सत्यमेव जयते ऐसी हिंसा से भरी फिल्म है जिसका आप समर्थन नहीं कर सकते। कथित हीरो (जॉन अब्राहम) हर कथित मुजरिम को माचिस की तीलियां सुलगाते हुए जिंदा आग के हवाले कर रहा है। वजह है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगने पर उसके पिता ने खुद पर कैरोसिन डाल कर आग लगा ली थी। यह भी कहा जा सकता है कि यहां दो लाइनों के बाद कहानी नाम की कोई चीज नहीं है। सिर्फ हिंसा की भरमार है।
जॉन अब्राहम ने खुद को सनी देओल और सलमान खान के मिक्स के रूप में ढाला है। उन्हें एक्टिंग करने की यहां जरूरत भी नहीं थी। वहीं मनोज बाजपेयी पुलिस इंस्पेक्टर और जॉन के बड़े भाई के रूप में हैं, जो कहानी में इमोशनल ट्विस्ट लाने के लिए उसे बार-बार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी देते रहते हैः भाई कानून अपने हाथ में मत लो, वर्ना गोली मार दूंगा। छोटे भाई को पक्का भरोसा है कि बड़ा गोली मारेगा।
अब आप चाहें तो सिर्फ जानने के लिए फिल्म देख सकते हैं कि क्या गोली चली? चली तो क्या लगी? लगी तो क्या फर्ज ने प्यार के ऊपर जीत पाई? मनोज बाजपेयी ने पूरी क्षमता के साथ काम किया है जबकि नई हीरोइन आयशा शर्मा हाव-भाव और आवाज से नेहा धूपिया का अनाकर्षक संस्करण लगती हैं। आयशा की मौजूदगी के बावजूद रोमांस एकाध गाने को छोड़ कर गायब है। आइटम डांस के रूप में यहां नोरा फतेही पर फिल्माया गाना दिलबर जरूर देखने योग्य है। सत्यमेव जयते भले कहे कि सत्य की सदा विजय होती है परंतु यह फिल्म सिनेमा की हार का नमूना है।