ये घर घर की कहानी है
महिला सशक्तिकरण की एक नई बघार है फिल्म ‘जहां चार यार’। इसमें रिश्तों के वे सारे मसाले हैं जो रोज पकते पकते बेस्वाद हो चले हैं। एक का पति घर में परिचारिका लगाने के नाम से ही बिदकता है। दूसरे का पति अपनी सहकर्मी के साथ वक्त बिताता है और घर आकर तमाम तरह के नाटक करता है तो तीसरी का पति इसलिए हमबिस्तर नहीं होता कि किसी तरह बीवी पर बच्चे पैदा न कर पाने का दाग पक्का हो तो वह दूसरी शादी कर सके। चौथी थोड़ा अलग लाइन पर है और यही अपनी बाकी तीनों सहेलियों को इस चूल्हे चौके से मुक्ति दिलाने का प्लान बनाती है, भले ही कुछ दिनों के लिए। मामला किसी तरह सेट होता है। चारों गोवा पहुंचती हैं और वहां एक मर्डर हो जाता है।
घरवालों से उकताई बहुओं की कहानी
फिल्म ‘जहां चार यार’ के लेखक और निर्देशक कमल पांडे हैं। उनकी लिखावट और बुनावट में डेली सोप जैसी खुशबू दिखती है। वह किसी किरदार को बनावटी होने से बचाने की कोशिश पूरी फिल्म में करते हैं। चार सखियों की इस कहानी का असल कलेवर तब तक सोंधा बना रहता है जब तक इसमें मर्डर का किस्सा शामिल नहीं होता है। इसी के बाद चौथी सहेली की असल जिंदगी का सच सामने आता है। सच ये भी सामने आता है कि शादी का रिश्ता आपसी समझ का रिश्ता है। एक दूसरे की जरूरत में साथ रहने का रिश्ता है। और, ये जरूरतें दैहिक सुख से कहीं आगे की हैं। फिल्म सीन दर सीन समझाती चलती है कि दफ्तर में काम करने से बड़ा काम घर में दिन भर खटने वाली पत्नियां करती हैं। उनसे ही परिवार कहलाने वाली दुनिया रोशन है।
स्वरा के फिर से भास्कर होने की कहानी
स्वरा भास्कर फिल्म ‘जहां चार यार’ की स्टार हैं। अदाकारा तो वह कमाल की हैं ही। दो बच्चों की मां की भूमिका में यहां उन्होंने अपने खाते में एक और सितारा जोड़ा है। उनकी ऊर्जा से फिल्म रोशनी पाती है। पूजा चोपड़ा उस मुस्लिम बहू के किरदार में हैं जिसे पता है कि अब तीन तलाक देकर कोई मियां दूसरी शादी की बात करे तो उसकी अक्ल कैसे ठिकाने लाई जाती है। शिखा तलसानिया का किरदार भीतर ही भीतर घुट रहा है और गोवा की खुली हवा में जब भीतर का लावा फूटता है तो दर्शकों में बैठी कई महिलाओं को भी जोर से चीखने का मन कर सकता है। मेहेर विज का किरदार फिल्म की कहानी में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) का काम करता है और जब भी फिल्म अनुमानित रफ्तार पकड़ने लगती है, ये किरदार कहानी में एक नया ट्विस्ट ले आता है।
देखें कि न देखें
तकनीकी रूप से फिल्म भले बहुत आला दर्जे की न हो लेकिन फिल्म का गीत संगीत मधुर है। ‘मेरी पतली कमर’ गाने में रितु पाठक ने लोक रस का पूरा आनंद लिया है तो मीका सिंह का गाना भी परदे पर अच्छा लगता है। आनंद राज आनंद की अरसे बाद किसी फिल्म में वापसी अच्छी बन पड़ी है। महिला मंडली के लिए ये फिल्म खास दिलचस्पी वाली हो सकती है। फिल्म की रिलीज बहुत वृहत स्तर परतो नहीं हुई है लेकिन फिल्म अगर आपके नजदीकी सिनेमाघरों में लगी है और अगर आपका मन भी चूल्हा चौका से ऊब गया है तो अपनी सहेलियों के साथ ये फिल्म जरूर देख आएं।