साउथ में राजनीति के क्षेत्र में आने वाले ज्यादातर सिनेमा में ही सक्रिय रहे है। फिल्मों में लोकप्रियता मिलने के बाद राजनीति के क्षेत्र में आसानी से एंट्री हो जाती है। निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज की फिल्म 'जिगरथंडा डबल एक्स' सिनेमा, राजनीति से होते हुए पर्यावरण की सुरक्षा पर पहुंच जाती है। यह फिल्म साल 2014 में रिलीज 'जिगरथंडा' की सीक्वल है। अक्षय कुमार की फिल्म 'बच्चन पांडे' इसी फिल्म की रीमेक थी। फिल्म 'जिगरथंडा' की कहानी का केंद्र सिनेमा ही था। इस फिल्म में सिद्धार्थ, बॉबी सिन्हा और लक्ष्मी मेनन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी और 'जिगरथंडा डबल एक्स' में राघव लॉरेंस, एसजे सूर्या, नवीन चंद्र की मुख्य भूमिकाएं हैं। 'जिगरथंडा डबल एक्स' में सिनेमा का थोड़ा सा विस्तार है। जोर इस बात पर है कि जो काम ताकत और हथियार से नहीं किया जा सकता है, वह सिनेमा के माध्यम से किया जा सकता है।
जिगरथंडा डबल एक्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की कहानी 1975 के दशक की है। मदुरै का एक कुख्यात गैंगस्टर सिनेमा में काम करना करना चाहता है, लेकिन उसके काले रंग को लेकर जब मजाक उड़ाया जाता है तो वह ठान लेता है कि एक दिन राज्य का सुपस्टार बनकर दिखाएगा। पैसे की कमी तो उसके पास हैं नहीं, वह अखबार में इस्तिहार छपवाता है कि फिल्म के लिए निर्देशक और कहानी चाहिए, निर्माता तैयार है। किरुबाकर को एक आदिवासी गांव में तैनात डीएसपी मदुरै के कुख्यात गैंगस्टर सीजर को मारने के मिशन पर भेजता है। किरुबाकर खुद को सत्यजीत रे का असिस्टेंट बताकर गैंगस्टर सीजर से मिलता है और उसके लिए फिल्म बनाता है। लेकिन फिल्म बनाने का उसका प्रयास जीवन बदलने वाली यात्रा पर ले कर जाता है और कहानी जंगल और हाथियों की सुरक्षा की तरफ निकल जाती है।
जिगरथंडा डबल एक्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जंगल में रहे रहे कुछ आदिवासी सरकार से नहीं लड़ सकते हैं। प्रदेश की मुख्यमंत्री जंगल को नष्ट करके और हाथियों को मरवाकर उस जगह पर कस्बा बसाना चाहती है। इसलिए आदिवासी गांव में तैनात डीएसपी के साथ मिलकर आदिवासियों की हत्या करवा देती है, लेकिन उसे नहीं पता है कि सारी चीजे शूटिंग के कैमरे में रिकॉर्ड हो रही है। जब फिल्म बनकर रिलीज होती है तो सबका पर्दाफाश होता है और प्रदेश की मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी गवानी पड़ती है। इस फिल्म के माध्यम से पर्यावरण और हाथियों की सुरक्षा को लेकर बहुत बड़ा सवाल उठाया गया है। लेकिन फिल्म में एक साथ इतनी कहानियों का कॉकटेल हो गया है कि फिल्म के निर्देशक इस फिल्म के माध्यम में असल में जो बात कहना चाह रहे थे वह पूरी तरह से स्पष्टरूप से कह नहीं पाए। फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी है और पूरी फिल्म को देखने के लिए बहुत धैर्य की जरूरत है।
जिगरथंडा डबल एक्स
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म का मूल कथानक यह है कि सिनेमा के माध्यम से कैसे समाज की दशा और दिशा बदली जा सकती है। इसी विषय पर एक साधारण सी पटकथा लिख कर एक प्यारी सी फिल्म बनाई जा सकती थी जो फिल्म के इंटरवल के बाद फिल्म में थोड़ी सी दिखती भी है। लेकिन पूरी फिल्म में एक्शन ही एक्शन है और इन दृश्यों में बैकग्राउंड म्यूजिक इतना लाउड है कि सुनकर सिर दर्द होने लगता है। फिल्म की इकलौती खासियत सिर्फ यह है कि फिल्म में 1975 के दशक की पृष्ठभूमि को बहुत अच्छे तरह से पेश किया गया है। उस दौर की वेशभूषा और मेकअप पर गहराई से ध्यान दिया गया है।
जिगरथंडा डबल एक्स
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फिल्म में गैंगस्टर सीजर की भूमिका अभिनेता राघव लॉरेंस ने निभाई है। वह अपनी कई पिछली फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी लाउड एक्टिंग करते ही नजर आए। किरदार में जो विविधता आनी चाहिए वह उनके किरदार में नजर नहीं आई। इंटरवल के बाद उन्होंने खुद को थोड़ा सा संभालने की कोशिश जरूर की है। किरुबाकर की भूमिका में एसजे सूर्या का सहज अभिनय प्रभावशाली रहा है। गैंगस्टर सीजर की पत्नी की भूमिका में निमिषा सजयन, डीएसपी की भूमिका में नवीन चंद्रा के अलावा सैथयान, अरवीन्द्र प्रकाश और फिल्म के बाकी कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिका के साथ पूरी तरह से न्याय करने की कोशिश की लेकिन बात बनी नहीं। थिरू की सिनेमॅटोग्राफी अच्छी है, खास करके जंगल वाले दृश्य मन मोह लेते हैं। शफीक मोहम्मद अली का संकलन सामान्य हैं, कम से कम इस फिल्म से 20 मिनट के सीन पर उन्हें कैची चलाने की जरूरत थी । संतोष नारायण का संगीत साउथ की फिल्मों के हिसाब से ठीक है, लेकिन हिंदी डबिंग में उनका संगीत सिर्फ शोर ही है, जो हिंदी पट्टी के दर्शकों के कानों को राहत नहीं देता है।