‘इंडियन पुलिस फोर्स’ रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बाटला हाउस का डीएनए
बाटला हाउस एनकाउंटर की असल घटना उठाकर उसके पहले और बाद कुछ काल्पनिक कथाएं जोड़कर कोई आधा दर्जन लोगों ने औसतन 30 मिनट के सात एपिसोड वाली सीरीज लिखी है, ‘इंडियन पुलिस फोर्स’। अफसरों के कंधों पर लगे सितारे, तलवारें और अशोक की लाट देखने से लगता है कि हैदराबाद की पुलिस अकादमी से निकले आईपीएस अफसरों से सीरीज के लेखकों ने कभी आराम से बैठकर बात नहीं की। एनकाउंटर से ठीक पहले जिस तरह से ये अफसर जैकेट पहनते हैं, लगता तो यही है कि ये बुलेट प्रूफ जैकेट होंगी, लेकिन जब गोली फेफेड़े के आरपार होती है तो पता चलता है कि सीरीज बनाने वालों ने पुलिसवालों को जैकेट पहनाईं तो वह सिर्फ उनकी पहचान दर्शकों से कराना चाह रहे थे कि सादी वर्दी वाले ये पुलिस वाले हैं और स्पेशल सेल से हैं। भरी दिल्ली में आतंकवादियों से लड़ने निकली दिल्ली पुलिस की ये कौन सी छवि अमेजन प्राइम वीडियो गढ़ना चाह रहा है, रोहित शेट्टी ही बता सकते हैं। यूं लगता है कि पुलिस की सीरीज नहीं मजाक चल रहा है। आईजी रैंक का अफसर एक बच्चे को आतंकवादी के कब्जे में देख हार मान लेता है और अपनी पिस्तौल यूं आतंकवादी की तरफ फेंकता है कि वह बच्चे को पकडे पकड़े वह पिस्तौल उठा ले।
‘इंडियन पुलिस फोर्स’ रिव्यू
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खराब सीरीज के चमक खोते सितारे
‘इंडियन पुलिस फोर्स’ जबर्दस्ती बनाई गई सीरीज दिखती है। फिल्मों में कुछ खास न कर पा रहे सिद्धार्थ मल्होत्रा के लिए ये सीरीज संजीवनी मानी गई। विवेक ओबेरॉय को भी रोहित शेट्टी झाड़ पोंछकर कैमरे के सामने ले आए। शिल्पा शेट्टी का फोर्ड गाड़ी में एंट्री सीन ऐसा लगता है कि जैसे रोहित ने गुजरात एटीएस अफसर का नहीं एक गाड़ी का इंट्रो सीन बनाया है। और, शिल्पा को इज्जत कितनी बख्शी गई है इस सीरीज में, ये उस सीन से साफ हो जाता है जब सिद्धार्थ मल्होत्रा की रुलाई में विशेषज्ञता दिखाने वाले सीन में वह सिर्फ बैकग्राउंड में खड़ी रहती हैं। मिथुन चक्रवर्ती की थोक में बनने वाली फिल्मों का सीन डिवीजन इस सीरीज से बेहतर रहा करता था। उस दौर के विलेन मुकेश ऋषि भी ‘इंडियन पुलिस फोर्स’ का हिस्सा हैं, जिस पद पर उनका किरदार है, वह अफसर अपने मातहत अफसरों के साथ रात का भोजन करने ढाबे पर बिना किसी हलचल के पहुंच जाएगा और अपने जूनियर को ही बिल का भुगतान भी करने देगा, देखकर ही हंसी आती है।
‘इंडियन पुलिस फोर्स’ रिव्यू
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विवेक की बिग बी बनने की कोशिश
वेब सीरीज ‘इंडियन पुलिस फोर्स’ अपनी कहानी, पटकथा के साथ साथ अपने संवादो से भी मात खाती सीरीज है। पूरी फोर्स को दफ्तर की बालकनी से खड़े होकर संबोधित करते विवेक ओबेरॉय जब अमिताभ बच्चन बनने की कोशिश करते हैं तो सीरीज की एक कमजोर परत और खुलती है। हिंदी सिनेमा में हाशिये पर पहुंच चुके पुरुष कलाकारों के साथ ही ये सीरीज महिला कलाकार भी चुनचुनकर पेश करती है। श्वेता तिवारी हैं, जिनके किरदार को ये समझ नहीं आता कि रोते समय कोई पीछे से आकर सांत्वना देने की कोशिश करें तो फिर क्या करना चाहिए। ईशा तलवार के पास चमकने का काम है, वह उसे ठीक से करती ही रहती हैं। लेकिन, नफीसा बनीं वैदेही का काम इस सीरीज में नोटिस करने लायक है। बाकी कलाकारों में निकितन धीर के पास ने अपना डील डौल दिखाते रहने की जिम्मेदारी बढ़िया ढंग से निभाई है। हां, एक कलाकार है ऐसा भी रखा गया है जो खामखां हरियाणवी तड़का लगाने की खराब सी कोशिश करता रहता है।
‘इंडियन पुलिस फोर्स’ रिव्यू
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रोहित की ब्रांडिंग को तगड़ा झटका
वेब सीरीज ‘इंडियन पुलिस फोर्स’ को देखने का इकलौता कारण इसके साथ जुड़ा रोहित शेट्टी का नाम रहा है। लेकिन, जब वह खुद ही अपने नाम को गंभीरता से न ले रहे हों तो फिर बाकियों से कुछ खास उम्मीद करना भी बेमानी है। सीरीज की सिनेमैटोग्राफी इतनी हल्की है कि पुरानी दिल्ली को दिखाने के लिए मुंबई के किसी स्टूडियो में बना इसका सेट हर कोने से अपनी कमजोरी दिखाता रहता है। पूरा शहर धमाकों से गूंज रहा हो और पुलिस स्लो मोशन में आ रही हो, कहीं किसी तरह की बेचैनी न दिख रही हो, और सीरीज का डीओपी इस बारे में निर्देशक को टोंक भी न रहा हो, सोचकर ही हैरानी होती है। बैकग्राउंड म्यूजिक के नाम पर अमर मोहिले के पास बस वही एक धुन है, टणा ना ना, टणा ना ना, ना ना ना..! बाकी और कुछ सीरीज में भी खास नहीं है।