुति, अनुला और नासर की मेहनत
डबल रोल वाली कहानियों के साथ दिक्कत ये होती है कि अगर दोनों किरदार बिल्कुल दिन और रात की तरह अलग अलग न हों, तो इन्हें जानने वाले किरदार विदूषक दिखने लगते हैं। सयाजी शिंदे के किरदार के साथ यहां ऐसा ही होता है। केवल वयस्कों के लिए बनी सीरीज ‘किलर सूप’ में खून के रिश्तों के बीच के अनैतिक संबंधों की तरफ भी दो बार इशारा है। अंग्रेजी में जिसे ‘इनसेस्ट’ कहते हैं, वह इस कहानी की विद्रूपता को बढ़ाने में मदद कर भी सकता था, लेकिन जिस तरह से ये कहानी में गूंथा गया है वह दर्शकों को कहानी से जोड़ने की बजाय इससे घिन करने की तरफ ले जाता है। हां, शेट्टी परिवार की बड़ी वारिस अप्पू के किरदार में अनुला नावलेकर ने गौर करने लायक अभिनय किया है। अपना करियर बनाने के लिए पेरिस जाने के लिए बेताब एक बेटी की बेचैनी को उन्होंने परदे पर दमदार तरीके से पेश किया है। अप्पू के मामा बने लाल का किरदार भी रोचक हो सकता था लेकिन उनका भाव प्रकटन ऐसे किरदारों के टैम्पलेट से बाहर आने को बस छटपटाता ही रह जाता है। नासर ने एक ऐसे परेशान पुलिस अफसर का किरदार अच्छे से निभाता है जिसकी काबिलियत पर उसका सीनियर ही शक करता रहता है। सीरीज में एक और कलाकार अपने अभिनय की छाप छोड़ने में सफल रहा है और वह हैं कनि कुश्रुति। प्रभाकर शेट्टी के साथ परावैवाहिक रिश्तों में उलझी कीर्तिमा का ये किरदार मोहक भी है और मादक भी। लगता रहता है कि ये किरदार कुछ तो गुल आगे चलकर खिलाएगा लेकिन जब इस किरदार के दैदीप्मान होने के बारी आती है, एक हादसा सारे तनाव को फुस्स कर देता है।
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'किलर सूप' वेब सीरीज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
भारतीय संवेदनाओं से परे नेटफ्लिक्स की सीरीज
नेटफ्लिक्स की अधिकतर वेब सीरीज में एक दिक्कत शुरू से रही है और वह है इनका भारतीय संवेदनाओं से दूर बने रहना। मुंबई की आबोहवा में घुली बदबू में लिपटी इन वेब सीरीज की कहानियों को कुछ देशी खुशबुओं की जरूरत है। शायद देश की मिट्टी से जुड़ा कोई शख्स इनकी क्रिएटिव टीम में अब तक नहीं है। वेब सीरीज ‘किलर सूप’ के अधिकतर दृश्य रात के हैं और जो घटनाएं दिन में भी घटित हो रही होती हैं, उन्हें सीरीज के सिनेमैटोग्राफर अनुज धवन ऐसी रोशनी में फिल्माते हैं कि दर्शकों की ऊर्जा और उत्साह दोनों कहानी के आगे बढ़ने के साथ निचुड़ता रहता है। ये दर्शकों को थकाते हुए चलती है और स्याह कहानियों का ये मौलिक गुण भी होता है, लेकिन अगर ये कहानी सिर्फ दो घंटे की फिल्म में बनी होती तो इसका असर कुछ और होता। संयुक्ता कजा के संपादन का दोष यहां इसलिए ज्यादा नहीं दिया जा सकता क्योंकि अभिषेक चौबे की कल्पनाएं एडिटिंग की कलात्मकता की मोहताज नहीं होतीं। वह ‘ज्ञानी’ फिल्मकार हैं और किसी भी तरह के सिनेमा में जब फिल्मकार का लक्ष्य दर्शकों का मनोरंजन करने की बजाय अपने कौशल की नुमाइश करने पर होता है तो नतीजा ‘किलर सूप’ ही होता है।
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