कहानी
फिल्म की कहानी थालपति वेत्री कोंडन उर्फ टीवीके (विजय) नाम के एक शख्स की है जो जेल में बंद है। एक दिन एक जेलर (गौतम वासुदेव मेनन) को उस पर दया आती है और वो नियमों के खिलाफ जाकर उसे उसकी बूढ़ी मां (रेवती) से मिलवा देता है।
नियम तोड़ने के चलते जेलर को सजा के तौर पर सस्पेंड कर दिया जाता है। कैद से रिहा होकर थलापति उसे जेलर की बेटी विजी (ममिता बैजू) का खयाल रखने लगता है। एक दिन एक्सीडेंट में जेलर की मौत हो जाती है और थलापति विजी को संभालने का जिम्मा अपने ऊपर ले लेता है।
दूसरी तरफ एंट्री होती है जॉन हेमलर (बॉबी देओल) की जो एक निर्दयी हत्यारा है। वो साउथ अफ्रीका में कत्लेआम मचाने के बाद अब भारत में भी आतंकवाद को बढ़ावा देने आया है।
इसी बीच एक दिन विजी किडनैप हो जाती है। जब थलापति उसे बचाने जाता है तो उसका सामना होता है जॉन हेमलर से। जॉन का एक अतीत है जिसमें वो कभी डिप्टी कमिश्नर अमरीश पुजारी हुआ करता है। क्या है यह अतीत? और इसका थलापति से क्या है कनेक्शन? यह फिल्म के सेकंड हाफ में पता चलता है।
अभिनय
विजय थलापति ही इस फिल्म की जान हैं और यह फिल्म उतना ही देखने लायक है जितनी देर विजय स्क्रीन पर आते हैं। उनका जोश, उनका आक्रोश, डायलॉग्स, हिंदी डब वर्जन में संकेत महात्रे की आवाज और डांस सब कुछ कमाल है।
थिएटर में आप भी उनकी एंट्री पर चिल्लाने पर मजबूर हो सकते हैं। उनका स्क्रीन प्रेजेंस भी देखने लायक है पर इस कमजोर कहानी को उनका स्टारडम भी ज्यादा दूर तक नहीं खींच पाता।
बॉबी देओल बीती कुछ फिल्मों में एक सा अभिनय कर रहे हैं। ‘एनिमल’, ‘अल्फा’ और अब ‘जन नायकन’ तीनों में ही उनके एक्सप्रेशन और किरदार एक से है। यहां भी उनके पास करने को कुछ खास नहीं रहा। निर्मम हत्यारे के रोल में एक जैसे एक्सप्रेशन देखकर आपको उनसे कुछ खास डर भी महसूस नहीं होता।
पूजा हेगड़े फिल्म में सिर्फ नाम के लिए हैं। ममिता बैजू पूरी फिल्म में अच्छी लगी हैं, उनकी खासियत यह है कि जैसा रोल दे दिया जाए वो वैसी लगने लगती हैं। प्रकाश राज, गौतम वासुदेव मेनन, प्रियामणि और नासर ने अपना काम ठीक किया है।
निर्देशन
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी अधूरा निर्देशन है। कई सीन अच्छे हैं पर सभी तरह के सीन मिलाकर एक अच्छी फिल्म बनती है। निर्देशक जानते थे कि यह थलापति कि आखिरी फिल्म है इसलिए कई सीन और कहानी के कुछ हिस्सों में वो लॉजिक के पीछे नहीं गए।
फर्स्ट हाफ तक कहानी आधी-आधी ही समझ आती है। सेकंड हाफ की शुरुआत में फिल्म बेहतर होती है। फ्लैशबैक और स्कूल वाले सीन कमाल हैं लेकिन क्लाइमैक्स तक आते-आते ओवर ड्रामा और जरूरत से ज्यादा लंबी होने के चलते यह बिखरने लगती है।
स्क्रीनप्ले तो इतना बिखरा हुआ है कि शुरुआत में जो फिल्म फैमिली ड्रामा लग रही थी, वो सेकंड हाफ में पॉलिटिकल ड्रामा लगने लगती है। क्लाइमैक्स तक तो यह फिल्म सााइंस-फिक्शन बन जाती है।
बॉबी देओल का पूरा ट्रैक ही कमजोर हैं। उनके कई सीन में जबरन वीएफएक्स का यूज किया है, जो अच्छे भी नहीं लगते। इसके अलावा भी कई ऐसी चीजें है जो अजीब और इमोशन-लेस हैं।
सिर्फ विजय ही इस फिल्म को देखने लायक एंटरटेनर बनाते हैं पर बुरा लगता है यह देखकर कि उन्होंने इसे अपनी आखिरी फिल्म के तौर पर चुना। इससे तो बेहतर था कि विजय 'लियो' को ही अपनी आखिरी फिल्म घोषित कर देते।
देखें या नहीं?
विजय के फैन हैं और यह फिल्म ना देखें, ऐसा तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हिंदी भाषी दर्शकों के लिए कुछ हिस्से बोरिंग होंगे। कहानी से कोई फर्क नहीं पड़ता तो थिएटर में जाकर देख सकते हैं।