ओटीटी पर हर दूसरे हफ्ते एक नई क्राइम-थ्रिलर आ जाती है। गांव, पॉलिटिक्स, भ्रष्ट सिस्टम, ऑनर किलिंग और पुलिस जांच, ओटीटी पर ये सब अब इतना दिखाया जा चुका है कि कहानियां कई बार एक जैसी लगने लगती हैं। ऑडियंस पहले 15 मिनट में ही समझ जाती है कि फिल्म सच में कुछ कहना चाहती है या सिर्फ डार्क दिखने की कोशिश कर रही है। 'कर्तव्य' भी इसी रास्ते पर चलती है, लेकिन फर्क ये है कि यहां सैफ अली खान हैं। वही इस फिल्म को बार-बार गिरने से बचा लेते हैं।
कहानी
फिल्म की कहानी हरियाणा के काल्पनिक कस्बे झामली के पुलिस अफसर पवन मलिक (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक पत्रकार के मर्डर केस की जांच कर रहा है। पवन ऐसा इंसान है जो ड्यूटी, परिवार और सिस्टम के बीच बुरी तरह फंसा हुआ है।
मामला धीरे-धीरे पॉलिटिक्स, धार्मिक ताकत और गांव की गंदी सच्चाइयों तक पहुंचता है। इसी बीच उसके अपने घर में भी बड़ा संकट खड़ा हो जाता है। उसका छोटा भाई प्रेम विवाह कर भाग जाता है। मामला जाति और इज्जत की लड़ाई में बदल जाता है।
फिल्म दो अलग ट्रैक पर चलती है - एक पुलिस जांच और दूसरा पारिवारिक संघर्ष। अच्छी बात ये है कि दोनों कहानियां शुरुआत में मजबूरी से जोड़ी हुई नहीं लगतीं। आनंद श्री के आश्रम वाला ट्रैक डिस्टर्बिंग भी लगता है और आज के माहौल में रिलेवेंट भी।
लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है, जब फिल्म हर थोड़ी देर में ऑडियंस को चौंकाने की कोशिश करने लगती है। कुछ ट्विस्ट असर छोड़ते हैं, लेकिन कुछ ऐसे लगते हैं जैसे सिर्फ कहानी को रियलिस्टिक दिखाने के लिए डाले गए हों। इंटरवल के बाद स्क्रीनप्ले थोड़ा बिखर जाता है। फिल्म अपनी इमोशनल पकड़ भी कमजोर करने लगती है।
एक्टिंग
सैफ अली खान फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। सैफ जब भी अपनी शहरी नवाबी इमेज छोड़कर देसी किरदारों में उतरते हैं, स्क्रीन पर अलग ही असर छोड़ते हैं। उन्होंने पवन मलिक को सिर्फ फिल्मी पुलिसवाला नहीं, बल्कि दबाव में टूटा हुआ इंसान बनाया है। कई सीन में वह बिना बोले असर छोड़ते हैं। हरियाणवी टोन भी काफी नेचुरल लगती है। हालांकि, सेकेंड हाफ में उनका वही गुस्से वाला अंदाज थोड़ा रिपीट होने लगता है।
रसिका दुग्गल अच्छी लगी हैं, लेकिन फिल्म उनके टैलेंट का पूरा इस्तेमाल नहीं करती। वह हर सीन में बहुत कम्फर्टेबल लगती हैं। हालांकि, उनका किरदार सिर्फ सपोर्ट सिस्टम बनकर रह जाता है। उनके हिस्से में ऐसा कोई बड़ा सीन नहीं आता जो लंबे समय तक याद रहे। संजय मिश्रा हमेशा की तरह छोटे रोल में भी ध्यान खींच लेते हैं। मनिष चौधरी भी अपने सख्त और घमंडी अफसर वाले रोल में फिट बैठते हैं।
जाकिर हुसैन फिल्म में कमाल का तनाव लाते हैं। उनका किरदार आपको पसंद नहीं आएगा, लेकिन यही उनकी एक्टिंग की जीत है। युधवीर अहलावत सबसे बड़ा सरप्राइज बनकर सामने आते हैं। कम उम्र में भी उन्होंने डर और दबाव में फंसे लड़के की बेचैनी बहुत ईमानदारी से दिखाई है। उनके इमोशनल सीन सीधे असर करते हैं।
फिल्म के पास इतने अच्छे एक्टर्स हैं, लेकिन राइटिंग हर किसी को पूरा मौका नहीं देती। आखिर में पूरा बोझ सैफ अली खान पर आ जाता है। और वह काफी हद तक फिल्म को संभाल भी लेते हैं।
डायरेक्शन
डायरेक्टर पुलकित की पिछली फिल्म 'भक्षक' ज्यादा फोकस्ड और असरदार थी। ‘कर्तव्य’ उसी दुनिया की दूसरी कहानी जैसी लगती है। यहां भी सिस्टम के अंदर फैला भ्रष्टाचार, बच्चों के शोषण और सत्ता के गलत इस्तेमाल जैसे मुद्दे हैं।
फिल्म का माहौल शानदार बनाया है। धूल भरे गांव, पॉलिटिकल प्रेशर और हर वक्त मंडराता खतरा स्क्रीन पर महसूस होता है। कैमरा वर्क कई जगह कहानी से ज्यादा असर छोड़ता है। बैकग्राउंड म्यूजिक भी तनाव बनाए रखता है।
लेकिन फिल्म खुद को जरूरत से ज्यादा गंभीर बनाने की कोशिश करती है। कई सीन अच्छे होने के बावजूद खिंचे हुए लगते हैं। क्लाइमैक्स भी जितना जोरदार होना चाहिए था, उतना असर नहीं छोड़ पाता। इतने सारे मुद्दे उठाने के बाद भी फिल्म हर बात को बराबर मजबूती से नहीं पकड़ पाती।